योगिनी एकादशी व्रत : वो व्रत जिसे करने से किसी श्राप से भी मुक्ति मिल जाती है

सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत महत्व है। इस दिन जगत के पालनकर्ता भगवान श्री हरि विष्णु की पूजा की जाती है। एकादशी का दिन भगवान विष्णु को ही समर्पित होता है। यही वजह है कि इस दिन को हरिवासर भी कहा जाता है यानी कि हरि अर्थात भगवान विष्णु का दिन। 

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हिन्दू पंचांग के प्रत्येक महीने में दो एकादशी की तिथि पड़ती है। अब चूंकि आषाढ़ का महीना शुरू हो चुका है। ऐसे में इस महीने में पड़ने वाली पहली एकादशी का नाम योगिनी एकादशी है। ऐसे में आज हम आपको इस लेख में योगिनी एकादशी की तिथि, महत्व, मुहूर्त और पूजा विधि बताने वाले हैं।

कब है योगिनी एकादशी?

प्रत्येक वर्ष आषाढ़ महीने के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को योगिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है। साल 2021 में योगिनी एकादशी 05 जुलाई को सोमवार के दिन पड़ रही है। ऐसे में 05 जुलाई को योगिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा और अगले दिन यानी कि 06 जुलाई को मंगलवार के दिन पारण किया जाएगा। 

योगिनी एकादशी का पारण मुहूर्त सुबह 05 बजकर 28 मिनट से शुरू हो जाएगा और 08 बजकर 15 मिनट पर इसका समापन हो जाएगा। ऐसे में पारण मुहूर्त की कुल अवधि 02 घंटे 46 मिनट की हुई।

योगिनी एकादशी का महत्व

सनातन धर्म में योगिनी एकादशी का बड़ा महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। मान्यता है कि योगिनी एकादशी के व्रत से जातकों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और पीपल के वृक्ष को काटने जैसे पाप से भी मुक्ति मिल जाती है। इस व्रत को रखने से 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने जितना पुण्य फल प्राप्त होता है। साथ ही इस व्रत को करने से किसी के दिये हुए श्राप का भी निवारण हो जाता है। योगिनी एकादशी का व्रत करने वाले जातकों का जीवन सुख-समृद्धि से भर जाता है।

आइये अब आपको योगिनी एकादशी की पूजा विधि बता देते हैं।

योगिनी एकादशी पूजा विधि

  • योगिनी एकादशी के व्रत नियमों की शुरुआत दशमी तिथि से हो जाती है। ऐसे में योगिनी एकादशी का व्रत करने वाले जातकों को दशमी तिथि की रात्रि में जौ, गेहूं और मूंग की दाल से बनी किसी भी चीज का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही दशमी तिथि की रात्रि में भी व्रत करने वाले जातकों को नमक का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और स्नान कर के साफ वस्त्र धारण कर लें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें।
  • योगिनी एकादशी के दिन कलश स्थापना किए जाने का प्रावधान है। कलश स्थापना करने के बाद उस कलश के ऊपर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें और उनकी पूजा करें। भगवान विष्णु को तुलसी पत्र जरूर अर्पित करें।
  • एकादशी की रात्रि जागरण करते हुए भगवान का भजन या ध्यान करते रहें।
  • यह व्रत दशमी तिथि से शुरू होकर द्वादशी तिथि को प्रातः काल में दान करने के बाद समाप्त हो जाता है। पारण मुहूर्त में दान-दक्षिणा के बाद व्रत को खोला जा सकता है।

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