स्वतंत्रता दिवस 2026: 15 अगस्त 2026 का दिन केवल भारत की स्वतंत्रता की वर्षगांठ मात्र नहीं होगा, बल्कि यह एक ऐसा समय होगा जब देश एक नए परिवर्तन काल के मध्य खड़ा हुआ दिखाई देगा। पिछले कुछ वर्षों में भारतवर्ष ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। जिनमें से विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, रक्षा, अंतरिक्ष, डिजिटल, बुनियादी ढांचा तथा वैश्विक कूटनीति आदि क्षेत्र प्रमुख है। ऐसा नहीं कि भारत ने सिर्फ सकारात्मक प्रगति मात्र की है क्योंकि ऐसी उपलब्धियों के अलावा अनेक चुनौतियों से भी भारत को रूबरू होना पड़ रहा है। उनमें से महंगाई, रोजगार, पर्यावरण, सामाजिक असंतुलन तथा अंतरराष्ट्रीय तनाव जैसी चुनौतियां भारत के सामने अपने विशाल रूप में खड़ी हुई नजर आ रही है।

एस्ट्रोसेज एआई के इस “स्वतंत्रता दिवस 2026” के ब्लॉग में हम भारत के भविष्य के बारे में बात करेंगे। सबसे पहले जान लेते हैं स्वतंत्रता दिवस का पंचांग।
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15 अगस्त 2026 के दिन का पंचांग विवरण:
दिन: शनिवार
तिथि: शाम 5:28 तक तृतीया तत्पश्चात चतुर्थी
नक्षत्र: उत्तराफाल्गुनी
योग: सुबह 7:09 तक शिव इसके बाद सिद्ध
करण: क्रमशः तैतिल. गर एवं वणिज
वैसे तो हम इस वर्ष का फलादेश स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की कुंडली, वर्ष कुंडली एवं गोचर इत्यादि के माध्यम से करने वाले हैं। लेकिन दिन के अनुसार फलादेश करने की परंपरा रही है और दिन के अनुसार फलादेश को जानने में लोगों की गहरी रुचि भी रहती है। अत: 15 अगस्त 2026 के दिन अर्थात शनिवार के अनुसार फलादेश की संक्षिप्त चर्चा कर लेते हैं क्योंकि 15 अगस्त 2026 को शनिवार का दिन पड़ रहा है और इस दिन का स्वामी शनि ग्रह होता है जो अनुशासन, कानून व्यवस्था, श्रम, उद्योग, दीर्घकालीन विकास एवं न्याय आदि का प्रतिनिधित्व करता है। यह इस बात का संकेत कर रहा है कि आने वाला वर्ष तात्कालिक लाभ की तुलना में दीर्घकालिक योजनाओं को बढ़ाने में अधिक मददगार रह सकता है।
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भारत के 80वें वर्ष का फलादेश करने से पहले आइए संक्षेप में भारत की स्वतंत्रता की कुंडली के ग्रहों की स्थिति और उनके प्रभावों को जान लेते हैं।

स्वतंत्र भारत की कुंडली में वृष लग्न उदित हो रहा है। लग्न का स्वामी ग्रह शुक्र कुंडली के तीसरे भाव में कर्क राशि एवं अश्लेषा नक्षत्र में स्थित है। अनुकूल बात है कि शुक्र की युति कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा एवं अश्लेषा नक्षत्र के स्वामी बुध से तीसरे भाव में हो रही है, जो सामान्य तौर पर देश की स्थिति को मजबूती देने का काम करेंगे। हालांकि लग्न पर स्थित राहु इस बात का संकेत कर रहा है कि देश को पूर्ण रूपेण व्यवस्थित करना लगभग नामुमकिन जैसी स्थिति होगी। हम एक चीज को ठीक करेंगे तो दूसरी अव्यवस्था तैयार रह सकती है। देश की छवि को बिगाड़ने में भी राहु बीच-बीच में भूमिका निभाने का काम कर सकता है। अक्सर कथनी और करनी में अंतर का दोष भारतवर्ष के प्रमुख नेताओं पर लगता है, उसके पीछे भी राहु की यह स्थिति प्रभाव डालने का काम करती है।
