मरणोत्तर संस्कार संपूर्ण विधि-विधान

सृष्टि का शाश्वत नियम है कि जिस व्यक्ति का जन्म हुआ है उसका अंत भी निश्चित है। लेकिन उसके शरीर को चलाने वाली आत्मा अजर अमर है। गीता के एक श्लोक में कहा गया है कि, “नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः, न चैनं क्लेदयंत्यापो, न शोषयति मारुतः।” अर्थात आत्मा को न कोई शस्त्र काट सकता है, न आग इसे जला सकती है, न पानी इसे गला सकती है और न ही वायु इसे सुखा सकती है। हिन्दू जीवन पद्धति सदियों से अपनी विशिष्ट संस्कृति को लिए हुए आज भी टिकी हुई है। लेकिन इसके साथ ही रोम, बेबीलोनिया, मिश्र की सभ्यता का नाम ओ निशान ही मिट चुका है। इसका मुख्य कारण है कि हिन्दू संस्कृति का आधार महज धर्म और अध्यात्म ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिकता भी है। इसलिए जीवन व्यतीत करने की सनातनी परंपरा सर्वश्रेष्ठ परंपरा कहलाती है। यूँ तो सनातन धर्म में कई संस्कारों का वर्णन आता है। लेकिन इनमें 16 संस्कारों को ज्यादा प्रमुखता दी गई है। ये संस्कार व्यक्ति के जन्म के होने से पूर्व से लेकर मरणोपरांत तक कई संस्कार होते हैं। इनमें मरणोत्तर संस्कार अंतिम संस्कार होता है। मरणोत्तर संस्कार अर्थात व्यक्ति के मरने के बाद किया जाने वाला संस्कार है। और आज हम इस संस्कार के महत्व और विधि को समझेंगे। साथ ही जानेंगे कि यह मरणोत्तर संस्कार क्यों किया जाता है, आखिर इसके पीछे का तर्क क्या है।

कब किया जाता है मरणोत्तर संस्कार

हिन्दू जीवन पद्धति में व्यक्ति के मरने के बाद उसकी आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला कर्म काण्ड मरणोत्तर संस्कार कहलाता है। मरणोत्तर दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें पहला शब्द है मरण अर्थात ‘मृत्यु’, जबकि दूसरा शब्द उत्तर है जिसका अर्थ होता है ‘बाद में’। शब्दशः अर्थ अनुसार ये बना मरने के बाद किया जाने वाला संस्कार। यह संस्कार इस कामना से किया जाता है कि मरने वाला व्यक्ति का अगला जीवन उसके पिछले जीवन से अधिक श्रेष्ठ हो।

शास्त्रों में इसे श्राद्ध कर्म भी कहा जाता है। मरणोत्तर संस्कार शोक-मोह की पूर्णाहुति का विधिवत आयोजन है। इस निमित्त जो कर्मकाण्ड किया जाता है उसका सीधा लाभ जीवात्मा को प्राप्त होता है। इसलिए यह संस्कार पूर्ण श्रद्धा के साथ विधिनुसार किया जाता है।

वैसे मरणोत्तर संस्कार का प्रारंभ व्यक्ति के अस्थि विसर्जन के बाद ही हो जाता है। लेकिन वास्तविक रूप से मृत्यु यानि की अंत्येष्टि संस्कार के 13वें दिन बाद यह संस्कार किया जाता है।

गौरतलब है कि अलग-अलग राज्यों में इसे अपनी मान्यता अनुसार मृत्य से 13वें दिन के आगे-पीछे भी किया जाता है। इसमें जिस दिन अंत्येष्टि होती है वह दिन भी गिना जाता है।

श्राद्ध संस्कार मरणोत्तर के अलावा पितृ पक्ष के दौरान भी किया जाता है अथवा देवहासन दिवस पर भी ये किया जाता है।

मरणोत्तर संस्कार से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें

  • मृत्यु के पश्चात् मृतक के शव से अशुद्ध कीटाणु निकलते हैं। इसलिए मृत्यु के पश्चात् घर की साफ़-सफ़ाई की जाती है।
  • यह कार्य 10 से 13 दिन के भीतर होता है।
  • तेरहवें दिन मरणोत्तर संस्कार की वैसी ही व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • जैसे अन्य संस्कारों के लिए की जाती है। अर्थात इसके लिए यज्ञ हवन आदि की व्यवस्था करनी चाहिए।
  • इसके लिए सामग्री भी आवश्यक है।
  • जो व्यक्ति दाह संस्कार करता है। वही व्यक्ति इस संस्कार का मुख्य कर्ता-धर्ता होता है।
  • उसी व्यक्ति के द्वारा ही इससे संबंधित सभी कर्मकांड किए जाते हैं।
  • संस्कार को करने से पूर्व कुछ चीज़ों की व्यवस्था करने की आवश्यकता होती है।

