आज है याज्ञवल्क्य जयंती, जानें इस दिन का महत्व और शुभ मुहूर्त

महर्षि याज्ञवल्क्य, जिन्हें चारों वेदों, ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद के ज्ञाता का दर्जा प्राप्त है उनकी जयंती को याज्ञवल्क्य जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष कार्तिक शुक्ल की द्वादशी, यानि कि आज 28 फ़रवरी 2020, शुक्रवार के दिन याज्ञवल्क्य जयंती मनाई जाएगी।

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बताया जाता है कि महर्षि याज्ञवल्क्य आध्यात्म से जुड़ी बातों के एक बेहतरीन वक्ता, होने के साथ-साथ एक महान ज्ञानी, योगी, उच्च कोटि के धर्मात्मा और श्रीराम कथा के वक्ता के रूप में भी जाने जाते हैं।

याज्ञवल्क्य जयंती शुभ मुहूर्त 

बात करें अगर याज्ञवल्क्य जयंती के दिन के शुभ मुहूर्त की तो ये 12 बजकर 10 मिनट 57 सेकंड से शुरू होकर 12 बजकर 57 मिनट 06 सेकंड तक रहने वाला है। ऐसे में अगर आपको इस दिन कोई भी शुभ काम करना हो तो उसे आप इस शुभ मुहूर्त में कर सकते हैं। 

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याज्ञवल्क्य जयंती महत्व 

महर्षि याज्ञवल्क्य की जयंती के मौके पर प्रार्थना, पूजा और सांस्कृतिक सभाएं इत्यादि आयोजित की जाती है। इसके अलावा इस मौके पर कई जगह महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा रचित ग्रंथों (शुक्ल यजुर्वेद संहिता, शतपथ ब्राह्मण की रचना, बृहदारणयकोपनिषद, याज्ञवल्क्य स्मृति) का वर्णन भी किया जाता है। महर्षि याज्ञवल्क्य के जीवन उपदेशों को अपनाकर लोग अपने जीवन को सुगम और ख़ुशनुमा बनाते हैं।

महर्षि याज्ञवल्क्य ने ही किया था श्री राम का वर्णन 

भारतीय ऋषि-परंपरा के अनुसार महर्षि याज्ञवल्क्य को ऋषियों-मुनियों में सबसे उच्च दर्जा दिया गया है। इसके अलावा पुराणों में महर्षि याज्ञवल्क्य को ब्रह्मा जी का साक्षात् अवतार भी माना गया है, यही वजह है जिसके चलते महर्षि याज्ञवल्क्य को ब्रह्मर्षि के नाम से भी जाना जाता है। यज्ञ संपन्न कराने में उन्होंने जो महारत हासिल की थी उसके चलते उनका नाम याज्ञवल्क्य पड़ा। महर्षि याज्ञवल्क्य को याज्ञिक सम्राट का दर्जा प्राप्त था। बताया जाता है कि यज्ञ समपन्न कराने में वो इस कदर निपुण हो चुके थे मानो वो उनके बाएं हाथ का खेल हो। 

ब्रह्मरथ और देवी सुनंदा के पुत्र महर्षि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं। महर्षि याज्ञवल्क्य की पहली पत्नी का नाम मैत्रेयी और दूसरी पत्नी का नाम कात्यायनी था। जहाँ एक तरफ मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थीं वहीं दूसरी तरफ कात्यायनी के बारे में कहा जाता है कि वो खुद ऋषि भारद्वाज की पुत्री थी। 

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बताया जाता है कि एक बार राजा जनक ने एक शास्त्रार्थ का आयोजन कराया जिसमें ये शर्त रखी गयी कि जो कोई भी इंसान ब्रह्मविद्या का सर्वोच्च ज्ञानी होगा उसे इनाम में सोने के सींगों वाली एक हज़ार गायें दी जाएँगी। आपको जानकर अचरज होगा कि इस शास्त्रार्थ में महर्षि याज्ञवल्क्य के अलावा और किसी ने भाग तक नहीं लिया। शास्त्रार्थ में महर्षि याज्ञवल्क्य से अनेकों जटिल प्रश्न पूछे गए जिसके जवाब में महर्षि याज्ञवल्क्य एक बार भी नहीं अटके या रुके। और अंत में महर्षि याज्ञवल्क्य इस शास्त्रार्थ में विजयी हुए। इसके परिणामस्वरूप राजा जनक ने उन्हें अपने गुरू और सलाहकार के रूप में अपने साथ ही रख लिया।

महर्षि याज्ञवल्क्य को योगीश्वर याज्ञवल्क्य के नाम से भी जाना जाता है 

अनेकों नाम और सबके पीछे अपनी वजह की ही तरह महर्षि याज्ञवल्क्य का एक नाम योगीश्वर याज्ञवल्क्य भी है , इसके पीछे का कारण ये बताया जाता है कि महर्षि याज्ञवल्क्य ने प्रयाग में ऋषि भारद्वाज को श्रीराम के पावन चरित्र का श्रवण कराया था। इस बात का वर्णन श्री रामचरितमानस में भी किया गया है। 

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