हालांकि, भारत वर्ष की कुंडली वृषभ लग्न की है और इस राशि के लोग दूसरों के लिए मुश्किल खड़ी करने की बजाय अपनी जिम्मेदारियां को पूरा करने वाले होते हैं। ऐसे में, भारतवर्ष में भी यही स्वभाव देखने को मिलता है कि देश की प्रमुख संस्थाएं आगे से किसी को परेशान नहीं करती हैं, लेकिन यदि कोई देश या शक्ति भारत को परेशान करने का प्रयास करती है, तो उसे सबक सिखाने में भारतवर्ष पीछे नहीं रहता। देश की आज़ादी के समय विद्वानों ने शायद वृष राशि का चयन इसलिए किया होगा जिससे भारत की अखंडता एवं एकता दीर्घकाल तक बनी रहे। हालांकि राहु इस एकता और अखंडता में भ्रम की स्थिति पैदा करके बाधित करने का काम करता रहता है। यही कारण है कि लोग जाति, समाज या भ्रमित होकर अन्य मनोभावों के कारण आपस में लड़ते रहते हैं, लेकिन फिर भी देश संगठित बना हुआ है।
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दूसरे भाव में सप्तमेश एवं द्वादशेश मंगल विराजमान है जो विदेशों से फंडिंग करवाने में मददगार बनते हैं. यानी विदेशी निवेश का समर्थन करने का काम मंगल ग्रह कर रहा है। तीसरा भाव पड़ोसियों का भाव होता है। यहां पर पांच ग्रहों की युति कुछ मामलों में अनुकूल तो कुछ मामलों में खराब परिणाम देने का काम करती है। इस युति के कारण भारतवर्ष के पड़ोस में कई देश हैं। कई देशों की सीमा भारत के साथ मिलती है, लेकिन विभिन्न स्वभाव वाले ग्रहों की युति कुछ देशों के साथ मित्रवत तो वहीं कुछ देशों के साथ नकारात्मक संबंध भी बनाने का काम करती है। भारत की कुंडली के छठे भाव में बृहस्पति विराजमान हैं जो आठवें तथा ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। यही कारण है कि कई बार भारत के विरोध में अप्रत्याशित रूप से कोई भी देश आ जाता है। जिन देशों के साथ हमने लंबी मित्रता निभाई है या जिन देशों के शासको के साथ हमारे संबंध अच्छे रहे हैं, हम अभी भी उन्हें अच्छाई के साथ निभा रहे हैं; फिर भी अचानक से हमारे विरुद्ध नज़र आने लगते हैं।
हालांकि यही स्थिति व्यापक तौर पर कर्ज लेने और कर्ज चुकाने के मामले में भी मददगार बनने का संकेत कर रही है। सप्तम भाव में केतु वृश्चिक राशि एवं अनुराधा नक्षत्र में स्थित है। अतः यह भी स्त्रियों से संबंधित मामलों में कभी-कभी पीड़ा देने का काम करता है। देश की आंतरिक शांति को भंग करने एवं आर्थिक अस्थिरता देने का काम केतु भी करता है, क्योंकि केतु शनि के नक्षत्र में स्थित है और शनि तीसरे भाव में पंचक ग्रही योग में शामिल है। अतः पड़ोसी राष्ट्रों के साथ संबंधों को कमजोर करने में केतु भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डाल रहा है।
