आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026

कब से शुरू है आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 में? जानें तिथि, महत्व और नियम

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026: हम सभी इस बात को भली-भांति जानते हैं कि साल भर में चैत्र और शारदीय नवरात्रि को धूमधाम से मनाया जाता है। चैत्र नवरात्रि से जहाँ हिंदू नववर्ष का आरंभ होता है जबकि शारदीय नवरात्रि में पूरा देश डांडिया, गरबा और उत्सव के रंग में रंग जाता है। हालांकि, नवरात्रि के नौ दिनों का संबंध देवी दुर्गा से होता है और इस दौरान भक्तजन पूरी श्रध्दा एवं भक्तिभाव से माता का पूजन करते हैं। 

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शायद ही आप जानते होंगे कि साल में कुल चार नवरात्रि आती हैं जिनमें माघ, चैत्र, आषाढ़ और शारदीय नवरात्रि शामिल हैं। इनमें से आषाढ़ और माघ नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। इन नवरात्रि के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं और न ही सोशल मीडिया पर आप इनके बारे में सुनेंगे। लेकिन फिर भी अगर आप किसी अनुभवी ज्योतिषी या तंत्र-साधना से जुड़े व्यक्ति से पूछेंगे, तो वह बताएंगे कि गुप्त नवरात्रि सभी नवरात्रियों में सबसे शक्तिशाली मानी जाती हैं। 

गुप्त नवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध देवी शक्ति के यह नौ दिन रहस्यमयी और शक्तिशाली होते हैं। आइए जानते हैं साल 2026 में कब से शुरू होंगी गुप्त नवरात्रि। 

गुप्त नवरात्रि 2026: तिथि और महत्व 

हिंदू पंचांग के अनुसार, एक साल में कुल चार बार नवरात्रि आते हैं और ज्यादातर लोग बस चैत्र और शारदीय नवरात्रि के बारे में ही जानते हैं जबकि अन्य दो नवरात्रि हैं – माघ नवरात्रि और आषाढ़ नवरात्रि। वहीं, इस साल आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का आरंभ 15 जुलाई 2026 से होगा और इसका समापन 23 जुलाई 2026 को हो जाएगा। बता दें कि माघ गुप्त नवरात्रि सामान्य रूप से जनवरी या फरवरी में आते हैं। वहीं, आषाढ़ गुप्त नवरात्रि जून-जुलाई के महीने में मनाए जाते हैं।

बता दें कि गुप्त नवरात्रि में गुप्त का अर्थ रहस्य या छिपा हुआ से होता है। यह नवरात्रि सदियों से पूरी भक्ति और आस्था के साथ मनाए जाते रहे हैं। प्राचीन समय में ऋषि-मुनि और साधक गुप्त नवरात्रि के नौ दिनों में तंत्र साधना और ध्यान किया करते थे जो गुप्त रूप से की जाती है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इनकी पूजा का फल तब ही मिलता है, जब देवी शक्ति के दस महाविद्या स्वरूप की आराधना गुप्त रूप से की जाती है।

वैदिक काल में साधकों और तांत्रिकों को ही गुप्त नवरात्रि के बारे में जानकारी होती है। तांत्रिक और अघोरी साधु गुप्त नवरात्रि की नौ रातों में दस महाविद्या के दस स्वरूपों की पूजा विशेष रूप से किया करते थे और आज भी यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।

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आषाढ़ गुप्त नवरात्रि: नोट कर लें तिथियां 

साल 2026 में आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का आरंभ 15 जुलाई 2026, बुधवार का होगा और इसकी समापन 23 जुलाई 2026 को होगा। बता दें कि आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है और वहीं, नवमी तिथि पर इसकी समाप्ति होती है। ऐसे में, यह समय दस महाविद्या के दस स्वरूपों की उपासना के लिए श्रेष्ठ होता है। 

