श्रावण पुत्रदा एकादशी आज, जानें इससे जुड़ी पौराणिक कथा

हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का पौराणिक काल से ही अपना एक विशेष महत्व रहा है। फिर चाहे वो कृष्ण पक्ष एकादशी हो या शुक्ल पक्ष, दोनों का ही वर्णन आपको कई पौराणिक कथाओं में सुनने को मिल जाएगा। इस वर्ष श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत आज, रविवार 11 अगस्त को रखा जा रहा है। जिस दौरान भगवान विष्णु की आराधना की जाएगी। श्रावण और पौष मास की दोनों ही एकादशियों का महत्व एक समान बताया गया है। माना जाता है कि ये दोनों ही एकादशियाँ संतान प्राप्ति के लिये सर्वश्रेष्ठ होती हैं। जिसमें से श्रावण मास में पड़ने वाली एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। तो आइये इस मौके पर जानें श्रावण पुत्रदा एकादशी का पौराणिक महत्व और इससे जुड़ी कहानी। 

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत की पौराणिक कहानी

सभी एकादशियों का महत्व बताते हुए आपको कई पौराणिक ग्रंथों में एकादशियों से जुड़ी कई कथाएँ एवं कहानियाँ मिल जाएंगी। उसी में से एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में  एकादशी का सीधा संबंध भगवान विष्णु से बताया गया हैं। एक बार द्वापर के आरंभ के समय माहिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें एक बेहद धार्मिक और परोपकारी राजा महिजित राज करते थे। 

राजा महिजित अपनी समस्त प्रजा को अपनी संतान की तरह ही प्रेम से इस प्रकार रखता था कि उनकी हर सुख-सुविधाओं, न्याय, दान-पुण्य, आदि का उन्हें भली प्रकार से ज्ञान रहता था। राजा से मिल रहे इस प्रेम से प्रजा भी खुश थी। ऐसा सब कुछ कई वर्षों तक चलता रहा लेकिन राजा को बावजूद इसके एक बात अंदर ही अंदर बेहद परेशान करती थी और वो ये थी कि उनके विवाह के कई वर्ष बीत जाने के पश्चात भी वो संतान से वंचित थे। इसलिए जैसे-जैसे उम्र बीत रही थी ये बात राजा को और परेशान कर रही थी। अपनी इस चिंता से मुक्त होने के लिए एक दिन राजा ने अपने दरबार में बेहद विद्वान ब्राह्मणों और पुजारी-पुरोहितों को बुलवाया। उसके समक्ष अपनी इस समस्या को रखते हुए राजा ने कहा कि “हे ज्ञानियों, प्रजाजनों, ब्राह्मण देवताओं मैंने जब से होश संभाला है तब से लेकर आज जबकि मुझे राज्य की बागडोर संभाले भी एक अरसा हो गया है। मैंने अधर्म का कोई कार्य नहीं किया है। मैंने अपने पूरे जीवन में सदैव धर्म, कर्म, दान, पुण्य, न्याय-अन्याय को ध्यान में रखते हुए ही हर निर्णय लिया है। इतना ही नहीं मैंने अपनी प्रजा को भी अपनी संतान की भाँती ही प्रेम से रखा, उनकी हर ज़रूरत का ध्यान रखा। लेकिन बावजूद इसके विधि ने मेरे कौन से पाप के चलते मुझे संतानहीन रखा। मैं समझ नहीं पाया हूँ।” 

अपने राजा की इस पीड़ा से वहां की प्रजा भली-भाँती अवगत थी, ऐसे में राजा के इस प्रकार अपनी व्यथा प्रकट करने से राज्य की समस्त प्रजा भी दुखी हो गई। राजा ने दरबार में मौजूद सभी विद्वान ब्राह्मणों और पुरोहितों से अनुरोध किया कि वे उनकी इस समस्या के निवारण हेतु कोई उपाय बताएं, जिससे उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हो। 

राजा के न्याय और परोपका को देख सभी विद्वान भी उन्हें इस समस्या का समाधान बता पाने में नाकामयाब रहे। जिसके बाद उन्होंने राजा की इस पीड़ा के निवारण के लिए महान मुनि लोमेश की सहायता लेना का विचार किया। जानकारी के लिए बता दें कि पौराणिक काल में  महर्षि लोमेश को सर्वश्रेष्ठ मुनि माना जाता था। बड़े से बड़े विद्वान भी सनातन धर्म की किसी भी प्रकार की गूढ़ गुत्थियों को सुलझाने में उनकी ही सहायता लेते थे। 

ऐसे में सभी विद्वान राजा की इस समस्या को लेकर मुनि लोमेश के समक्ष जा पहुंचे और उनसे इसके लिए समाधान की विनती करने लगे। जिसके बाद  महर्षि लोमेश ने बताया कि राजा अपने पूर्व जन्म में एक बहुत ही गरीब व्यापारी था। जिसने छल और पापों से अपनी संपत्ति एकत्रित की थी, लेकिन अनजाने में उससे एक बड़ा पुण्य उस वक़्त हो गया। जब ज्येष्ठ माह में द्वादशी को मध्याह्न के समय उसे किसी कारणवश दो दिन तक भूखा प्यासा रहना पड़ा था, जिसके बाद उसे एक जलाशय दिखाई दिया जहाँ एक गाय पानी पी रही थी। लेकिन उसने तुरंत गाय को हटाते हुए पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई।

जिसके चलते अनजाने ही उससे एकादशी उपवास संपन्ना हुआ और उसके परिणाम स्वरूप ही वो इस जन्म में राजा बना। परन्तु चूँकि उसने अपनी प्यास के लिए एक प्यासी गाय को जल पीने से रोका था इसलिए वो राजा तो बना लेकिन वो संतान सुख से वंचित रहा। यह सुनकर राजा भी दुखी हो गया और उसनें मुनि से अपने पुराने जन्म के उस पाप के निवारण हेतु उपाय पूछा।  

तब मुनि ने राजा को बताया कि यदि वो अपनी संपूर्ण प्रजा के साथ मिलकर श्रावण शुक्ल एकादशी जिसे अब पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, उसका उपवास रखकर रात्रि में जागरण करें और इसके बाद अगले दिन पारणा करें तो इसके पुण्य से वो संतान की प्राप्ति कर सकता है। 

मुनि का आशीर्वाद लेकर सभी वापस लौट आए और  उनके कहे अनुसार ही श्रावण शुक्ल एकादशी के दिन सही विधिनुसार राजा ने प्रजा के साथ मिलकर उपवास रखा। जिसके परिणामस्वरूप रानी गर्भवती हुई और राजा महीजित को एक तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

मान्यता है कि इसी दिन से श्रावण शुक्ल एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाने लगा।  जिस दौरान इसका व्रत करने मात्र से ही संतान सुख की प्राप्ति होती है। 

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