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वर्तमान में भारत की मंगल की महादशा में राहु की अंतर्दशा का प्रभाव चल रहा है जो फरवरी 2027 तक रहने वाला है। मंगल और राहु की युति की बात हो या दशाओं में इनके प्रभाव की बात हो; लगभग अधिकांश मामलों में ही मंगल और राहु का संयुक्त प्रभाव अनुकूल नहीं माना गया है, बल्कि यह क्रोध, विद्रोह, दुर्घटना, षड्यंत्र, अग्निकांड एवं उपद्रव देने वाला माना गया है। भारतवर्ष की कुंडली में मंगल दूसरे भाव में है एवं राहु पहले भाव में है, यानी ये एक दूसरे से द्वि-द्वादश है। यहां पर उस कहावत की तरह परिणाम मिल सकते हैं जिसमें कहा गया है कि “एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा” यानी मंगल और राहु का संयुक्त प्रभाव ही अपने आप में खराब माना गया है। ऊपर से दशाओं की द्वि-द्वादश वाली स्थिति भी खराब मानी गई है। ऐसे में इन दोनों खराब स्थितयों का एक साथ लागू होना परिणामों को सकारात्मक कम और नकारात्मक अधिक बनाएगा।
ज्योतिष में रुचि रखने वाले लोग जानते होंगे कि मंगल-राहु की युति को कई विद्वान विस्फोटक योग कहते हैं। लेकिन कुछ लोग दशाओं में भी इस संयोजन को विस्फोटक योग मानते हैं। भले ही इस योग का कोई बृहद शास्त्रीय उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन मंगल को आग और राहु को पेट्रोलियम उत्पाद से जोड़कर देखते हैं। ऐसे में, हमें भी इनके कारकत्त्वो के आधार पर ऐसा लगता है कि जब आग और पेट्रोलियम उत्पाद आपस में मिलते हैं, तो आग के धधकने और भड़कने का खतरा और अधिक रहता है, क्योंकि मंगल आग का कारक है, युद्ध और लड़ाईयों का कारक है, हिंसा का कारक है। राहु के साथ में मिलकर मंगल उत्पात करने वाली गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है।
राहु राजनीति है, राहु सनसनी है, राहु को भ्रामक खबरों के लिए भी जाना जाता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया आदि में भी राहु का गहरा प्रभाव माना गया है। ऐसे में, मंगल और राहु की दशाएं कुछ उपद्रवकारी घटनाओं को बढ़ावा दे सकती हैं। पिछले दिनों जंतर-मंतर पर जिस तरह लोग इकट्ठा होकर सरकार की नीतियों और मंत्रियों के विरुद्ध बयान बाजी कर रहे थे, उसमें बहुत सारी बयान बाजी और बातें भ्रामक भी रही होंगी; ऐसा राहू की दशा को देखकर सहज ही बताया जा सकता है। यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि अभी आने वाले समय में भी इस तरह के उत्पात बीच-बीच में देखने को मिल सकते हैं। हम लोगों को भी चाहिए कि खबरों की पुष्टि किए बिना खबरों को आगे बढ़ने से बचें, क्योंकि अभी राजनीतिक उथल-पुथल जारी रह सकती है। यदि हम बिना तथ्यों के अफवाहों को आगे बढ़ाएंगे तो देश में आंतरिक अस्थिरता भी देखने को मिल सकती है, क्योंकि मंगल द्वादशेश और मंगल सप्तमेश भी है। ऐसे में, राहु के प्रभाव से युक्त मंगल की दशा विपक्ष को मजबूती देने का काम करेगी।
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हालांकि विपक्ष का मजबूत होना भी जरूरी रहता है, लेकिन राहु की विजातीयता के चलते विपक्ष की मजबूती से अधिक सरकार का विरोध देखने को मिलेगा। विपक्ष की अच्छी नीतियों का समर्थन करना अच्छी बात है, लेकिन सरकार की अच्छी बातों पर भी विरोध करके विपक्ष में शामिल होना यह अनुकूल बात नहीं है। विपक्षी दल सरकार का विरोध करें यह तो ठीक है लेकिन असामाजिक तत्व और देश को कमजोर करने वाली शक्तियां भी विपक्ष को अपने प्रभाव में लेकर प्रभावी रह सकती हैं, जिसे सामान्य तौर पर अनुकूल कहना ठीक नहीं रहेगा। सत्तारूढ़ दल भाजपा के भीतर भी अंतर्कलह देखने को मिल सकती है। कांग्रेस के साथ-साथ अन्य पार्टियों भी खुलकर विरोध में आ सकती हैं।