दिनतिथि पर्व का नाम 
पहला दिनबुधवार, 15 जुलाई 2026घटस्थापना और मां शैलपुत्री पूजा
दूसरा दिनगुरुवार, 16 जुलाई 2026मां ब्रह्मचारिणी पूजा
तीसरा दिनशुक्रवार, 17 जुलाई 2026मां चंद्रघंटा और मां कुष्मांडा पूजा
चौथा दिनशनिवार, 18 जुलाई 2026मां स्कंदमाता पूजा
पांचवां दिनरविवार, 19 जुलाई 2026मां कात्यायनी पूजा
छठा दिनसोमवार, 20 जुलाई 2026मां कालरात्रि पूजा
सातवां दिनमंगलवार, 21 जुलाई 2026दुर्गा अष्टमी और मां महागौरी पूजा
आठवां दिनबुधवार, 22 जुलाई 2026माँ सिद्धिदात्री पूजा
नौवां दिनगुरुवार, 23 जुलाई 2026नवरात्रि पारण

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 में एक तिथि का ध्यान विशेष रूप से रखना बहुत जरूरी होगा, वह है संधि पूजा। यह अष्टमी और नवमी तिथि के बीच का पवित्र समय होता है और इस साल यह समय 22 जुलाई की सुबह 04:52 बजे से 5:40 बजे तक रहेगा। ज्योतिषियों के अनुसार, इस अवधि को पूरे नवरात्रि के सबसे शक्तिशाली 48 मिनट माना जाता है। अगर आप कोई विशेष पूजा साधना, और मंत्र जाप करना चाहते हैं, तो यह समय सबसे शुभ रहेगा। 

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि और इसके नाम 

सामन्य रूप से, नवरात्रि का पर्व उत्तर भारत जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड आदि में बहुत श्रद्धाभाव के साथ मनाया जाता है। इसी प्रकार, आषाढ़ गुप्त नवरात्रि को भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। 

वाराही नवरात्रि: आषाढ़ गुप्त नवरात्रि को वाराही नवरात्रि भी कहा जाता है क्योंकि इन नौ दिनों में देवी वाराही की विशेष रूप से पूजा की जाती है। 

गायत्री नवरात्रि: आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का यह नाम देवी गायत्री की पवित्र शक्ति से जुड़े होने के कारण प्रसिद्ध है।

शाकंभरी नवरात्रि: आषाढ़ माह के नवरात्रि को उत्तर भारत में शाकंभरी नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। 

भद्रकाली नवरात्रि: देवी के उग्र स्वरूप में होने के कारण आषाढ़ गुप्त नवरात्रि को भद्रकाली नवरात्रि कहा जाता है। 

गुह्य नवरात्रि: आषाढ़ माह के नवरात्रि को हिमाचल प्रदेश में गुह्य नवरात्रि कहा जाता है। 

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गुप्त नवरात्रि 2026 का ज्योतिषीय महत्व 

गुप्त नवरात्रि के नौ दिनों को अधिकतर लोग देवी शक्ति की कृपा और आशीर्वाद प्राप्ति का समय मानते हैं जो बिल्कुल सही है। लेकिन, गुप्त नवरात्रि 2026 का ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व माना गया है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, यह पूरे वर्ष का सबसे प्रभावशाली समय माना जाता है जब आप ग्रह दोषों के उपाय और ग्रहों को शांत करने के लिए साधना भी कर सकते हैं। 

इसका मुख्य कारण उन देवियों से जुड़ा है जिनकी पूजा इस दौरान की जाती है। जहाँ चैत्र और शारदीय नवरात्रि में नवदुर्गा की पूजा होती है, वहीं गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की पूजा की जाती है। सरल शब्दों में कहें, तो इस गुप्त नवरात्रि में देवी दुर्गा के तांत्रिक स्वरूप दस महाविद्याओं का पूजन किया जाता है। ज्योतिष के अनुसार, हर महाविद्या का संबंध किसी न किसी ग्रह से अवश्य होता है। 

