आख़िर क्यों श्रावण का पूर्णिमा है इतना खास, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि! 

इस साल 3 अगस्त, सोमवार को श्रावण पूर्णिमा व्रत रक्षाबंधन के साथ मनाया जायेगा। धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों रूपों से ही यह तिथि बहुत सौभाग्यशाली मानी जाती है। इसीलिए इस दिन का महत्व भी बहुत अधिक होता है। श्रावण पूर्णिमा व्रत के दिन सप्त ऋषियों की पूजा करने का विधान है। इस दिन के महत्व को विस्तार से समझने के लिए आपको पहले पूर्णिमा के दिन के विषय में जानना बेहद ज़रूरी है। पूर्णिमा का व्रत हर महीने में रखा जाता है। प्रत्येक महीने शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को पूर्णिमा कहते है। 

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चंद्रमा की कलाओं के उतरने चढ़ने के आधार पर ही महीने के दो पक्ष निर्धारित किए गए हैं। जिन दिनों में चंद्रमा का आकार घटता है, वह कृष्ण पक्ष कहलता  है, तो वहीँ जिन दिनों में चंद्रमा का आकार बढ़ता है वह शुक्ल पक्ष कहलाता है। चंद्रमा जिस दिन घटते-घटते बिल्कुल समाप्त हो जाता है, उस दिन को अमावस्या कहते हैं, तो पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण आकार में नज़र आता है। पूर्णिमा को पूर्णिमा, पूर्णमासी, पूनम आदि जैसे कई नामों से जाना जाता है। 

जितनी भी पूर्णिमा की तिथियां होती हैं, उन सब में श्रावण मास की पूर्णिमा बेहद खास मानी जाती है। चलिए विस्तार से जानते हैं श्रावण पूर्णिमा के महत्व, पूजा विधि, कथा और इस दिन किए जाने वाले अन्य धार्मिक कर्मों के बारे में। यदि आपके मन में इस दिन से जुड़ा कोई सवाल है, तो उसका जवाब जानने के लिए यहां क्लिक करें और हमारे विशेषज्ञ ज्योतिषियों से परामर्श पाएं।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार भी खास है श्रावण पूर्णिमा 

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भी श्रावण का महीना खास माना जाता है, क्योंकि इसके प्रारंभ में सूर्य अपना राशि परिवर्तन करते हैं। सूर्य का यह गोचर सभी 12 राशि के जातकों को प्रभावित करता है। हिंदू पंचांग के अनुसार देखें, तो चंद्र वर्ष के सभी महीनों का नाम उस महीने की पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की स्थिति के आधार पर दिया हुआ है। ज्योतिष में कुल 27 नक्षत्र होते हैं। सभी नक्षत्र चंद्रमा की पत्नियाँ मानी जाती हैं, जिनमें से एक हैं श्रवण। ऐसा माना गया है कि श्रावण पूर्णिमा के दिन चंद्रमा श्रवण नक्षत्र में गोचर करते हैं। इसीलिए पूर्णिमांत माह का नाम श्रावण रखा गया है और यह पूर्णिमा श्रावण पूर्णिमा कहलाती है।

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श्रावण पूर्णिमा व्रत शुभ मुहूर्त और समय :

अगस्त 2, 2020 को 21:31:02 से पूर्णिमा आरम्भ

अगस्त 3, 2020 को 21:30:28 पर पूर्णिमा समाप्त


श्रावण पूर्णिमा का महत्व

श्रावण पूर्णिमा का व्रत पूरे देश में अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के साथ मनाते हैं। वैसे तो पूर्णिमा की सभी तिथियां बेहद शुभ और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन इन सब में श्रावण पूर्णिमा के दिन का बहुत महत्व होता है। अमरनाथ की पवित्र यात्रा की शुरुआत आषाढ़ पूर्णिमा के पावन दिन पर होती है, और इसका समापन श्रावण पूर्णिमा को ही होता है। इस दिन लोग शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, और कांवड़ यात्रा संपन्न होती है। कुछ जगहों पर इस दिन यज्ञ, पूजन और उपनयन संस्कार करने का भी विधान है। यह तिथि जप-तप, दान-दक्षिणा और चंद्र दोष से मुक्ति के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है। श्रावण पूर्णिमा पर दान व् पित्तरों के तर्पण का अधिक महत्व होता है।

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पूरे देश में मनाते हैं इस दिन को अलग-अलग तरीके से 

  • उत्तर भारत में श्रावण पूर्णिमा के दिन भाई-बहनों के स्नेह का प्रतिक माने जाने वाले “रक्षाबंधन” का पावन पर्व मनाते हैं।
  • वहीं इस दिन पश्चिम भारत में “नारयली पूर्णिमा” मनाई जाती है। नारयली पूर्णिमा में लोग वरुण देवता को नारियल अर्पित कर अपने अच्छे जीवन की प्रार्थना करते हैं।
  • दक्षिण भारत खासकर तमिलनाडु, केरल, उड़ीसा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से में इस दिन “अवनी अवित्तम” मनाते हैं। इस दिन लोग पुराने पापों से छुटकारे के लिए महासंकल्प लेते हैं।
  • मध्य भारत खासकर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में श्रावण पूर्णिमा के दिन लोग “कजरी पूनम” (कजरी पूर्णिमा) मनाते हैं। इस दिन पुत्रवती महिलाएं अपने संतान की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। 
  • गुजरात में इस दिन को “पवित्रोपना’ के रूप में मनाया जाता है।  यहाँ लोग पूरे विधि-विधान से शिव जी की पूजा करते हैं। 

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श्रावण पूर्णिमा व्रत व पूजा विधि