यहां पर सप्तम और द्वादश भाव सिर्फ सत्तारूढ़ दल के विपक्ष की भूमिका ही नहीं निभाएगा बल्कि भारत से द्वेष या विरोध रखने वाले देशों को भी भारत के खिलाफ उकसाने का काम कर सकता है। ऐसे में भारत चीन के बीच टकराव की स्थिति बढ़ सकती है। पाकिस्तान भी भारत पर पुनः कोई हमला करने की सोच सकता है।
द्वादश भाव के स्वामी मंगल राहु के नक्षत्र और राहु के उप नक्षत्र में है। राहु की अंतर्दशा के प्रभाव में भी हैं। इसके चलते मंगल उग्र रूप धारण किए हुए हैं। िडकर फलस्वरूप भारत के परिवार यानी भारतीयजनों को समर्थन में लेकर विदेशी ताकतें भारत पर हावी होने की कोशिश कर सकती हैं। मंगल ग्रह, बुध की राशि मिथुन राशि में स्थित है। अतः देश के पश्चिमी राज्यों, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों की विभाजन की स्थितियां भी निर्मित हो सकती हैं।
प्राकृतिक आपदाओं विशेष कर भूकंप और भूस्खलन की स्थितियां भी देखने को मिल सकती हैं। चक्रवात और बाढ़ भी आ सकते हैं क्योंकि राहु को हम लोग अकल्पनीय चीजों का कारक भी मानते हैं। अतः कोई ऐसी विषम परिस्थिति सामने आ सकती है जिसकी हमने कल्पना नहीं की होगी। स्वाभाविक है कि राहु को नियंत्रित करने के लिए मंगल और बृहस्पति की आवश्यकता पड़ती है अर्थात कोई ऋषि परंपरा से संबंधित युक्ति और कठोर अनुशासन ही उस विषम परिस्थिति से निपटने में सहायक बन सकेगा। यह तो रही मंगल में राहु की दशा के प्रभाव की बात; आइए अब जानते हैं कि इस वर्ष की वर्ष कुंडली के क्या संकेत है?

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इस वर्ष के वर्षेश और मुंथा को देखकर ऐसा कहा जा सकता है कि देश के हालात, देश की स्थिति-परिस्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर होगी। नई जनरेशन के लिए सरकार जागरूक होगी और उनके लिए कुछ विशेष करने की सोच सकती है। पंचम भाव की मुंथा इस बात का संकेत कर रही है कि सरकार बच्चों और शिक्षा को लेकर कुछ नए कदम उठाने वाली है। इसे आप जुलाई 2026 में जंतर-मंतर में हुए प्रदर्शन का प्रभाव कहें या फिर पंचम भाव में मुन्था का प्रभाव; लेकिन इस वर्ष सरकार संतान और शिक्षा यानी नई जनरेशन, बच्चों, शिक्षा और ज्ञान को लेकर, बौद्धिक विकास को लेकर; कई नीतियां बनाने का काम कर सकती है। नई पीढ़ी न के विचारों को समझने के लिए भी कोई समिति बनाई जा सकती है। जो उनकी बातों को समझे, उनकी भावनाओं को समझे और सरकार को अवगत कराए।
वहीं वर्षेश की स्थिति इस बात का संकेत कर रही है कि स्त्री, पुत्र, मित्र, बंधु और प्रतिष्ठा आदि में वृद्धि होगी। देश के भीतर की नीतियां; महिलाओं और बच्चों को लेकर तो अच्छी रहेंगी। साथ ही, विभिन्न देशों से मित्रता बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा। भले पड़ोसी राष्ट्रों के साथ स्थितियां यथावत रह सकती हैं, लेकिन उनके साथ संबंधों को सुधारने में भी भारत की तरफ से कुछ सकारात्मक पहल की जा सकती है। तरल पदार्थ और सफेद रंग की वस्तुओं के निर्माण एवं विस्तार पर भी काम किया जा सकता है।