महाविद्या का नामशासित ग्रह
मां कालीशनि
मां ताराबृहस्पति
त्रिपुरा सुंदरी (षोडशी)बुध
मां भुवनेश्वरीचंद्रमा
मां छिन्नमस्ताराहु
मां भैरवीलग्न
मां धूमावतीकेतु
मां बगलामुखीमंगल
मां मातंगीसूर्य
मां कमलाशुक्र

अगर आप कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, राहु-केतु दोष या मंगल से जुड़ी परेशानियों का सामना कर रहे हैं, तो गुप्त नवरात्रि 2026 दस महाविद्या पूजा करने के लिए सर्वश्रेष्ठ समय होता है। यह केवल आस्था नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा है, जो इस मान्यता पर आधारित है कि ग्रहों की ऊर्जा और देवी शक्ति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी होती है। इसी वजह से अनेक ज्योतिषी आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में विशेष उपायों को करने की सलाह देते हैं जो इस प्रकार हैं:

कुंडली दोष निवारण: जन्म कुंडली में उपस्थित दोष को दूर करने के लिए कुंडली दोष निवारण उपाय फलदायी साबित होते हैं। 

राहु-केतु से जुड़ी समस्याएं: जो जातक करियर में समस्या, कंफ्यूजन, नशे की आदत या भाग्य का साथ न मिलना जैसी समस्या का सामना कर रहे हैं।     

मंगल दोष: मंगल दोष निवारण उपाय विवाह और दांपत्य जीवन से जुड़ी परेशानियों से मुक्ति के लिए।

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गुप्त नवरात्रि 2026: दस महाविद्या से जुड़ी पौराणिक कथा

दस महाविद्याओं को देवी शक्ति के दस तांत्रिक स्वरूप माना जाता है। देवी दुर्गा के ये स्वरूप शक्तिशाली, रहस्यमयी और परिवर्तन लेकर आने वाले माने जाते हैं। देवी शक्ति के शांत और सौम्य रूपों की तुलना में महाविद्याओं के स्वरूप अधिक उग्र और प्रभावशाली माने जाते हैं। 

पौराणिक कथा के अनुसार, महाभागवत पुराण में बताया गया है कि माता सती अपने पिता दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में जाना चाहती थीं। लेकिन भगवान शिव ने उन्हें वहां जाने से मना कर दिया। माता सती इस बात से क्रोधित हो गईं और उन्होंने एक साथ अपने दस अलग-अलग रूप प्रकट कर दिए थे। इन दस रूपों ने दसों दिशाओं को घेर लिया, ताकि भगवान शिव वहां से जा न सकें। माता शक्ति के दस स्वरूप आगे चलकर “दस महाविद्या’ कहलाए। इन दस देवियों का अपना अलग महत्व और शक्ति मानी जाती है। 

  1. माँ काली: दस महाविद्याओं का प्रथम और प्रमुख स्वरूप मां काली हैं। देवी का वर्ण श्याम, रूप उग्र हैं और इन्हें भगवान शिव की छाती पर पैर रखे हुए दर्शाया जाता है। माता को अहंकार के विनाश और उसके बाद मिलने वाली मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। माँ काली का संबंध शनि देव से हैं इसलिए इनके प्रभाव को शांत करने और भय दूर करने के लिए माँ काली की पूजा की जाती है। 

काली मंत्र: ॐ क्रीं कालिके स्वाहा 

अवतार: कृष्ण

  1. माँ तारा: माँ तारा का स्वरूप देवी काली से मिलता-जुलता माना जाता है। यह जीवन में आने वाली कठिनाइयों से पार लगाने वाली देवी हैं और इनका संबंध गुरु ग्रह से है। इनका पूजन ज्ञान और मोक्ष प्रदान करता है। 

