जानें क्या है दक्षिण भारत में पोंगल का महत्व

प्रकृति को समर्पित पोंगल का त्यौहार दक्षिण भारत में नए साल की शुरुआत के साथ होता है, किसान धान की फसल काटने के बाद अपनी खुशी प्रकट करते हुए पोंगल का त्यौहार मनाते हैं । विविधता में एकता समेटे भारत की संस्कृति में पोंगल पर्व का विशेष महत्व है, और इस साल पोंगल का पर्व 14 जनवरी से 17 जनवरी तक मनाया जाएगा। 4 दिनों तक चलने वाले इस पर्व को नए साल की शुरुआत के तौर पर भी मनाया जाता है, पोंगल का यह पर्व तमिल महीने तई की 1 तारीख से शुरू होता है। इस पर्व का इतिहास हजारों साल पुराना है। और इस पर का महत्व न केवल भारत में बल्कि कनाडा, श्रीलंका, अमेरिका समेत दुनिया के कई हिस्सों में है। जहां तमिल निवासी पोंगल पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं, तो आइए नीचे दिए गए इस लेख में जानते हैं पोंगल से जुड़ी खास बातें ।

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 पोंगल पर्व का महत्व 

दक्षिण भारत में पोंगल पर्व का विशेष महत्व है, पंचांग के आधार पर देखें तो इस त्यौहार को तमिल माह की 1 तारीख यानि 14 या 15 जनवरी से मनाया जाता है, 4 दिनों तक चलने वाले इस पर्व को दक्षिण भारत में बड़े धूमधाम, उत्साह और उल्लास के साथ मनाते हैं। जनवरी माह तक खेतों में गन्ने और धान की फसल पक कर तैयार हो जाती है, और खेतों में लहलहाने लगती है, जिसे देखकर किसानों की खुशी का ठिकाना नहीं होता और वह प्रकृति का आभार प्रकट करते हुए सूर्य देव इंद्र देव साथ ही साथ पशुधन यानी कि खेतों में मदद करने वाले पशु जैसे गाय और बैल की पूजा करते हैं, और इस तरह पोंगल पर्व की शुरुआत होती है, मान्यताओं के अनुसार इस पर्व की शुरुआत के साथ ही तमिल निवासी अपनी बुरी आदतों का बहिष्कार कर अच्छी आदतों को ग्रहण करते हैं और अपने घरों के साथ-साथ अपने मन की मैल को भी साफ कर सबके साथ मिलकर पोंगल का पर्व मनाते है।

नए साल के साथ शुरू होता है पोंगल का उत्सव

दक्षिण भारत में पोंगल पर्व के साथ नववर्ष का आरंभ हो जाता है, इस दिन लोग अपने घरों को सजाते हैं घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाते हैं और साफ-सुथरे या नए वस्त्र पहनकर एक दूसरे के घर जाते हैं पोंगल का पर्व विशेष तौर पर सूर्य की उपासना के लिए माना जाता है पोंगल के दिन लोग सूर्य देव की उपासना करते है और प्रसाद का भोग लगाते हैं, जिसे साफ बर्तन में दूध, गुड़ और मेवों की मदद से बनाया जाता है। सूर्य देव को भोग लगाने वाले प्रसाद को ‘पगल’ कहते है। और ‘पगल’ से ही पोंगल पर्व का नाम पड़ा है । चार दिनों तक पोंगल का त्यौहार जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। और हर दिन को अगल-अगल नाम दिए गए है । पहला दिन ‘भोगी पोंगल’ के नाम से जाना जाता है । दूसरा दिन ‘सूर्य पोंगल’ कहलाता है। तीसरा दिन ‘मट्टू पोंगल’ और चौथे दिन को ‘कन्नम पोंगल’ कहते हैं । दक्षिण भारत में पोंगल पर्व के चारों दिनों का विशेष महत्व है, और इसे बड़ी धूम-धाम और उत्साह के साथ मनाया जात है । 

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पोंगल से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने अपने वाहन नंदी जी को बैल के रूप में सजा कर धरती पर मनुष्य से मिलने के लिए भेजा,भगवान शिव जी ने नंदी को मनुष्य से मिल कर संदेश देने का आदेश भी दिया, उन्होंने कहा, कि मनुष्य को धरती पर जाकर मेरी तरफ से यह संदेश देना कि वह हर दिन पहले तेल मालिश करें फिर स्नान करें। लेकिन नंदी ने उनके संदेश को धरती पर जाकर लोगों के बीच गलत तरीके से बताया, कहा कि शिव जी की तरफ से यह संदेश है कि आप एक माह में केवल एक बार ही भोजन करें। जिसके बाद भगवान शिव उनसे अत्यंत क्रोधित हुए और नंदी को सजा के तौर पर धरती पर हमेशा के लिए बैल के रूप में भेज दिया। जिसके बाद से खेतों में हल जोतने के लिए बैल की मदद ली जाने लगी यही कारण है जब खेतों में फसल लहराने लगती है तो किसान खुश होकर पोंगल का पर्व मनाते है और सूर्य देव के साथ-साथ पशुधन की भी पूजा करते है  

     

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