जब भगवान परशुराम ने पृथ्वी से 21 बार क्षत्रियों के विनाश करने की शपथ ली

सनातन धर्म के लोगों को अक्षय तृतीया के पर्व का विशेष तौर से इंतज़ार रहता है और हो भी क्यों न? ये पर्व है ही इतना विशेष। कहा जाता है कि इस दिन किए गए पुण्य कर्मों के फल युग युगांतर तक मिलते रहते हैं। हर साल हिन्दू पंचांग के अनुसार वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पूरे देश में अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि अक्षय तृतीया के शुभ दिन ही भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का जन्म हुआ था, यही वजह है कि कई लोग इस दिन को परशुराम जयंती के तौर पर भी मनाते हैं।

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भगवान परशुराम के बारे में मान्यता है कि वे सनातन धर्म से जुड़े उन महापुरुषों में से एक हैं जो अभी तक जीवित हैं। कहा जाता है कि भगवान परशुराम बेहद आवेगी स्वभाव के थे। एक बार उन्होंने तीर चला कर गुजरात और केरल के इलाकों से समुद्र को पीछे धकेल दिया था। मान्यता ये भी है कि भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि का अभी धरती पर अवतरण होना बाकी है और जब भगवान विष्णु कल्कि के रूप में धरती पर अवतार लेंगे तब भगवान परशुराम ही कल्कि के गुरु की भूमिका निभाएंगे।

लेकिन इन सब के अलावा क्या आपको पता है कि भगवान परशुराम का नाम बचपन से ही परशुराम नहीं था और भगवान परशुराम ने पृथ्वी से 21 बार क्षत्रियों का नाश क्यों किया था? अगर नहीं पता है तो आज आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं। आज हम आपको इस लेख में भगवान परशुराम के नाम और उनके द्वारा क्षत्रियों के विनाश, दोनों ही कथाओं के बारे में बताएंगे लेकिन उससे पहले अक्षय तृतीया से जुड़ी कुछ विशेष जानकारी आपको दे देते हैं।

अक्षय तृतीया दिन, तिथि और मुहूर्त

तिथि : 14 मई 2021, शुक्रवार

मुहूर्त : 05:40:13 से 12:17:35 तक

अवधि : 06 घंटे 37 मिनट

जब भगवान ‘राम’ का नाम ‘परशुराम’ हो गया। 

भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। यह बड़ी ही रोचक बात है कि भगवान परशुराम को भगवान शिव का रूद्र अवतार भी कहा जाता है। ऐसे में भगवान परशुराम भगवान विष्णु और भगवान शिव के संयुक्त अवतार कहे जा सकते हैं।

भगवान परशुराम का नाम बचपन से ही परशुराम नहीं था बल्कि उनका बचपन में नाम राम था। मान्यता है कि भगवान परशुराम ने भगवान शिव की बहुत ही कठिन तपस्या की थी। इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें युद्ध कला का ज्ञान आशीर्वाद के रूप में दिया। यूं तो भगवान शिव ने भगवान परशुराम को आशीर्वाद के रूप में कई अस्त्र भेंट स्वरूप दिये लेकिन इन सभी अस्त्र व शस्त्र में से भगवान परशुराम को फरसा अत्यधिक प्रिय था। फरसे को ही परशु या फिर कुल्हाड़ी कहा जाता है। ऐसे में अपने साथ हमेशा फरसा रखने की वजह से ही भगवान परशुराम के बचपन के राम नाम के आगे परशु जोड़ दिया गया।

भगवान परशुराम ने क्षत्रियों का विनाश करने का संकल्प क्यों लिया?

मान्यता है कि भगवान परशुराम ने समस्त पृथ्वी से क्षत्रियों का 21 बार नाश किया था। यह बात सत्य तो है लेकिन अर्धसत्य है। दरअसल भगवान परशुराम ने क्षत्रियों का धरती से 21 बार नाश जरूर किया था लेकिन उन्होंने सिर्फ हैहय वंश के क्षत्रियों का ही नाश किया था। यह पूरी कथा राजा सहस्त्रार्जुन से जुड़ी है जो कि हैहय वंश का क्षत्रिय था। क्या है पूरी कथा, आइये जानते हैं।

भगवान परशुराम के पिता का नाम जमदग्नि था। जमदग्नि बहुत बड़े ऋषि थे। उसी दौरान एक बहुत बड़ा घमंडी राजा हुआ करता था जिसका नाम सहस्त्रार्जुन था। एक बार राजा सहस्त्रार्जुन किसी कारणवश अपने सैनिकों के साथ महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा। महर्षि जमदग्नि ने राजा और उसकी सेना का स्वागत किया और उनके लिए खाने-पीने की व्यवस्था की। महर्षि जमदग्नि के पास एक कामधेनु गौ थी जिसके दूध से ही उन्होंने राजा व उसकी पूरी सेना के भूख को शांत किया।

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कहते हैं कि राजा सहस्त्रार्जुन के मन में कामधेनु गाय के चमत्कारी गुण को देखकर लालच पैदा हो गया और उन्होंने जबर्दस्ती महर्षि जमदग्नि के आश्रम से कामधेनु गाय को उठा लिया। जब भगवान परशुराम को इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने राजा सहस्त्रार्जुन का वाढ कर दिया। बाद में राजा सहस्त्रार्जुन के पुत्र ने भी महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी जिसके चलते भगवान परशुराम की माँ भी पति के वियोग में सती हो गई। यह देख कर भगवान परशुराम अपने पिता के शरीर पर आए 21 जख्मों को देखकर यह प्रतिज्ञा करते हैं कि वो पूरी सृष्टि से हैहय वंश के क्षत्रियों का 21 बार समूल नाश करेंगे। 

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