उत्तरायण से दक्षिणायन होने वाले हैं भगवान सूर्य, जानें इसका महत्व और तिथि

भगवान सूर्य प्रत्यक्ष हैं। वैदिक ज्योतिष में उन्हें सभी ग्रहों के बीच राजा का दर्जा प्राप्त है। वे सम्पूर्ण जगत के आत्मा स्वरूप माने गए हैं। भगवान सूर्य सम्पूर्ण पृथ्वी पर जीवन का स्रोत हैं। जाहिर है कि सूर्य के ताप व किरणों में हल्का सा भी परिवर्तन पूरी पृथ्वी को प्रभावित करता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष में दो अयन होते हैं, उत्तरायण और दक्षिणायन। अब इसी क्रम में एक बार फिर से सूर्य देवता उत्तरायण से दक्षिणायन होने जा रहे हैं। 

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ऐसे में आज हम आपको इस लेख में सूर्य के दक्षिणायन होने की तिथि और इसका महत्व बताने वाले हैं।

कब हो रहे हैं सूर्य देवता दक्षिणायन?

भगवान सूर्य साल 2021 में 21 जून को सोमवार के दिन उत्तरायण से दक्षिणायन हो जाएंगे। इसके बाद वे अगले छह महीने दक्षिणायन ही रहेंगे।

सूर्य के दक्षिणायन का ज्योतिषीय महत्व

प्रत्येक साल सूर्य अपनी स्थिति दो बार बदलता है। पहला जब वो मकर राशि में प्रवेश करता है जिसे मकर संक्रांति भी कहते हैं, तब सूर्य उत्तरायण होते हैं। दूसरा जब सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं जिसे हम मिथुन संक्रांति भी कहते हैं, तब सूर्य दक्षिणायन हो जाते हैं। सीधे शब्दों में कहा जाये तो सूर्य की मकर से मिथुन राशि तक की यात्रा उत्तरायण अवधि होती है और कर्क से धनु तक की यात्रा दक्षिणायन की अवधि होती है।

सनातन धर्म में दक्षिणायन का महत्व

सनातन धर्म में दक्षिणायन की अपेक्षा उत्तरायण को ज्यादा शुभ समय माना जाता है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में इन दोनों ही अवधि का जिक्र करते हुए इसकी महत्ता बताई है। भगवद्गीता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो भी जातक सूर्य के उत्तरायण की अवधि में शुक्ल पक्ष में दिन के समय अपने प्राण त्यागता है, उसे मृत्युलोक वापस नहीं आना पड़ता है। वहीं वो जातक जो दक्षिणायन की अवधि में कृष्ण पक्ष के दौरान रात्रि में अपने प्राण त्यागता है, वह चन्द्रलोक जाता है और उसे वापस मृत्युलोक आना पड़ता है।

महाभारत का एक और चर्चित प्रसंग भी सूर्य के दक्षिणायन से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि भीष्म पितामह बाण लगने के बाद भी कई दिनों तक मृत्यु शय्या पर इसलिए ही जीवित रहे थे क्योंकि वे सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने का इंतजार कर रहे थे।

सनातन धर्म में दक्षिणायन की अवधि को पूजा-पाठ, जप व तप के लिए अनुकूल माना गया है। सूर्य का दक्षिणायन होना इच्छाओं, कामनाओं और भोग की वृद्धि को दर्शाता है। इस कारण इस समय किए गए धार्मिक कार्य जैसे व्रत, पूजन इत्यादि से रोग और शोक मिटते हैं। सनातन धर्म में मान्यता है कि उत्तरायण देवताओं का दिन का काल होता है जबकि दक्षिणायन देवताओं के लिए रात्रिकाल होती है।

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सूर्य के दक्षिणायन का पृथ्वी पर प्रभाव

सूर्य के दक्षिणायन होने पर रातें लंबी होनी शुरू हो जाती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं जबकि उत्तरायण में दिन लंबा और रातें छोटी होती हैं। दक्षिणायन की अवधि में पृथ्वी पर तीन मौसम देखने को मिलते हैं यानी कि वर्षा शरद और हेमंत जबकि उत्तरायण के दौरान हमें शिशिर, बसंत और ग्रीष्म जैसे तीन मौसम देखने को मिलते हैं। सूर्य के दक्षिणायन होने का अर्थ है कि ग्रीष्म ऋतु के खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है और अब धीरे-धीरे मौसम में ठंडक बढ़ने लगेगी।

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