सरकार की छवि को सुधारने और विदेशों में देश की छवि को बेहतर बनाने के लिए भी कुछ नए प्रयत्न किए जा सकते हैं। विलासिता की वस्तुओं के उत्पादन और उन्हें सुलभ बनाने के लिए भी प्रयास किया जा सकते हैं। लेकिन इन्हीं क्षेत्रों में कुछ टैक्स इत्यादि भी बढ़ाए या घटाए जा सकते हैं। वैसे आमतौर पर सरकारें टैक्स घटाती कम ही हैं, बढ़ाती ज्यादा हैं लेकिन ज्योतिष का संकेत सिर्फ परिवर्तन की ओर संकेत कर रहा है। ऐसे में टैक्स बढ़ाया या फिर घटाया भी जा सकता है। आर्थिक समृद्धि की दृष्टिकोण से भी साल को बेहतर कहा जाएगा।
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वर्षदशा के अनुसार फलादेश:
15 अगस्त 2026 से 9 अक्टूबर 2026 के बीच राहु की दशा का प्रभाव रहेगा। राहु सप्तम भाव में है। यह अवधि आंतरिक उपद्र को बढ़ावा दे सकती है। देश अथवा देश के प्रमुख पदों पर बैठे हुए लोगों की साख पर भी इसका दुष्प्रभाव देखने को मिल सकता है। कानूनी व्यवस्था भी बाधित रह सकती है। कोई संक्रामक बीमारी भी इस अवधि में कुछ क्षेत्रों में देखने को मिल सकती है।
9 अक्टूबर 2026 से 26 नवंबर 2026 के बीच बृहस्पति की वर्ष दशा का प्रभाव रहेगा। बृहस्पति वर्ष कुंडली के द्वादश भाव में है जो आर्थिक अस्थिरता देने का काम कर सकता है। मूल्यवान चीजों के दामों में तेजी से बढ़ोत्तरी या कमी देखने को मिल सकती है। इस अवधि में सोने-चांदी के दामों में भी बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है। इन धातुओं के मूल्य में वैश्विक स्तर का भी प्रभाव पड़ता है और हम यहां पर भारत वर्ष की वर्ष दशा की चर्चा कर रहे हैं। अतः यह स्पष्ट रूप से समझ लें कि वैश्विक स्तर पर इन धातुओं का जो मूल्य होगा उसके अनुसार देश में कुछ उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा। देश विरोधी ताकतें मजबूत रह सकती हैं। इस अवधि में देश के भीतर कुछ तनाव भी देखने को मिल सकता है। व्यर्थ की यात्राएं भी संभावित हैं। ऐसे में देश के बड़े पदों पर बैठे हुए लोगों को चाहिए कि इस अवधि में यथा संभव यात्राओं से बचें और देश को आंतरिक मजबूती देने की योजना पर काम करें।
26 नवंबर 2026 से 23 जनवरी 2027 के बीच शनि की वर्ष दशा का प्रभाव रहेगा जो वर्ष कुंडली के अष्टम भाव में स्थित हैं। अतः इस अवधि में कुछ महत्वपूर्ण चीजें बाधित रह सकती हैं। दूसरे देशों के सत्ताधीशों से संबंध कमजोर रह सकते हैं। वैसे तो यह अवधि व्यापारिक निवेश इत्यादि के लिए ठीक नहीं है. क्योंकि जिन राष्ट्रों से राष्ट्रहित की बात चल रही है वह अपनी बातों पर कायम नहीं रह पाएंगे। हालांकि, शोध इत्यादि के दृष्टिकोण से यह अवधि अच्छी रह सकती है। ऐसे में, देश के भीतर यदि कुछ विशेष मामलों को लेकर कोई अनुसंधान चल रहा है अथवा वैज्ञानिक लोग कोई खोज कर रहे हैं, तो उस मामले में अनुकूलता देखने को मिल सकती है। देश के किसी चर्चित और प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए यह अवधि कमजोर कही जाएगी। यानी इस अवधि में कोई चर्चित या प्रतिष्ठित व्यक्ति अस्वस्थ हो सकता है या फिर उससे जुड़ी कोई बुरी खबर सुनने को मिल सकती है।
