जानें क्यों होता है पितृ दोष और क्या है इसका निवारण उपाय

हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार हर माह की अमावस्या तिथि को पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है लेकिन, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध करने और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए निर्धारित किया गया है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनके मोक्ष प्राप्ति के लिए श्राद्ध करते हैं। इस समय को पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष के नाम से जाना जाता है।

बहुत से लोगों के मन में यह जानने की जिज्ञासा होती है कि, आखिर ये पितृदोष है क्या?  पितृ -दोष शांति के सरल उपाय क्या हैं? पितृ, या पितृ गण कौन हैं?  तो आइये एक-एक करके आपके इन सभी सवालों का जवाब इस आर्टिकल के माध्यम से देते हैं।

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पितृ या पितृ गण कौन हैं?

पितृ गण, हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है, क्योंकि उन्होंने हमारे जीवन के लिए कोई ना कोई उपकार अवश्य किया होता है। मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है, पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है, एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है। आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है, वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं। अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो, ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं कि,  इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया।

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इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है। वहाँ से आगे, यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है, जो परमात्मा में समाहित होती है, जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता है। मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।

पितृ दोष क्या होता है?  

ऐसी मान्यता है कि पितृ दोष का कारण पितर लोक में वास कर रहे हमारे पूर्वजों का कोप है।

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कुंडली में पितृदोष

पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि, किस ग्रह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है।

जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहु -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है। इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है।

इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है। अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु, शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है, इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी, सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर लें, तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है।

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विभिन्न ऋण और पितृदोष 

हमारे ऊपर मुख्य रूप से 3 ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने (ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है। ये ऋण हैं: पितृ ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण।

पितृ ऋण 

पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा , ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है। पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देते हैं। हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करते हैं, और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलते रहते हैं, पर आज के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है? 

पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है। इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है। इसमें घर में आर्थिक अभाव, दरिद्रता, संतानहीनता, संतान को विभिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि शामिल हैं।

देव ऋण 

माता-पिता प्रथम देवता होते हैं, जिनके कारण भगवान गणेश महान बने| इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी, दुर्गा माँ, भगवान विष्णु आदि आते हैं, जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है। हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे, लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है। इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं।

ऋषि ऋण 

जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए, वंश वृद्धि की, उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है। उनका ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है। इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं, इसलिए उनका श्राप पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।

आइए इन संकेतों के माध्यम से जानते हैं कि आपकी जन्मकुंडली में पितृ दोष है की नहीं।

पूर्वजों का स्वप्न में बार-बार आना 

“मेरे एक मित्र ने बताया कि उनका अपने पिता के साथ झगड़ा हो गया है, और वह झगड़ा काफी सालों तक चला। पिता ने अपनी मृत्यु के समय अपने पुत्र से मिलने की इच्छा जाहिर की परंतु, पुत्र मिलने नहीं आया। पिता का स्वर्गवास हो गया हुआ। कुछ समय पश्चात मेरे मित्र मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि, उन्होंने अपने पिता को बिना कपड़ों के देखा है। ऐसा स्‍वप्‍न पहले भी कई बार आ चुका है।”

शुभ कार्य में अड़चन  

कभी-कभी ऐसा होता है कि, आप कोई त्यौहार मना रहे हैं या कोई उत्सव आपके घर पर हो रहा है और ठीक उसी समय पर कुछ ना कुछ ऐसी घटना घटित हो जाती है कि, जिससे रंग में भंग डल जाता है। ऐसी घटना घटित होती है कि, खुशी का माहौल गम में बदल जाता है। मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि, शुभ अवसर पर कुछ अशुभ घटित होना पितरों की असंतुष्टि का संकेत है।

