सावन के आखिरी सोमवार पर आज रखा जाएगा प्रदोष व्रत, जानिये इसका पौराणिक महत्व

सनातन धर्म में पौराणिक काल से ही प्रदोष व्रत करने का विशेष महत्व बताया गया है। हिन्दू पंचांग अनुसार ये व्रत हर त्रयोदशी के दिन रखा जाता है और इस दौरान विशेष तौर पर भगवान शिव एवं माता पार्वती की उपासना की जाती है। यूँ तो ये तिथि हर माह में 2 बार (कृष्ण और शुक्ल पक्ष) में आती हैं और इस बार यह पवित्र तिथि सावन के आखिरी सोमवार यानी आज, 12 अगस्त को पड़ रही है। सोमवार के दिन आने पर प्रदोष व्रत को सोम प्रदोषम या चन्द्र प्रदोषम भी कहा जाता है। 

प्रदोष व्रत का पौराणिक महत्व 

इस व्रत को करने के पीछे आपको शास्त्रों में कई पौराणिक कथाओं का वर्णनन सुनने को मिल जाएगा। उन्हीं पौराणिक मान्यताओं में से एक कहानी के अनुसार, चंद्र देव का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 नक्षत्र कन्याओं के साथ संपन्न हुआ था। जिनमे से चंद्र की पत्नी रोहिणी बहुत खूबसूरत थीं, जिस कारण चंद्र रोहिणी को सबसे अधिक प्रेम करते थे। रोहिणी के प्रति पति चंद्र के इस स्नेह को देख उनकी अन्य सभी 26 पत्नियों ने पिता दक्ष के समक्ष अपने इस दु:ख को प्रकट किया।

प्रजापति दक्ष स्वभाव से बेहद क्रोधी प्रवृत्ति के माने जाते थे और अपने इसी स्वभाव के चलते उन्होंने अपनी बेटियों के इस दुःख को सुनते ही क्रोध में आकर चंद्र को श्राप दे दिया कि, “तुम क्षय रोग से ग्रस्त हो जाओगे।” जिसके बाद दक्ष के इस श्राप के चलते चंद्र धीरे-धीरे क्षय रोग से ग्रसित होने लगे और उनकी कलाएं भी प्रारंभ हो गईं। 

एक बार नारदजी की मुलाक़ात चंद्र से हुई। चंद्र की इस अवस्था को देख नारदजी ने उन्हें मृत्युंजय भगवान आशुतोष की आराधना करने की सलाह दी। जिसके बाद चंद्र ने उनके कहे अनुसार भगवान आशुतोष की आराधना की।

इसके बाद चंद्र का अंतिम समय निकट आ गया और जिस दौरान वो अपनी अंतिम सांसें ले रहे थे जिसे चंद्र की अंतिम एकधारी कहा जाता है, तब भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें  पुनर्जीवन का वरदान देकर अपने मस्तक पर धारण कर लिया। माना जाता है कि जिस दौरान शिव ने उन्हें दर्शन दिए थे तो वो प्रदोषकाल का समय ही था जिस कारण चंद्र मृत्युतुल्य होते हुए भी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए। वो पुन: धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे और पूर्णमासी पर पूर्ण चंद्र के रूप में वो प्रकट हुए।

मान्यता है कि ‘प्रदोष में दोष’ इसी घटना को कहा गया जिसके चलते चंद्र क्षय रोग से पीड़ित होकर मृत्युतुल्य कष्टों को भोग रहे थे। इसके बाद से ही ‘प्रदोष व्रत’ रखा जाने लगा क्योंकि इसी प्रदोष काल में भगवान शिव ने उसके दोष का स्वयं निवारण किया था। इसलिए ही इस व्रत वाले दिन भगवान महादेव की आराधना करने का महत्व बताया गया है। 

उसी दिन से माना जाता है कि यदि कोई भी व्यक्ति इस विशेष दिन व्रत कर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-आराधना करता है, उसे महादेव का आशीर्वाद तो प्राप्त होता ही है, साथ ही भगवान उस व्यक्ति को उसके हर पाप से मुक्ति भी दिला देते हैं, जिसके चलते उसे मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है।   

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