30 जनवरी 2027 से 16 मार्च 2027 के बीच बुध ग्रह की वर्ष दशा का प्रभाव रहेगा जो वर्ष कुंडली के द्वादश भाव में स्थित है। ऐसे में, यह समय दूरसंचार इत्यादि से संबंधित मामलों के लिए ठीक नहीं कहा जाएगा। इंटरनेट एवं फोन इत्यादि से जुड़ी हुई सेवाएं बीच-बीच में बाधित रह सकती हैं। इस बीच में देश के लोग मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट स्पीड इत्यादि को लेकर शिकायतें कर सकते हैं। देश की किसी व्यापारिक योजना में भी परेशानियां या अड़चनें देखने को मिल सकती हैं। किसी बीमारी के फैलने का डर भी रह सकता है। इस अवधि में व्यर्थ के मौखिक विवाद देखने को मिल सकते हैं. यानी नेताओं की बयानबाजियां देश के भीतर अशांति देने का काम कर सकती हैं। हालांकि, उन बयानबाजियों से कोई विशेष फायदा देश को नहीं होगा, लेकिन फिर भी ऐसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं।
16 मार्च 2027 से लेकर 6 अप्रैल 2027 के बीच केतु की वर्ष दशा का प्रभाव रहेगा जो वर्ष कुंडली के पहले भाव में स्थित है। ऐसे में, यह देश की ऊर्जा को व्यर्थ में खर्च करवाने का काम कर सकते हैं। इस अवधि में भी कोई बीमारी या अन्य आपदा देखने आ सकती है। देश को अपनी प्रतिष्ठा के प्रति सचेत रहना चाहिए अर्थात देश के प्रमुख पदों पर बैठे लोगों को इस अवधि में इस बात को लेकर विशेष सतर्क रहना है कि ऐसा कोई निर्णय वैश्विक स्तर पर नहीं लेना चाहिए जिससे देश की छवि खराब हो। इस समय वैश्विक मामलों को लेकर स्वयं के निर्णय या स्वयं की सोच को ही अधिक महत्व देना जरूरी रहेगा। किसी अन्य देश के दबाव में आकर किसी दूसरे देश से संबंधों को कमजोर करना ठीक नहीं रहेगा। यह समय अवधि यात्राओं के लिए भी अनुकूल नहीं है।
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6 अप्रैल 2027 से 6 जून 2027 के बीच शुक्र की वर्ष दशा का प्रभाव रहेगा जो देश की वर्ष कुंडली में दूसरे भाव में स्थित है। यह अच्छे परिणाम देगा। इस बीच में महिलाओं के लिए कुछ विशेष योजनाएं लागू की जा सकती हैं। देश के भीतर महिलाओं को और सशक्तिकरण मिलेगा। आर्थिक मामलों में भी अनुकूलता देखने को मिलेगी। लग्जरी आइटम्स की सुलभता बढ़ेगी। देश के भीतर काफी हद तक शांति देखने को मिलेगी।
6 जून 2027 से 24 जून 2027 के बीच सूर्य की वर्ष दशा का प्रभाव रहेगा जो वर्ष कुंडली में द्वादश भाव में है। अतः इस बीच में देश के मुखिया को सही गलत का निर्णय बहुत सूझबूझ के साथ लेना पड़ेगा। उनके लिए इस बीच में सिर्फ उन्हीं देश की यात्राएं करनी उचित रहेगा जिन देशों से पहले भी संबंध अच्छे रहे हो और फिलहाल वास्तव में कोई सार्थक परिणाम मिलने की संभावना हो। अन्य देशों के साथ व्यापारिक समझौते करते समय बहुत सूझबूझ से काम लेने की जरूरत रहेगी। देश के मुखिया का स्वास्थ्य भी कुछ हद तक पीड़ित रह सकता है। मंत्रिमंडल में अन्य मंत्रियों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश भी जरूरी रहेगी। आर्थिक मामले में कोई भी संदेहास्पद निर्णय लेना ठीक नहीं रहेगा। जिन मामलों में थोड़ा भी आर्थिक रिस्क नजर आए, उन मामलों और योजनाओं से दूरी बनाए रखना ही बेहतर होगा।