श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन अलग-अलग जगहों पर अलग तरह से पूजा विधि होती है। लेकिन कुछ ऐसी कार्य हैं, जो सभी जगह सामान्य होते हैं- 

  • प्रातः काल उठकर स्नानादि के बाद साफ़ वस्त्र धारण करे और फिर व्रत का संकल्प लें। 
  • पूरे विधि-विधान से विष्णु भगवान, शिव जी समेत सभी देवी-देवताओं, कुलदेवताओं की फल, फूल, धुप, दीप, प्रसाद आदि से पूजा करें। 
  • अब इस दिन से जुड़ी कथा पढ़ें और आरती करें। 
  • श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षासूत्र बांधने या किसी पंडित से बंधवाने की परंपरा होती है इसके लिए लाल या पीले रेशमी कपड़े में सरसों और पीले चावल (अक्षत), रखकर उसे लाल धागे, मौली या कच्चा सूत में बांधकर पानी से सींचने के बाद तांबे के बर्तन में रखें।
  •  अब ब्राह्मण से अपने हाथ पर पोटली का रक्षासूत्र बंधवा लें। 
  • उसके बाद ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा दें। 

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इस दिन किये जाते हैं कई धार्मिक कर्म

  • श्रावण पूर्णिमा के दिन ही रक्षाबंधन मनाया जाता है, इसीलिए इस दिन देवी-देवताओं की पूजा कर के उन्हें रक्षासूत्र बांधना चाहिए।
  • इस दिन ऋषि, देव और पितरों की आत्मा की शांति के उनका तर्पण भी किया जाता है।
  • श्रावण पूर्णिमा के दिन गाय को चारा, चीटियों को आटा और मछलियों को  दाने डालना चाहिए।
  • इस पूर्णिमा के दिन चाँद अपनी पूर्ण कलाओं में रहता है, इसीलिए इस दिन चंद्रमा की पूजा करने पर चंद्रदोष से मुक्ति मिल जाती है।
  • इस पावन दिन पर भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की भी पूजा का विधान है। श्री विष्णु और माता लक्ष्मी के दर्शन करने व्यक्ति को सुख, धन एवं समृद्धि कि प्राप्ति होती है।
  • श्रावण मास यानि सावन का महीना और सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है, इसलिए इस पूर्णिमा के दिन भगवान शंकर का रुद्राभिषेक करना चाहिए।
  • इस दिन वेदों का अध्ययन करने की परंपरा भी है। 

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विधिपूर्वक व्रत करने से मिलता है फल

पुराणों के अनुसार श्रावण पूर्णिमा का व्रत का विधिपूर्वक करने से अनेक फलों की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति पूरे साल भर वैदिक कर्म न कर पाए, तो इस एक व्रत को करने से उसे सभी कर्मों का फल मिल जाता है। श्रावणी पूर्णिमा व्रत ही अकेला एक व्रत है, जो पूरे वर्ष भर किए गए दूसरे व्रतों की तुलना में समान फल देता है। शास्त्रों के अनुसार जो भी इंसान पूरे विधि-विधान से इस व्रत को करेगा, उसे संसार के सभी सुखों की प्राप्ति होगी और उस व्यक्ति पर माता लक्ष्मी हमेशा अपनी कृपा बनाए रखेंगी। इस व्रत को करने वाला व्यक्ति आजीवन ना तो कभी निर्धन रहता, और ना ही उसे किसी तरह की कोई परेशानी होती है। मरने के बाद भी उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। 

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श्रावण पूर्णिमा व्रत कथा 

किसी खास दिन पर व्रत करने के पीछे कोई न कोई कारण होता है। चलिए जानते हैं श्रावण पूर्णिमा व्रत को किये जाने के पीछे की कथा-

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार एक नगर में तुंगध्वज नामक एक राजा था। एक दिन वह जंगल में शिकार करने निकला। थोड़ा समय बीत जाने के बाद वह थक गया और बरगद के एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा। अचानक उसकी नज़र कुछ लोगों पर गयी, जो सत्यनारायण भगवान की पूजा कर रहे थे। राजा अहंकारी था, जिस वजह से न तो वह भगवान सत्यानारायण की कथा में शामिल हुआ और ना ही भगवान के सामने नतमस्तक हुआ। पूजा-कथा समापत होने के बाद गांव वालों ने उसे आदर से प्रसाद लेने का आग्रह किया। लेकिन घमंड में चूर राजा ने प्रसाद को ग्रहण नहीं किया और वहां से चला गया।

राजा जब अपने नगर पहुंचा, तो उसे पता चला कि उसके राज्य पर दूसरे राज्य के राजा ने हमला कर दिया। उसके राज्य में सब कुछ तहस-नहस हो चूका था। राजा को समझ आया कि जो भी उसके राज्य में हुआ वो सब भगवान सत्यनारयण का अपमान करने के कारण ही हुआ है। वह अपनी भूल पर शर्मिंदा हुआ और वापस उस बरगद के पेड़ वाली जगह पर जा कर ग्वालों से माफ़ी मांगी। उसने उनसे सत्यनारायण भगवान का प्रसाद मांगा और उसे ग्रहण किया। भगवान सत्यनारायण ने राजा तुंगध्वज को छमा कर दिया और उसकी बिगड़ी सारी चीज़ें पहले जैसी ही कर दी। भगवान के आशीर्वाद से राजा ने लंबे समय तक राजसुख भोगा और मरने के बाद उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई। 

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आशा करते हैं श्रावण पूर्णिमा व्रत के बारे में इस लेख में दी गई जानकारी आपको पसंद आयी होगी।

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