तारा मंत्र:‘ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट् 

अवतार: मत्स्य

  1. त्रिपुरा सुंदरी (षोडशी): त्रिपुरा सुंदरी (षोडशी) का अर्थ “तीनों लोकों में सबसे सुंदर” से है। इन्हें परम आनंद और दिव्य सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है। इनका संबंध बुध ग्रह से है और तंत्र साधना में इनकी उपासना अत्यंत शक्तिशाली मानी जाती है। 

षोडशी मंत्र: क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं

अवतार: परशुराम

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  1. माँ भुवनेश्वरी: देवी भुवनेश्वरी को संपूर्ण ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। ये सृष्टि पर नियंत्रण रखती हैं और इनका संबंध चंद्र ग्रह से माना गया है। जीवन में मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन की प्राप्ति के लिए माँ भुवनेश्वरी की पूजा की जाती है।

भुवनेश्वरी मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौः क्रीं 

अवतार: वामन

  1. माँ भैरवी: मां भैरवी का स्वरूप उग्र और अग्नि के समान तेजस्वी माना गया है। देवी विनाश के माध्यम से परिवर्तन लेकर आने वाली देवी हैं और इनका संबंध लग्न से होता है। इनका पूजन जातक के जीवन से नकारात्मकता को दूर करता है। 

भैरवी मंत्र: ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा 

अवतार: बलराम

  1. मां छिन्नमस्ता: देवी छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं के सबसे रहस्यमयी स्वरूपों में से एक मानी जाती है। देवी का स्वरूप बेहद उग्र और भयावह है जो अपना ही कटा हुआ सिर हाथ में लिए हुए दिखाया जाता है। इन्हें त्याग, कुंडलिनी जागरण और अचानक परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। माँ छिन्नमस्ता का संबंध राहु ग्रह से बताया गया है। 

छिन्नमस्ता मंत्र: श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचनीये 

अवतार: नरसिंह 

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  1. माँ धूमावती: देवी धूमावती दस महाविद्याओं में से एकमात्र विधवा देवी हैं। देवी के इस स्वरूप को अशुभ माना जाता है, लेकिन वास्तव में देवी अहंकार के अंत और जीवन के अनुभवों से मिलने वाले ज्ञान का प्रतीक हैं। नवग्रहों में देवी धूमावती का संबंध केतु ग्रह से है। 

धूमावती मंत्र: ॐ धूं धूं धूमावती स्वाहा’
अवतार: वराह

  1. माँ बगलामुखी: दस महाविद्या में मां बगलामुखी आठवीं महाविद्या हैं जो शत्रुओं को पराजित करने वाली देवी हैं। इनका संबंध मंगल ग्रह से माना गया है और देवी का पूजन विवाद, कोर्ट-कचहरी और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए किया जाता है। 

बगलामुखी मंत्र: ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा 

अवतार: कूर्म

  1. माँ मातंगी: माँ मातंगी को कला, बुद्धि और वाणी की देवी कहा गया है। माता का यह स्वरूप पारंपरिक सीमाओं से परे माना जाता है। नवग्रहों में इनका संबंध सूर्य ग्रह से है और इनकी पूजा रचनात्मकता और ज्ञान प्राप्ति के लिए की जाती है। 

मातंगी मंत्र: ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै हूं फट् स्वाहा 

अवतार: राम

  1. माँ कमला: दस महाविद्या में दसवां और अंतिम स्वरूप देवी कमला का है जो देवी लक्ष्मी का तांत्रिक स्वरूप मानी जाती हैं। इन्हें कमल पर विराजमान दिखाया जाता है। देवी कमला का संबंध शुक्र ग्रह से है जो जातक को धन, सौंदर्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। 

कमला मंत्र: ‘ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं’ 

अवतार: कल्कि

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आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026: पूजा विधि 

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 में देवी के पूजन एवं उपासना के लिए तांत्रिक या साधक होना जरूरी नहीं है। इस साल आप नीचे दी गई पूजा विधि से माता का पूजन करें। 