24 जून 2027 से 25 जुलाई 2027 के बीच चंद्रमा की वर्ष दशा का प्रभाव रहेगा जो वर्ष कुंडली के पहले भाव में स्थित है। यह मिले-जुले परिणाम देने का काम कर सकता है। कई अच्छे अवसर देश को मिलेंगे जिनमें लोगों की भावनाओं को लेकर काम किया जाएगा। देश की जनता, सरकार और देश के मुखिया के प्रति अच्छे भाव रखेगी लेकिन कुछ स्वास्थ्य समस्याएं इस बीच में भी देखने को मिल सकती हैं। सरकार से जुड़े हुए विभिन्न दलों के बीच सरकार को सामंजस्य बनाने की कोशिश तुलनात्मक रूप से अधिक ताकत के साथ करनी पड़ सकती है। हालांकि, अनुकूल बात यह है कि किसी न किसी तरह से सामंजस्य से बिठाया जा सकेगा। इस बीच में भी विदेशी यात्राओं के ग्राफ को कम रखना समझदारी का काम होगा।
25 जुलाई 2027 से 15 अगस्त 2027 के बीच मंगल की वर्ष दशा का प्रभाव रहेगा जो वर्ष कुंडली में लाभ भाव में स्थित है। यह देश को काफी अच्छे परिणाम देने का काम कर सकते हैं। सरकार के सहयोगी दल काफी अच्छे से काम करेंगे। पड़ोसी राष्ट्रों के साथ भी संबंध तुलनात्मक रूप से बेहतर हो सकेंगे। बहु प्रतीक्षित योजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। देश-विदेश की यात्राएं फायदेमंद रहेंगी। लग्जरी आइटम्स एवं अन्य चीजों का आयात निर्यात में बढ़ोत्तरी देखने को मिल सकती है। कुल मिलाकर, देश के भीतर अच्छी अनुकूलता देखने को मिल सकती है।
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विभिन्न पहलुओं पर संक्षिप्त चर्चा
स्वतंत्र भारत की कुंडली की महादशा, अंतर्दशा के आधार पर और वर्ष कुंडली, वर्षेश, मुंथा एवं वर्ष दशा के आधार पर कुछ इस तरह के परिणाम संभावित हैं:-
ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर भारत अग्रसर हो सकता है जिनमें तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात एआई इत्यादि के क्षेत्र में भारत बेहतर काम कर सकता है। अंतरिक्ष से जुड़े हुए मामलों में भी सकारात्मकता देखने को मिल सकती है। अनुसंधान और नवाचार के मामलों में भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं। शिक्षा और नई पीढ़ी को लेकर सरकार की नीतियां अनुकूल रह सकती हैं। स्वास्थ्य-व्यवस्था पर भी सरकार अच्छा काम करेगी। उसमें भी पोषण पर जोर दिया जा सकता है।
महिलाओं एवं छोटे बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर विशेष जागरूकता देखने को मिल सकती है। हालांकि, कुछ मौसमी बीमारियां या संक्रमण इस वर्ष फैल सकते हैं और लगभग पूरे वर्ष ही बीच-बीच में इनका प्रभाव देखने को मिल सकता है। महिलाओं के सशक्तिकरण पर सरकार विशेष रूप से ध्यान दे सकती है क्योंकि वर्षेश चंद्रमा है जो महिलाओं और जन भावनाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। अतः इन क्षेत्रों में सरकार के कदम सराहनीय रह सकते हैं।
वैसे तो संस्कृति एवं भारतीय पहचान पर इस वर्ष चंद्रमा के प्रभाव के कारण भी अच्छा काम हो सकेगा। लेकिन वर्ष कुंडली में बृहस्पति का कर्क राशि में होना इस बात का संकेत है कि सरकार देश के भीतर ही नहीं है बल्कि विभिन्न देशों में भारतीय संस्कृति को प्रचारित करने में विशेष ध्यान दे सकती है। अतः भारतीय योग, आयुर्वेद, संगीत नृत्य इत्यादि की वैश्विक चर्चा भी संभावित है।
