भारत का वो विशेष मंदिर जहां मरने के बाद हम सब को जाना पड़ेगा

मृत्यु मानवों की नियति है। जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी तय है। यही यथार्थ है और ऐसा सत्य है जिसको कोई भी मनुष्य नकार नहीं सकता है। लोग मरने से डरते हैं क्योंकि किसी को पता नहीं कि मृत्यु के बाद क्या होता है? क्या मृत्यु के पार कोई जीवन है? क्या मृत्यु के बाद एक और नयी यात्रा शुरू होती है। ठीक ठीक जवाब किसी के पास नहीं है लेकिन सनातन धर्म इसका अपने तरीके से जवाब देता है। सनातन धर्म का मान्यता है कि मृत्यु के बाद हर मनुष्य की आत्मा को धर्मराज यमराज के सम्मुख प्रस्तुत होना होता है। मान्यता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप आस्तिक हैं या नास्तिक, आपको यमराज के दरबार में पेश होना है और आपके कर्मों के हिसाब से ही आपको स्वर्ग या नर्क भोगना पड़ता है।

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लेकिन अगर हम आज आपको ये बताएं कि हमारे देश में एक ऐसा मंदिर है जिसके बारे में मान्यता है कि किसी भी जातक की मृत्यु के बाद जब यमदूत उसे लेने आते हैं तो उसे लेकर सबसे पहले इसी मंदिर में जाते हैं। लेकिन ऐसा होता क्यों है? दरअसल ये मंदिर ही यमराज का दरबार है। जी हाँ! इसी मंदिर में यमराज का दरबार लगता है और यहीं चित्रगुप्त मनुष्य के जीवन के कर्मों का हिसाब करते हैं। कहाँ है ये मंदिर और क्या है इसकी विशेषता, आज के लेख में इसी पर बातें होंगी।

कहाँ है यमराज का मंदिर?

भारत के हिमांचल प्रदेश के चंबा जिले के भरमौर में यमराज का एक मंदिर है। खास बात ये है कि पूरे देश में यमराज का यह इकलौता मंदिर है। यही वजह है कि कोई भी भक्त इस मंदिर में प्रवेश करने से डरता है। लोग मंदिर को देखकर बाहर से प्रणाम कर के चले जाते हैं। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि किसी भी जातक की मृत्यु के बाद यमदूत उसकी आत्मा को सबसे पहले इसी मंदिर में लेकर आते हैं।

इस मंदिर के अंदर एक खाली कमरा है जिसके बारे में बताया जाता है कि इसी कमरे में चित्रगुप्त बैठते हैं। सबसे पहले आत्मा को इसी कमरे में लेकर आया जाता है जहां चित्रगुप्त उसके कर्मों का हिसाब-किताब करते हैं। इसके बाद उस आत्मा को यमराज के दरबार में पेश किया जाता है जहां उस आत्मा के कर्मों के हिसाब से यह तय किया जाता है कि उसकी आत्मा स्वर्ग जाएगी या नर्क।

कितना पुराना है मंदिर?

यह मंदिर कितना पुराना है, इसकी सटीक जानकारी किसी के पास नहीं है लेकिन इस मंदिर के जीर्णोद्धार के प्रमाण मिलते हैं जिसके मुताबिक यह बताया जाता है कि मंदिर का जीर्णोद्धार छठी शताब्दी में चंबा रियासत के राजा ने करवाया था लेकिन यह जीर्णोद्धार भी सिर्फ मंदिर की सीढ़ियों का हुआ था। 

खास बात ये है कि गरुड़ पुराण में यमराज के दरबार का जिस तरह से जिक्र किया गया है यमराज के इस मंदिर की बनावट उससे मिलती-जुलती है। यही वजह है कि लोग ये मानते हैं कि यह यमराज का वो मंदिर है जहां यमराज का दरबार लगता है। 

मसलन जिस तरह से गरुड़ पुराण में बताया गया है कि यमराज के दरबार में चारों दिशाओं में एक-एक द्वार बने हुए हैं। ठीक उसी तरह इस मंदिर के भी चारों दिशाओं में चार द्वार मौजूद हैं। हालांकि ये चार दरवाजे अदृश्य हैं। लेकिन लोकमान्यताओं के अनुसार ये चार दरवाजे अलग-अलग धातु से निर्मित हैं। जैसे कि एक दरवाजा सोने का, दूसरा चांदी, तीसरा लोहा और चौथा तांबे का बना हुआ है। आत्मा के कर्मों के हिसाब से उन्हें इन चार द्वारों से स्वर्ग या नर्क भेजा जाता है। जैसे कि सोने और चांदी के दरवाजे स्वर्ग जाने के लिए हैं जबकि तांबा और लोहे से निर्मित दरवाजों से आत्माओं को नर्क में भेजा जाता है। 

मंदिर से जुड़ी और खास बातें

इस मंदिर की और भी खास बातें हैं। यह मंदिर वैतरणी नदी के किनारे बना हुआ है जहां गौ दान की परंपरा रही है। वहीं यहाँ वैसे जातक पिंड दान के लिए भी आते हैं जिनके अपने असामयिक मृत्यु को प्राप्त हो गए। यहाँ चित्रगुप्त के कमरे में आत्म के उल्टे पैरों के निशान बने हुए हैं। इसके अलावा मंदिर में एक धूना जलती रहती है जो कबसे जल रही है और इसे किसने जलाया है, इसकी जानकारी भी किसी को नहीं है।

ऐसे में यदि आपको कभी यह मौका मिले कि आप इस मंदिर के आसपास मौजूद हों तो इस मंदिर के दर्शन जरूर करें। एहतियात के तौर पर इस मंदिर के नियमों का पालन करना न भूलें और जब भी जाएं तो कोरोना के नियमों का पालन करते हुए जाएं।

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