संकल्प से आरंभ करें: आषाढ़ नवरात्रि के प्रथम दिन यानी कि 15 जुलाई 2026 की सुबह स्नान के पश्चात शांत मन से संकल्प हैं। इन नौ दिनों में आप क्या पाना चाहते हैं, क्या अर्पित करना चाहते हैं और इन नौ दिनों में किन नियमों का पालन करेंगे, यह मन में दोहराएं। ज्योतिष में आपके संकल्प को पूरी साधना का आधार माना जाता है। 

घटस्थापना करें: प्रतिपदा तिथि पर शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना करें। तांबे या मिट्टी के कलश को देवी की प्रतिमा या चित्र के सामने स्थापित करें। अब कलश के ऊपर नारियल रखें और उसके आसपास की मिट्टी पर जौ बोएं जिन्हें धन, समृद्धि और प्रगति का प्रतीक माना जाता है। 

सुबह-शाम देवी का पूजन: प्रतिदिन ताजे फूल अर्पित करें, दीपक जलाएं, धूप दिखाएं और भोग लगाएं। साथ ही, दुर्गा चालीसा, चंडी पाठ या दुर्गा सप्तशती का पाठ अपनी श्रद्धा के अनुसार करें। 

व्रत करें: नवरात्रि के व्रत पहले दिन से लेकर नवमी तिथि तक रखे जाते हैं। इस दौरान सात्विक भोजन जैसे फल, दूध, साबूदाना खिचड़ी, सिंघाड़े की रोटी, सेंधा नमक और सूखे मेवे आदि का सेवन किया जाता है। साथ ही, मांसाहार, मदिरा, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बनाकर रखनी चाहिए।

संधि पूजा: 22 जुलाई 2026 की सुबह 4:52 बजे से 5:40 बजे के बीच संधि पूजन करें। यह अष्टमी से नवमी का पवित्र समय होता है और यह समय नवरात्रि का सबसे शुभ मुहूर्त माना जाता है।

पारण के साथ समापन करें: आषाढ़ नवरात्रि के अंतिम दिन यानी कि नवमी तिथि पर 23 जुलाई 2026 को अंतिम पूजा करें, प्रसाद बांटें और व्रत पारण के बाद अपना व्रत विधिपूर्वक खोलें। 

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आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2026 की पौराणिक कथा 

प्राचीन समय में कोशल राज्य में सुदर्शन नाम का एक राजकुमार रहा करता था। राजमहल के षड्यंत्र और विद्रोह के कारण उसकी और उसकी माता की जान खतरे में आ गई थी, जिसके बाद उन्हें जंगल में शरण लेनी पड़ी। एक दिन जंगल में खेलते हुए सुदर्शन ने पेड़ों के बीच एक अनजानी आवाज़ को सुना। वह बच्चा था, इसलिए उसने उस शब्द को बार-बार दोहराना शुरू कर दिया और उसे यह नहीं पता था कि वह क्लीं” बीज मंत्र का जाप कर रहा है जो माँ दुर्गा का अत्यंत शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। 

उस समय गुप्त नवरात्रि चल रही थी और राजकुमार की भक्ति से माँ दुर्गा प्रसन्न हो गईं और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि वह अपना खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त करेगा, और अपने जीवन में यश, वैभव और समृद्धि पाएगा। आगे चलकर ऐसा ही हुआ और राजकुमार सुदर्शन ने अपना राज्य प्राप्त किया, और वहां का राजा बन गया। 

दूसरी कथा का संबंध ऋषि श्रृंगी से है। कथा के अनुसार, एक दिन ऋषि श्रृंगी पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर लोगों की समस्याएं सुन रहे थे, तभी एक महिला उनके पास आई और दुखी होकर बोली कि वह माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त नहीं कर पा रही है क्योंकि उसके पति बुरे कर्मों से लिप्त थे और उसे भी इसी रास्ते पर चलने के लिए मज़बूर करते थे। ऐसे में, वह न तो व्रत रख पाती थी और न ही पूजा-पाठ कर पाती थी। उसने ऋषि से मार्गदर्शन माँगा।