पर्यटन एवं हेरिटेज टूरिज्म पर भी सरकारी इस वर्ष ध्यान दे सकती है, क्योंकि कई दशाओं में द्वादश भाव का प्रभाव देखने को मिल रहा है। विशेषकर वर्ष कुंडली में सूर्य, गुरु और बुध द्वादश भाव में हैं और चंद्रमा वर्षेश है। ऐसे में, पर्यटन एवं हेरिटेज टूरिज्म पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है क्योंकि सरकार नई जनरेशन पर विशेष ध्यान देने वाली है। ऐसे में, युवा शक्तियों पर भी सरकार का विशेष ध्यान रह सकता है। भारत की वैश्विक पहचान बनाने में सरकार अहम भूमिका निभा सकती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में भी भारत की कोशिश तीव्र गति से “ग्रो” करने की रह सकती है। मंगल की महादशा और लाभ भाव में शनि का गोचर भी इन मामलों में मदद करते हुए प्रतीत हो रहे हैं। लेकिन वर्ष कुंडली में मंगल तो अनुकूल है किंतु शनि आठवें भाव में है। लिहाजा विकास की रफ्तार बीच-बीच में बाधित रह सकती है। सरल शब्दों में, इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में सरकार काम करेगी, लेकिन उसमें कुछ खामियां रह सकती है या बीच-बीच में कुछ अड़चने भी आ सकती हैं। चंद्रमा का वर्षेश होना इस बात का संकेत कर रहा है कि शहरी जीवन में प्रदूषण, जल प्रबंधन, आवास, जैसी चुनौतियां बीच-बीच में देखने को मिल सकती हैं।
सरकार को जल भराव और ट्रैफिक इत्यादि पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता रहेगी। मौसम और प्राकृतिक संकेत बहुत अनुकूल नहीं हैं। कहीं अतिवृष्टि, कहीं अनावृष्टि वाली स्थिति रह सकती है। पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन, बादल फटने जैसी अथवा ओलावृष्टि जैसी घटनाएं भी देखने को मिल सकती हैं। चंद्रमा का वर्षेश होना इस बात का संकेत है कि पर्यावरण और ऊर्जा के मामले में सरकार जल संरक्षण, वृक्षारोपण और प्रदूषण नियंत्रण पर काम करने का प्रयास करती हुई दिखाई दे सकेगी। आम नागरिकों के लिए वर्ष परिश्रम के साथ-साथ अवसर भी लाने का काम करेगा। परिवारों को आर्थिक योजना, बचत और कौशल पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता रहेगी।
सारांश यह है कि ग्रहों के संकेत आशावादी हैं। दशाएं, गोचर, वर्ष कुंडली आदि के द्वारा यह संकेत मिल रहा है कि चुनौतियां तो रहेंगी, लेकिन भारत की प्रगति की धारा रुकेगी नहीं। आने वाला साल राष्ट्र के लिए परिश्रम, आत्मविश्वास, नवाचार और दूरदर्शिता के भाव देगा और हम इन रास्तों पर चलकर ऊंचाइ्यों तक जरूर पहुंचेंगे।
उम्मीद है हम सब की प्रार्थनाएं और प्रयास देश को नई गति देने के काम आएंगे। आप सबको स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत मंगल कामनाएं!
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इसी आशा के साथ कि, आपको यह लेख भी पसंद आया होगा एस्ट्रोसेज के साथ बने रहने के लिए हम आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इस साल बहरत को आज़ाद हुए 80 वर्ष हो जाएंगे।
भारत को अंग्रेज़ों से आज़ादी 15 अगस्त 1947 में मिली थी।
आज़ाद भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी थे।