कब है बसंत पूर्णिमा, इस दिन का महत्व और अनुष्ठान जानें सब कुछ

हिंदू धर्म में पूर्णिमा के दिन का बेहद महत्व बताया गया है। पूर्णिमा का दिन इसलिए भी अधिक महत्व रखता है क्योंकि, अधिकांश समय इस दिन कोई ना कोई प्रमुख व्रत, त्योहार, जयंती अवश्य होते हैं। इसके अलावा पूर्णिमा के दिन को बेहद शुभ और पवित्र भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि, जो कोई भी व्यक्ति पूर्णिमा के दिन व्रत उपवास करता है उसे सभी पापों से मुक्ति मिलती है और उन्हें अच्छे स्वास्थ्य, अच्छे भाग्य और दीर्घायु का आशीर्वाद भी अवश्य प्राप्त होता है। 

जब पूर्णिमा का दिन या पूर्णिमा वसंत के मौसम में आती है तो उस पूर्णिमा को वसंत पूर्णिमा कहा जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह मार्च या फरवरी के महीने में पड़ती है। ऐसे में इस वर्ष वसंत पूर्णिमा 28 मार्च, 2021 को रविवार के दिन मनाई जाएगी। हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह दिन फाल्गुन महीने में आता है। 

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वसंत पूर्णिमा की पूजन विधि 

  • बसंत पूर्णिमा का व्रत रखने वाले लोगों को इस दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करना होता है। 
  • इसके बाद पूजा वाली जगह को साफ करके वहां भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। 
  • पूजा वाली जगह को अच्छे से सज़ाएँ और देवी-देवताओं को फूल, सिंदूर, हल्दी और चंदन का लेप लगाएं। 
  • इसके बाद पूजा की सभी आवश्यक सामग्रियां जैसे मिठाई, फल, मेवे, सुपारी इत्यादि इकट्ठा करें। 
  • देवी लक्ष्मी की तस्वीर के सामने कुछ सिक्के रखें। 
  • इसके बाद सुबह की पूजा की रस्म करने के बाद व्रत करने वाले इन्सान को वसंत पूर्णिमा का व्रत तब तक रखना चाहिए जब तक रात में चंद्रमा के दर्शन नहीं हो जाते हैं। 
  • चंद्रमा के दर्शन के बाद ही इस दिन का व्रत पूरा होता है। 
  • इस दिन चंद्रोदय के बाद दोबारा पूजा कर की जाती है। 
  • इस दिन भक्तों को सत्य नारायण की पूजा करनी चाहिए और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सत्य नारायण कथा का पाठ भी करने की सलाह दी जाती है। इसके बाद जिन लोगों ने बसंत पूर्णिमा का व्रत रखा होता है उन्हें देवी लक्ष्मी की प्रसन्नता हासिल करने के लिए पूजा के दौरान देवी लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करने का विधान बताया गया है। 
  • बसंत पूर्णिमा के दिन होलिका दहन किया जाता है। ऐसे में इस दिन पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुंह करके कुछ पानी की बूंदे अपने आसपास छिडकें। माना जाता है कि, ऐसा करने से आप का शुद्धिकरण हो जाता है। 
  • इसके बाद एक थाली में रोली, कच्चा सूत, चावल, फूल, साबुत हल्दी, बताशे, फल इत्यादि लें। 
  • ये सभी वस्तुएं लेने के बाद नरसिंह भगवान का स्मरण करें और होलिका पर रोली, चावल, फूल बताशे इत्यादि चढ़ायें। 
  • यह सभी वस्तुएं अर्पित करने के बाद होलिका के चारों और मौली लपेटे। 
  • इसके बाद होलिका पर प्रहलाद का नाम लेकर फूल चढ़ाएं और नरसिंह भगवान का नाम लेते हुए पांच अनाज अर्पित करें। 
  • यह चीज चढ़ाने के बाद आप अपने नाम, अपने पिता का नाम और अपने गोत्र को याद करते हुए चावल चढ़ाएं। होलिका दहन करें और होलिका के चारों ओर परिक्रमा करें। 
  • अंत में होली की अग्नि में गुलाल डालें और अपने पैरों में गुलाल लगाकर उनका आशीर्वाद लें।

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कैसे मनाई जाती है बसंत पूर्णिमा? 

वसंत पूर्णिमा का यह पर्व किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम की तरह मनाया जाता है। इस दिन नृत्य, प्रदर्शन गायन, प्रतियोगिता, नाटक इत्यादि आयोजित किए जाते हैं। बसंत पूर्णिमा से एक दिन पहले ही यह सभी समारोह शुरू हो जाते हैं। इस पर्व के उपलक्ष में भगवान विष्णु के मंदिरों को मालाओं, फूलों और रोशनी से सजाया जाता है और देवी-देवताओं की मूर्तियों को नए कपड़े गहने और माला इत्यादि चढ़ाए जाते हैं। बसंत पूर्णिमा का उत्सव पूरे दिन चलता है और इसे एक रंगीन और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। 

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वसंत पूर्णिमा का महत्व 

वसंत पूर्णिमा का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन को सबसे सम्मानित अवसरों में से एक माना गया है। यह दिन फाल्गुन पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है जो होली के आगमन को दर्शाता है। इस विशेष दिन पर बसंत उत्सव और होली की शुरुआत होती है। इसके अलावा बसंत पूर्णिमा का यह दिन कोई भी शुभ काम करने, पूजा करने, व्रत आदि करने के लिए बेहद ही पवित्र माना गया है। इस दिन के दौरान फ़सलों की कटाई की जाती है। इसके अलावा बसंत मास की पूर्णिमा को हिंदू कैलेंडर का आखिरी दिन माना गया है। वसंत पूर्णिमा के दिन से ही होली का दहन होता है इसी कारण से इस पूर्णिमा को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। बसंत पूर्णिमा बेहद ही शुभ दिन माना जाता है क्योंकि यह रंगों के त्यौहार यानी होली के दिन मनाया जाता है। 

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फाल्गुन पूर्णिमा से संबंधित कथा 

फाल्गुन पूर्णिमा के व्रत से जुड़ी अनेकों कथाएं मिलती है लेकिन, नारद पुराण में इस दिन से संबंधित जो कथा दी गई है उसके अनुसार असुर राज हिरण कश्यप की बहन राक्षसी होलिका जब भगवान विष्णु के परम भक्त और हिरण कश्यप के पुत्र प्रहलाद को जलाने के लिए अग्नि में बैठी थी तब भगवान की कृपा से होलिका स्वयं ही अग्नि में जल कर भस्म हो गई और प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। ऐसे में इस दिन को लेकर ऐसी मान्यता है कि, इस दिन लकड़ियों, उपले, इकट्ठा करके होलिका का निर्माण करना चाहिए और मंत्रोचार के साथ शुभ मुहूर्त में विधि पूर्वक होलिका दहन करना चाहिए। 

ऐसे में जब होलिका की अग्नि तेज़ होने लगे तो उसकी परिक्रमा करते हुए लोगों को खुशी का उत्सव मनाना चाहिए और होलिका दहन के साथ भगवान विष्णु और उनके परम भक्त प्रहलाद का स्मरण करना चाहिए क्योंकि, होलिका अहंकार और पाप कर्मों का प्रतीक है इसलिए, होलिका में अपने अहंकार और पाप कर्मों की आहुति देकर अपने मन को प्रहलाद की तरह भगवान की पूजा आस्था में समर्पित कर देना चाहिए।

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