संस्कार हेतु आवश्यक सामग्री

  • पात्र में थाल, परात, पीतल या स्टील के तसलें संस्कार से पहले ही लाकर रख लें।
  • इसमें एक पात्र में तर्पण किया जाता है।
  • दूसरे पात्र में जल अर्पित करते रहें, इसीलिए जल के लिए कलश की व्यवस्था रखें।
  • पात्र के अलावा द्रुव घास, पवित्री, चावल, जौ, तिल्ल थोड़ी-थोड़ी मात्रा में होना चाहिए।
  • पिण्ड दान के लिए गूँथा हुआ जौ का या फिर गेहूँ का आंटा होना चाहिए।
  • आंटे में तिल मिलाना चाहिए।
  • पिण्ड स्थापना के लिए केले के पत्ते होने चाहिए।
  • पिण्डा दान को सिंचित करने के लिए दूध, दही और शहद थोड़ा थोड़ा होना चाहिए।
  • इसके अलावा पंच बलि और नैवेद्य के लिए भोज्य पदार्थ उड़द की दाल आदि।
  • पूजन बेदी पर मृतक का चित्र, कलश, एवं दीपक के साथ एक छोटी ढेरी चावल की यम तथा तिल की पितृ आवह्न के लिए बना देनी चाहिए।

मरणोपरांत होने वाले श्राद्ध संस्कार में देव पूजन एवं तर्पण के साथ पंच यज्ञ करने का विधान है। ये पंच यज्ञ ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत यज्ञ, एवं मनुष्य यज्ञ होते हैं। इनमें पितृ यज्ञ के लिए पिण्ड दान, भूत यज्ञ के लिए पंचबलि और मनुष्य यज्ञ के लिए श्राद्ध संकल्प करने का कर्म है। इसी प्रकार देव यज्ञ के लिए संवर्धन-देव दक्षिणा संकल्प तथा ब्रह्म यज्ञ के लिए गायत्री विनियोग किया जाता है।

मरणोत्तर संस्कार विधि

मरणोत्तर संस्कार हेतु सबसे पहले षट्कर्म करना होता है। उसके बाद संकल्प कराया जाता है। उसके पश्चात रक्षा विधान और फिर विशेष उपचार से संस्कार प्रारंभ किया जाता है।

  • इसके लिए प्रारंभ में यम एवं पितृ आवाह्न पूजन करके तर्पण करें।
  • तर्पण के बाद क्रमशः ब्रह्म यज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, एवं मनुष्य यज्ञ करें।
  • इन यज्ञों के पश्चात अग्नि स्थापना करके विधिवत गायत्री यज्ञ करें।
  • विशेष आहुतियों के बाद स्विष्टकृत, पूर्णाहुति आदि संपन्न करें।
  • विसर्जन से पहले दो थालियों में भोजन परोसें।
  • उसके बाद इनमें देवों और पितरों के लिए नैवेद्य करें।
  • पितृ नैवेद्य की थाली में किसी पुरोहित को भोजन कराए।
  • इसके बाद पंचबलि के भाग यथास्थान पहुँचाने की व्यवस्था करें।
  • पिण्ड नदी में विर्सजित या गायों को खिलाया जाता है।
  • रात्रि में संस्कार स्थल पर दीपक जलाकर रखें।
  1. यम देवता पूजन का विधान

मरणोत्तर संस्कार में यम देवता की आराधना का भी विधान है। यम देव को मृत्यु का देवता कहा जाता है। यम देवता पूजन के लिए पूजा की वेदी में चावलों की एक ढेरी यम के प्रतीक के रूप में रखी जाती है। अब यम से संबंधित इस मंत्र के साथ उनकी आराधना करें। इस दौरान हाथ में यव, अक्षत एवं फूल लेकर यम देवता का आवाहन करें। फिर मंत्र उच्चारण  कर यम स्तोत्र का जाप करें।

मंत्र :- “ॐ यमाय त्वा मखाय त्वा, सूर्यस्य त्वा तपसे ।।

देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु, पृथिव्याः स स्पृशस्पाहि ।।

अचिर्रसि शोचिरसि तपोऽसि॥

ॐ यमाय नमः ।। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।। ततो नमस्कारं करोमि॥”