ऋषि श्रृंगी ने उसे बताया कि वर्ष में दो गुप्त नवरात्रियां होती हैं, जिनमें देवी के दस महाविद्या स्वरूपों की विशेष पूजा की जाती है। उन्होंने महिला को पूरी श्रद्धा के साथ गुप्त नवरात्रि में माँ दुर्गा की आराधना करने के लिए कहा। महिला ने पूरी आस्था और भक्तिभाव से नौ दिनों तक माँ की साधना की। माँ दुर्गा उसकी भक्ति से प्रसन्न हुई और उसके जीवन में सुख-शांति लौट आई। उसका पति भी अपने बुरे कर्मों को छोड़कर एक जिम्मेदार और अच्छा इंसान बना। 

गुप्त नवरात्रि 2026 को क्या ख़ास बनाता है?

सभी गुप्त नवरात्रियों में से आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का संबंध देवी वाराही से माना जाता है। बता दें कि देवी वाराही को देवी महात्म्य में वर्णित सप्तमातृकाओं में से एक माना गया है। साथ ही, इन्हें भगवान वराह की शक्ति का स्वरूप कहा जाता है। नवरात्रि की नौ रातों में देवी वाराही के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती हैं, जिन्हें “नव वाराही” भी कहा जाता है।

नवरात्रि की पहली रात: महावाराही देवी का सर्वोच्च स्वरूप है जो संपूर्ण संसार को सुरक्षा प्रदान करता है। 

नवरात्रि की दूसरी रात: चैतन्य वाराही का संबंध कुंडलिनी शक्ति से माना जाता है और यह व्यक्ति के भीतर की आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करती हैं।

नवरात्रि की तीसरी रात: संकट वाराही का स्वरूप मनुष्य जीवन से समस्याओं और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है जो कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस प्रदान करती है। 

नवरात्रि की चौथी रात: उग्र वाराही, देवी के इस स्वरूप को अत्यंत उग्र रूप माना जाता है जो हल, खड्ग और चक्र धारण कर नकारात्मक शक्तियों का नाश करती हैं। 

नवरात्रि की पांचवीं रात: धूम्र वाराही, देवी का यह स्वरूप धुंए और माया से जुड़ा होता है जो व्यक्ति के भीतर से भ्रम को दूर करने में सहायता करती हैं। इनकी पूजा राहु दोष के लिए विशेष प्रभावशाली माना जाता है।

नवरात्रि की छठी रात: स्वप्न वाराही, देवी का यह स्वरूप अपने भक्तों को सपनों में मार्गदर्शन देने वाला माना जाता है और यह अवचेतन मन से जुड़ी होती हैं।

नवरात्रि की सातवीं रात: त्र्यम्बका वाराही, देवी का यह स्वरूप त्रिनेत्र वाला है जिसमें भगवान शिव की असीम ऊर्जा निहित होती है। 

नवरात्रि की आठवीं रात: महा वाराही, नवरात्रि में अष्टमी तिथि सबसे शक्तिशाली मानी जाती है क्योंकि अष्टमी तिथि पर देवी की शक्ति अपने चरम पर होती है। 

नवरात्रि की नौवीं रात: आदि वाराही, देवी का मूल और आदिशक्ति स्वरूप। 

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. साल 2026 में आषाढ़ गुप्त नवरात्रि कब मनाए जाएंगे?

इस वर्ष आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का पर्व 15 जुलाई से 23 जुलाई 2026 के बीच मनाया जाएगा। 

2. आषाढ़ गुप्त नवरात्रि को शक्तिशाली क्यों माना जाता है?

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि को ग्रहों की शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। 

3. आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का संबंध किस देवी से है?

इस नवरात्रि में देवी वाराही की पूजा की जाती है।