जानिए कब है दशहरा, इस दिन कैसे करें पूजा और क्या है शुभ मुहूर्त

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माँ दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है, और नवरात्रि के बाद मनाया जाता है दशहरा। दशहरा को कहीं विजयदशमी तो कहीं आयुधपूजा के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार दशहरा का यह पावन पर्व हर साल अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। 

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इस वर्ष दशहरा 25 अक्टूबर, यानि रविवार के दिन मनाया जायेगा। विजयदशमी या दशहरा के दिन देवी जया और विजया की पूजा की जाती है। आइए अब इस त्यौहार के बारे में और अधिक जानते हैं, जानते हैं की आखिर यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है? और क्या है इसके पीछे की वजह और इस त्यौहार का महत्व।

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इस वर्ष दशहरा/विजयदशमी का शुभ मुहूर्त 

दशहरा मुहूर्त की संपूर्ण और विस्तृत जानकारी जानने के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं। इस दिन का शुभ मुहूर्त : 

विजयदशमी मुहूर्त Delhi, के लिए 

विजय मुहूर्त :13:57:06 से 14:41:57 तक

अवधि :0 घंटे 44 मिनट अपराह्न 

मुहूर्त :13:12:15 से 15:26:48 तक

( अपने शहर के अनुसार शुभ मुहूर्त जानें)

कैसे पड़ा इस दिन का नाम दशहरा ?

जब अपने अहंकार में डूबे रावण ने बिना सोचे-समझे माता सीता का अपहरण कर लिया था, तब क्रोधित प्रभु श्रीराम ने माता सीता को बंदी ग्रह से छुड़ाने के लिए रावण को युद्ध के लिए ललकारा। रावण और प्रभु श्रीराम के बीच यह युद्ध दस दिनों तक चलता रहा। अंत में आश्विन शुक्ल दशमी तिथि को भगवान राम ने माँ दुर्गा से प्राप्त दिव्यास्त्र की मदद से अहंकारी रावण का अंत कर दिया। 

रावण की मृत्यु को असत्य पर सत्य और न्याय की जीत के उत्सव के रूप में मनाया गया। प्रभु राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी इसलिए यह दिन विजया दशमी कहलाया। दस सिरों वाले रावण के अंत की वजह से ही इसे कहीं दशहरा तो कहीं दसहारा भी कहा जाता है।

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यह वही दिन है जिस दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। महिषासुर नामक इस दैत्य ने तीनों लोक में उत्पात मचाया था। देवता भी जब इस दैत्य से परेशान आ गए थे तब वो माँ दुर्गा की शरण में गए थे। देवताओं को और पूरी दुनिया को महिषासुर से मुक्ति दिलाने के लिए देवी ने आश्विन शुक्ल दशमी तिथि को महिषासुर का अंत किया था। देवी की विजय से प्रसन्न होकर देवताओं ने विजया देवी की पूजा की और तभी से यह दिन विजया दशमी कहलाया।

दशहरा/विजयदशमी पूजन विधि – 

विजयदशमी के दिन अपराजिता पूजा का भी विधान बताया गया है। क्या होती है अपराजिता पूजा? और आप कैसे करें यह पूजा, यह सब जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। आइये अब जानते हैं दशहरा पूजा का विधान।

  • दशहरा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। 
  • इसके बाद गेंहू या फिर चूने से दशहरा की प्रतिमा बनाएँ। 
  • इसके बाद गाय के गोबर से नौ गोले (कंडे) बना लें। इन कंडों पर पर जौ और दही लगायें। 
  • इस दिन बहुत से लोग भगवान राम की झांकियों पर जौ चढ़ाते हैं और कई जगह लड़के अपने कान पर जौ रखते हैं। 
  • अब इसके बाद गोबर से दो कटोरियाँ बना लें, एक कटोरी में कुछ सिक्के भर दें और दूसरी में रोली, चावल, फल, फूल, और जौ डाल दें। 
  • बनाई हुई प्रतिमा पर केले, मूली, ग्वारफली, गुड़, और चावल चढ़ाएं। 
  • इसके बाद उसके समक्ष धूप-दीप इत्यादि प्रज्वलित करें। 
  • इस दिन लोग अपने बहीखाता की भी पूजा करते हैं। ऐसे में आप अपने बहीखाते पर भी जौ, रोली इत्यादि चढ़ाएं। 
  • ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार उन्हें दान दें। 
  • रावण दहन के बाद घर के बड़े लोगों का आशीर्वाद लें।

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दशहरा के दिन कई जगहों पर रावण के बड़े-बड़े पुतले तैयार किये जाते हैं और फिर उनका दहन किया जाता है। इसके पीछे मान्यता यह होती है कि हम अपने अंदर की बुराई का अंत कर के अच्छाई की लौ प्रज्वलित करें। दशहरा के इस दिन को काफी शुभ माना गया है, इसलिए इस दिन कोई भी नया काम शुरू करने की भी मान्यता है। इसके अलावा दशहरा के दिन बहुत से लोग वाहन, इलेक्ट्रॉनिक का कोई सामान, सोने के आभूषण, नए कपड़े खरीदने को भी शुभ मानते हैं।

पूजा में ज़रूर शामिल करें यह मंत्र

राम रामाय नम:- ॐ अपराजितायै नमः- पवन तनय बल पवन समाना, बुद्धि विवेक विज्ञान निधाना

कवन सो काज कठिन जग माहि, जो नहीं होत तात तुम पाहि ॥

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दशहरा के दिन भूल से भी ना करें यह काम 

यूँ तो दशहरा का पर्व अबूझ मुहूर्त माना गया है लेकिन क्या आप जानते हैं कि, इस दिन किस शुभ काम को करने की मनाही होती है? आइये हम आपको बताते हैं।

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दशहरा यानी विजय दशमी के दिन को अनेकों मांगलिक कार्य करने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तो इस दिन को अबूझ भी माना गया है। ऐसे में इस दिन संस्कार युक्त कार्य यथा-नामकरण, अन्नप्राशन, चौलकर्म संस्कार अर्थात मुंडन संस्कार, कर्णवेध, यज्ञोपवीत व वेदारंभ आदि संस्कार कराना शुभ फलदायी रहता है, लेकिन यहाँ जानने वाली बात यह है कि अबूझ होने पर भी इस दिन विवाह संस्कार भूलकर भी नहीं करना चाहिए। 

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