संबंधित लेख: पितृ पक्ष में श्राद्ध और पिंडदान का महत्व एवं तर्पण की विधि।

मकान या  प्रॉपर्टी की  खरीद में दिक्कत आना 

आपने देखा होगा कि, एक बहुत अच्छी प्रॉपर्टी, मकान, दुकान या जमीन का एक हिस्सा किन्ही कारणों से बिक नहीं पा रहा है। यदि कोई खरीददार मिलता भी है तो बात नहीं बनती। यदि कोई खरीददार मिल भी जाता है और सब कुछ हो भी जाता है तो, अंतिम समय पर सौदा कैंसिल हो जाता है। इस तरह की स्थिति यदि लंबे समय से चली आ रही है तो यह मान लेना चाहिए कि, इसके पीछे अवश्य ही कोई ऐसी कोई अतृप्‍त आत्‍मा है, जिसका उस भूमि या जमीन के टुकड़े से कोई संबंध रहा हो।

संतान ना होना

मेडिकल रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य होने के बावजूद संतान सुख से वंचित रहना। हालांकि आपके पूर्वजों का इस से संबंध होना लाजमी नहीं है, परंतु ऐसा होना बहुत हद तक संभव है जो भूमि किसी निसंतान व्यक्ति से खरीदी गई हो वह भूमि अपने नए मालिक को संतानहीन बना देती है।

उपरोक्त सभी प्रकार की घटनाएं या समस्याएं आप में से बहुत से लोगों ने अनुभव की होंगी। इसके निवारण के लिए लोग समय और पैसा नष्ट कर देते हैं, परंतु समस्या का समाधान नहीं हो पाता। क्या पता हमारे इस लेख से ऐसे ही किसी पीड़ित व्यक्ति को कुछ प्रेरणा मिले इसलिए निवारण भी स्पष्ट कर रहा हूँ।

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पितृ दोष कि शांति के उपाय

  • किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं, और रोज़ उसमें जल डालें, उसकी देख -भाल करें। जैसे-जैसे वृक्ष फलता-फूलता जाएगा, पितृ -दोष दूर होता जाएगा, क्योंकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता, इतर-योनियाँ, पितर आदि निवास करते हैं।
  • सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान, सर्प पूजा, ब्राह्मण को गौ-दान, कन्या-दान, कुआं, बावड़ी, तालाब आदि बनवाना, मंदिर प्रांगण में पीपल, बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना, एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना, प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्भागवत का पाठ करना चाहिए।
  • वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र, स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है। जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो, शांत हो जाती है। अगर नित्य पठन संभव ना हो, तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए। वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है।
  • भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है।
    शिव गायत्री मंत्र – “ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात।”
  • अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा, घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है।
  • अपने माता -पिता, बुजुर्गों का सम्मान, सभी स्त्री कुल का आदर/सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।
  • पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए “हरिवंश पुराण ” का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें।
  • सूर्य पिता हैं। अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर, उसमें लाल फूल, लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर 11 बार “ॐ घृणि सूर्याय नमः “ मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है।
  • अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध, चीनी, सफ़ेद कपड़ा, दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।

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पितृ दोष  निवारण के लिए करें  विशेष उपाय  –  (नारायणबलि /  नागबलि )

अक्सर हम देखते हैं कि कई लोगों के जीवन में परेशानियां समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। वे चाहे जितना भी समय और धन खर्च कर लें, लेकिन उनका काम सफल नहीं होता है। ऐसे लोगों की कुंडली में निश्चित रूप से पितृदोष होता है। यह दोषी पीढ़ी दर पीढ़ी कष्ट पहुंचाता रहता है, जब तक कि इसका विधि-विधानपूर्वक निवारण न किया जाए। ये आने वाली पीढ़ीयों को भी कष्ट देता है। इस दोष के निवारण के लिए कुछ विशेष दिन और समय तय हैं जिनमें इसका पूर्ण निवारण होता है। श्राद्ध पक्ष यही अवसर है जब पितृदोष से मुक्ति पाई जा सकती है। इस दोष के निवारण के लिए शास्त्रों में नारायणबलि का विधान बताया गया है।

एस्ट्रोसेज का अभिन्न हिस्सा बने रहने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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