ओणम : ऐसे करें दस दिन तक ओणम महोत्सव की तैयारी और जानें महत्व

ओणम दक्षिण भारत के सभी प्रमुख त्यौहारों में से बेहद ख़ास माना जाता है। वैसे तो ओणम का त्यौहार मुख्य रूप से केरल में मनाते हैं, लेकिन इसकी धूम पूरे दक्षिण भारत में होती है। ओणम, जिसे मलयालम भाषा में थिरुवोणम भी कहते हैं 10 दिनों तक चलने वाला त्यौहार है। 

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इस साल ओणम का पर्व 31 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा, लेकिन इसकी शुरुआत 22 अगस्त, शनिवार को हो चुकी है, और यह 2 सितंबर, बुधवार तक चलेगा। इस मौके पर केरल में चार दिनों का शासकीय अवकाश होता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार दस दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार का हर एक दिन का विशेष महत्व रखता है। आज हम आपको विशेष रूप से इस त्यौहार से जुड़े कुछ महत्पूर्ण तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं। तो देर की बात की चलिए जानते हैं इस विशेष त्यौहार से जुड़े कुछ बेहद खास बातों के बारे में।

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ओणम/थिरुवोणम का शुभ मुहूर्त  

30 अगस्त, 2020 को 13:52:20 से थिरुवोणम नक्षत्र आरम्भ
31 अगस्त, 2020 को 15:04:17 पर थिरुवोणम नक्षत्र समाप्त 

नोट: बता दें कि यह मुहूर्त केवल दिल्ली के लिए प्रभावी होगा। अपने शहर में ओणम/थिरुवोणम का मुहूर्त देखने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

क्यों मनाया जाता है ओणम का त्यौहार?

ओणम का त्यौहार मानाने के पीछे बहुत सी मान्यताएं हैं, जिनमें से एक मान्यता के अनुसार यह पर्व दानवीर असुर राजा बलि के सम्मान में मनाया जाता है। कहा जाता है कि विष्णु जी ने वामन का अवतार लेकर बलि के घमंड को तोड़ा था, लेकिन उसकी वचनबद्धत्ता को देखने के बाद विष्णु जी ने उसे पातळ लोक का राजा बना दिया।  दक्षिण भारत के लोग यह मानते हैं कि ओणम के पहले दिन राजा बलि पाताल लोक से धरती पर आते हैं और अपनी प्रजा की हाल चाल लेते हैं। इसके साथ ही त्यौहार को दक्षिण भारत में होने वाली नयी फसल की उपज और कटाई की ख़ुशी में भी मनाया जाता है। 

ओणम पर्व का महत्व 

मलयालम सोलर कलैंडर के अनुसार ओणम का त्यौहार चिंगम महीने में मनाया जाता है। चिंगम को मलयालम लोग साल का पहला महीना माना जाता है। वहीं हिन्दू कलैंडर के अनुसार में देखें तो चिंगम महीना अगस्त या सितंबर का होता है। दस दिवसीय ओणम के त्यौहार में हर दिन का एक ख़ास महत्व हैं। इस त्यौहार में लोग अपने घरों को 12 दिनों तक फूलों से सजा कर रखते हैं और विधि विधान से विष्णु जी और महाबली की पूजा-अर्चना करते हैं। ओणम का यह त्यौहार नयी फसल के आने की खुशी में भी लोगों द्वारा मनाया जाता है। 

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ऐसे मनाते हैं ओणम का यह त्यौहार 

नवरात्रि के त्यौहार की तरह ही ओणम का पर्व भी दस दिनों तक मनाया जाता है। केरल के लोगों के लिए ओणम का त्यौहार बहुत महत्व रखता है। इस दिन मलयाली समाज के लोग एक-दूसरे से गले मिलकर शुभकामनाएं देते हैं। इस दौरान लोग अपने-अपने घरों की साफ़-सफाई कर, उसे फूलों और दीयों से सजाते हैं। लोग अपने घर के दरवाज़े पर फूलों से रंगोली बनाते हैं। प्रथा अनुसार विशेष रूप से राजा बलि की मिट्टी से मूर्ति बनाकर उसे सजाया जाता है।

