जानिए आदिवासियों का महाकुंभ कहे जाने वाले बेणेश्वर मेला से जुड़ी कुछ बेहद दिलचस्प परम्पराएं

हर साल माघ शुक्ल पूर्णिमा के मौके पर राजस्थान के एक शहर डूंगरपुर से तकरीबन 60 किलोमीटर की दूरी पर एक मेला लगता है जिसे बेणेश्वर मेला के नाम से जाना जाता है। 4 से 5 दिनों तक चलने वाला ये मेला इस वर्ष 5 फरवरी से शुरू हो चुका है। इस मेले की सबसे ख़ास बात है कि इसे आदिवासियों का महाकुम्भ भी कहा जाता है। यहां स्थित भगवान शिव मंदिर के नज़दीक भगवान विष्णु का भी एक मंदिर है, जिसके बारे में ऐसी मान्यता है कि जब भगवान विष्णु के अवतार माव जी ने यहां तपस्या की थी, तभी इस मंदिर का निर्माण कराया गया था।

आदिवासियों का महाकुम्भ है बेणेश्वर मेला

इस मेले के बारे में बताया जाता है कि इसमें आसपास के क्षेत्र के सभी आदिवासी समुदाय के लोगों के साथ-साथ मध्य प्रदेश और गुजरात से हजारों आदिवासी सोम और माही नदियों के पवित्र संगम में डुबकी लगाने आते हैं। इसके बाद वो लोग भगवान शिव के बेणेश्वर मंदिर और आसपास के मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। इस मेले का सबसे ख़ास आकर्षण होता है जादुई तमाशे और तमाम करतबों का प्रदर्शन जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहाँ इकठ्ठा होते हैं। शाम के समय लोक कलाकार यहाँ नृत्य-संगीत के मन मोह लेने वाले कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।

बेणेश्वर मेला तकरीबन चार से पांच दिनों तक चलता है और इसमें हज़ारों लाखों की संख्या में आदिवासी भील सोम व माही नदियों के पवित्र संगम में आस्था की डुबकी लगाने के लिए आते हैं। इसके अलावा इस मेले में विदेशी पर्यटक भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। वैसे तो इस मेले में पांचों दिन लोगों की भीड़ देखने लायक होती है लेकिन पूर्णिमा के दिन स्नान और पूजा करने वाले श्रद्धालुओं का हुजूम कुछ ऐसा होता है जो देखते ही बनता है। मेले में घूमने आये लोग डूंगरपुर के ऐतिहासिक किलों और मंदिरों को देखना नहीं भूलते हैं।

जानिए इस मेले से जुड़ी मान्यताएं और परम्पराएं

इस ख़ास मेले के बारे में लोगों की ऐसी मान्यता है कि बेणेश्वर त्रिवेणी संगम से जुड़ी नदी सोम अगर पहले पूर्ण प्रवाह के साथ बहे तो उस साल चावल की फसल काफी अच्छी होती है। वहीं माही में जल प्रवाह पहले होने पर समय कुछ ज़्यादा ठीक नहीं माना जाता है।

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बेणेश्वर महामेले या जिसे आदिवासियों का महाकुंभ भी कहते हैं उसमें सभी दिनों में भगवान को अलग-अलग चीज़ों-पकवानों का भोग लगाया जाता है। जैसे माघ शुक्ल पूर्णिमा को शीरा का भोग लगता है, माघ कृष्ण प्रतिपदा को दाल-बाटी का भोग लगता है, द्वितीया को भी दाल-बाटी का भोग लगता है, तृतीया को पूड़ी-शीरा का भोग लगता है, चतुर्थी को दाल-रोटी का भोग लगाया जाता है, पंचमी को मोदक दाल-बाटी आदि का भोग चढ़ाया जाता है।

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यहाँ स्थित राधा-कृष्ण मन्दिर पर सोने-चान्दी के वागे और 24 अवतारों के चित्रांकन युक्त चान्दी के किवाड़ मेले से ठीक एक दिन पहले चतुर्दशी को वहां पहुँचाये जाते हैं और फिर इनका ही उपयोग किया जाता है।

इस मेले की सबसे अनोखी मान्यता और परंपरा तो ये होती है कि मुख्य मेला पूर्णिमा से पंचमी तक साबला का पुजारी इस मंदिर में पूजा करता है जबकि राधा-कृष्ण मन्दिर में आम दिनों में आदिवासी पुजारी ही पूजा-पाठ का काम संभालते हैं।

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