ज़रूर पढ़ें छठ पूजा से जुड़ी ये प्रचलित पौराणिक कथाएं !

दिवाली के 6 दिन बाद सूर्योपासना का अनुपम महापर्व “छठ” मनाया जाता है। चार दिनों तक मनाया जाने वाला का यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश सहित संपूर्ण भारत वर्ष में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र मास में और दूसरी बार कार्तिक मास में। यह पर्व पारिवारिक सुख-समृद्धि और मनचाहा फल पाने के लिए मनाया जाता है। छठ पूजा को स्त्री और पुरुष दोनों ही समान रूप से मनाते हैं। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को होती है, और समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस पूजा के दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं, जिसमें वे पानी तक ग्रहण नहीं करते।

इस साल छठ पूजा की शुरुआत 31 अक्टूबर, नहाय-खाय से होगी और इसकी समाप्ति 3 नवंबर को सुबह सूर्य के अर्घ्य के साथ होगी। सद्भावना और उपासना के इस पर्व के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं, तो चलिए आज इस लेख में आपको छठ पूजा से जुड़ी कुछ पौराणिक कथाएं बताते हैं –

कर्ण ने शुरू की सूर्य देव की पूजा

मान्यता के अनुसार महापर्व छठ की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इस पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण के द्वारा हुई थी। कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कथाओं के अनुसार कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह हर दिन घंटों तक कमर जितने पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे। उनके महान योद्धा बनने के पीछे सूर्य की कृपा थी। आज के समय  में भी छठ में अर्घ्य देने की यही पद्धति प्रचलित है।

राम-सीता ने की सूर्य की पूजा 

एक पौराणिक लोक कथा के अनुसार जब भगवान श्रीराम लंका पर विजय प्राप्त कर लौटे तो राम राज्य की स्थापना की जा रही थी। कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन ही राम राज्य की स्थापना हो रही थी, उस दिन भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्य देव की आराधना की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर उन्होंने सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। ऐसा माना जाता है, कि तब से लेकर आज तक यही परंपरा चली आ रही है।

पांडवों को वापस मिला उनका राजपाट

कुछ कथाओं के अनुसार पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा-उपासना करने का उल्लेख है। द्रौपदी अपने परिवार के उत्तम स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए नियमित तौर पर सूर्य पूजा किया करती थीं। कहा जाता है कि जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने सूर्य भगवान की आराधना की और छठ का व्रत रखा। सूर्य देव के आशीर्वाद से उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी हुई और पांडवों का खोया हुआ राजपाट उन्हें वापस मिल गया।

प्रियंवद और मालिनी की कहानी

पुराणों के अनुसार राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया और राजा प्रियंवद की पत्नी मालिनी को यज्ञ आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति तो हुई लेकिन वह बच्चा मृत पैदा हुआ। प्रियंवद अपने मृत्य पुत्र के शरीर को लेकर श्मशान गया और पुत्र वियोग में अपने  भी प्राण त्यागने लगा। तभी भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और उन्होंने प्रियंवद से कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। हे राजन तुम मेरा पूजन करो और दूसरों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से सच्चे मन से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। कहा जाता है, कि तब से लोग संतान प्राप्ति के लिए छठ पूजा का व्रत करते हैं। 

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