ऐसी मान्यता है राजा बली प्रजा का हाल-चाल लेने के बाद पाताल लोक वापस चले जाते हैं। ओणम के नौवें दिन केरल के हर घर में भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित कर महिलाएं उसके आसपास नृत्य करती हैं। ओणम में विष्णु जी के वामन अवतार की पूजा की जाती है। इस त्यौहार के मुख्य सांस्कृतिक आकर्षण कथककली नृत्य और नौका रेस माने जाते हैं। इस दस दिनों तक चलने वाले त्यौहार के दौरान लोग अपने-अपने घरों पर अलग-अलग प्रकार के पकवान बनाते हैं। लोग इस दिन गुड़, चावल और नारियल के दूध को मिलाकर खीर बनाते हैं। सांभर और कई तरह की सब्ज़ियाँ इस पर्व के दौरान हर घर में बनाई जाती हैं। 

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ऐसे करें दस दिन तक ओणम महोत्सव की तैयारी 

  • प्रथम दिन – एथम/अथम 

ओणम महोत्सव के पहले दिन सुबह उठकर स्नान-आदि करें। उसके बाद किसी मंदिर में या घर के पूजा-स्थल पर ही भगवान की पूजा-आदि करें। इस दिन सुबह के नाश्ते में विशेषतौर से केले और फ्राइ किए हुए पापड़ का ही सेवन किया जाता है। अब  ओणम की परंपरा को निभाते हुए अपने घरों में ओणम पुष्प कालीन, जिसे पूकलम कहा जाता है बनाएं। 

  • दूसरा दिन – चिथिरा 

ओणम महोत्सव के दूसरे दिन की शुरूआत भी पूजा के साथ करें। इसके बाद परंपरागत तरीके से पुष्प कालीन में नए पुष्प जोड़ें। इस दौरान घर के पुरुष ही उन नए फूलों को लेकर आएं।

  • तीसरा दिन – चोधी 

ओणम उत्सव का तीसरा दिन विशेष होता है, क्योंकि लोग इस दिन बाज़ारों से ख़रीददारी करते हैं। ऐसी मान्यता है कि तीसरे दिन ख़रीददारी करना शुभ होता है। 

  • चौथा दिन – विसाकम 

चौथे दिन केरल के कई क्षेत्रों में परंपरागत तरीके से फूलों की कालीन बनाने की प्रतियोगिता का आयोजन होता है। घर की महिलाएँ इस दिन ओणम के अंतिम दिन के लिए अचार, आलू की चिप्स, केले के पापड़, आदि तैयार करती हैं। अंतिम दिन इन्ही पकवानों को लोगों और रिश्तेदारों में बाँटा जाता है। 

  • पाँचवां दिन – अनिज़ाम  

पांचवें दिन नौका दौड़ प्रतियोगिता होती है जिसे वल्लमकली भी कहते हैं। इस दौरान बड़े स्तर पर नौकाओं की दौड़ होती है। 

  •  छठा दिन – थ्रिकेता  

छठे दिन कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रदर्शन लोगों द्वारा किया जाता ही।  लोग भगवान का धन्यवाद करते हुए नाचते-गाते हैं। 

  • सातवां दिन – मूलम 

सातवां दिन बेहद खास होता है। लोग इस दिन बाज़ार और घरों को सजाते हैं। छोटे-छोटे मेलों का आयोजन होता है। 

  • आठवां दिन – पूरादम 

ओणम के आठवें दिन लोग मिट्टी से पिरामिड के आकार में मूर्तियां बनाते हैं। इन मूर्तियों को ‘माँ’ के नाम से संबोधित किया जाता है। लोग इस मूर्ति को पूजा स्थान पर स्थापित कर उसपर पुष्प और अन्य पूजा सामग्री अर्पित करते हैं। 

  • नौवां दिन – उथिरादम 

उत्सव के नौवें दिन लोग उत्सुकता के साथ राजा महाबलि का इंतज़ार करते हैं। उनके  इंतजार में विधिवत पूजन कर सारी तैयारी पूरी कर ली जाती हैं। महिलाएँ विशाल पुष्प कालीन को अपने हाथ से तैयार करती हैं।

  • दसवाँ दिन – थिरुवोणम 

दसवें दिन राजा महाबलि का आगमन होता है। लोग एक-दूसरे को ओणम पर्व की बधाई देते हुए उन्हें पकवान खिलाते हैं। पुष्प कालीन की साज-सजावट और  कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। रात के समय आसमान में जमकर आतिशबाज़ी करने के साथ लोग इस महापर्व का उत्सव मनाते हैं। 

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ओणम से जुड़ी पौराणिक मान्यता

कथा अनुसार त्रेतायुग में बलि नाम का एक  असुर था,जो कि भगवान् विष्णु का परम भक्त था। बलि बहुत ही दानी,सत्यवादी और ब्राह्मणों की सेवा करता था। वह हमेशा यज्ञ, तप आदि भी किया करता था।  

अपनी भक्ति के प्रभाव से राजा बलि बेहद शक्तिशाली हो गया था। उसे देवराज इंद्र से द्वेष था, जिसके चलते उसने इंद्रलोक पर विजय पायी और स्वर्ग में देवराज इंद्र के स्थान और सभी देवताओं पर राज्य करने लगा। बलि से भयभीत और परेशान होकर देवराज इंद्र और सभी देवतागण मदद के लिए भगवान विष्णु के पास गए और भगवान से रक्षा की प्रार्थना की। देवताओं की परेशानी को दूर करने के लिए विष्णु जी ने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और एक ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि के पास गए और अपने तेजस्वी रूप से उसपर विजय प्राप्त की।

वामन रूप धारण किये हुए भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली।  बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था। लेकिन उसके अंदर एक गुण था कि वह कभी किसी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं लौटने देता था। वह  ब्राह्मण को दान में मांगी वस्तु अवश्य देता था। वामन देव ने बलि से तीन पग भूमि की मांग की। वहां मौजूद दैत्य गुरु शुक्राचार्य भगवान विष्णु की चाल को समझ गए और बलि को आगाह भी किया। लेकिन बावजूद उसके बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उन्हें  तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया। 

वचन मिलते ही विष्णु जी ने विराट रूप धारण कर लिया और एक पांव से पृथ्वी तो दूसरे पांव की एड़ी से स्वर्ग और पंजे से ब्रह्मलोक को नाप लिया। अब तीसरे पांव के लिए राजा बलि के पास कुछ भी नहीं बचा था। इसलिए बलि ने वचन पूरा करते हुए अपना सिर उनके पैरों के नीचे कर दिया और भगवान वामन ने तीसरा पैर राजा बलि के सिर पर रख दिया। राजा बलि की वचन प्रतिबद्धता से खुश होकर भगवान वामन ने उनसे वरदान मांगने के लिए कहा, तब बलि ने कहा कि  प्रभु! मेरी आपसे विनती है कि साल में एक बार मुझे लोगों से मिलने दिया जाए। भगवान ने इच्छा को स्वीकार कर लिया, इसलिए थिरुवोणम के दिन राजा महाबलि लोगों से मिलने के लिए आते हैं। ओणम का यह त्यौहार न केवल सांस्कृतिक बल्कि धार्मिक दृष्टि से बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है।

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हम आशा करते हैं कि ओणम के बारे में इस लेख में दी गई जानकारी आपको पसंद आयी होगी। आप सभी को ओणम की हार्दिक बधाई! एस्ट्रोसेज से जुड़े रहने के लिए आप सभी का धन्यवाद। 

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