  1. पितृ आवाह्न पूजन

मरणोत्तर संस्कार में पितृ आवाह्न पूजा सबसे प्रमुख कर्म कांड होता है। इसके लिए सबसे पहले कलश की वेदी पर तिल की छोटी ढेरी लगाकर उसके ऊपर दीपक रखें। इस दीपक के आसपास पुष्पों का घेरा होना चाहिए। कर्म कांड में उपस्थित लोग हाथ में अक्षत लेकर मृतात्मा का आवाहन करें। इस दौरान लगातार मन्त्रों का उच्चारण करते रहे। सामूहिक मंत्रोच्चार के बाद हाथों में रखे चावल स्थापना की चौकी पर छोड़ें। ध्यान रखें कि मृतात्मा का स्वागत सम्मान षोडशोपचार के साथ किया जाना चाहिए।

मंत्र :-ॐ विश्वेदेवास ऽ आगत, शृणुता म ऽ इम हवम् ।।

एदं बहिर्निर्षीदत ।। ॐ विश्वेदेवाः शृणुतेम हवं मे, ये अन्तरिक्षे यऽ उप द्यविष्ठ ।।

ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा, आसद्यास्मिन्बहिर्षि मादयध्वम् ।

ॐ पितृभ्यो नमः ।। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि ।।”

  1. तर्पण

आवाहन पूजा, के बाद तर्पण करने का विधान है। इसके लिए जल में दूध, जौ, चावल चंदन डाल कर तर्पण किया जाता है। संभव हो तो गंगा जल भी डालें। शास्त्रों में बताया गया है कि तर्पण आत्मा की तृप्ति के लिए किया जाता है। तर्पण को छः भागों में बाँटा गया है जो निम्नलिखित हैं :

  1. देव तर्पण
  2. ऋषि तर्पण
  3. दिव्य मानव तर्पण
  4. दिव्य पितृ तर्पण
  5. यम तर्पण
  6. मनुष्य पितृ तर्पण

देव तर्पण

भारतीय परंपरा के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्यों में सबसे पहले ईश्वर की पूजा का विधान होता है। इसलिए मरणोत्तर संस्कार में देव तर्पण किया जाता है। ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की भावना से यह देव तर्पण किया जाता है। इसमें सबसे पहले यजमान को दोनों हथों की अनामिका अंगुलियों में पवित्री धारण की जाती है। इस दौरान हाथों में जल अक्षत लेकर इस मंत्र का जाप करें –

“ॐ आगच्छन्तु महाभागाः, विश्वेदेवा महाबलाः ।।

ये तपर्णेऽत्र विहिताः, सावधाना भवन्तु ते॥

इसके पश्चात् जल में चावल डालें। कुश- मोटक सीधे ही लें। यज्ञोपवीत सव्य (बायें कन्धे पर) सामान्य स्थिति में रखें। तर्पण के समय अंजलि में जल भरकर सभी अँगुलियों के अग्र भाग के सहारे अर्पित करें। इसे देवतीर्थ मुद्रा कहते हैं। प्रत्येक देवशक्ति के लिए एक- एक अंजलि जल डालें। मन्त्र उच्चारण करते हुए पूवार्भिमुख होकर तर्पण देते चलें।

“ॐ ब्रह्मादयो देवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्। ॐ ब्रह्म तृप्यताम्। ॐ विष्णुस्तृप्यताम्। ॐ रुद्रस्तृप्यताम्। ॐ प्रजापतितृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यताम्। ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। ॐ पुराणाचायार्स्तृप्यन्ताम्। ॐ गन्धवार्स्तृप्यन्ताम्। ॐ इतराचायार्स्तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यन्ताम्। ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्। ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्। ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम्। ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। ॐ पर्वता स्तृप्यन्ताम्। ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्। ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्। ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपणार्स्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्। ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्।ॐ भूतग्रामः चतुविर्धस्तृप्यन्ताम्।”

इसी प्रकार अन्य तर्पणों को भी इसी विधि अनुसार किया जाता है और संस्कार के अन्य कर्म कांड संपन्न किए जाते हैं।

पंच यज्ञ की सही पूजा विधि

  1. ब्रह्मयज्ञ
  • ब्रह्मयज्ञ में गायत्री विनियोग होता है।
  • मरणोत्तर संस्कार के संदर्भ में एकत्रित होकर सभी कुटुम्बी- हितैषी परिजन साथ बैठें।
  • मृतक से जुड़ी अच्छी बातों को स्मरण करें और उसकी शान्ति-मोक्ष की कामना व्यक्त करते हुए सभी लोग भावनापूर्वक पाँच मिनट गायत्री मन्त्र का मानसिक जप करें।
  • ब्रह्ययज्ञ को उसकी पूर्णाहुति मानें और इस मंत्र के साथ संकल्प लें-

“नामाहं नाम्नः प्रेतत्वनिवृत्ति द्वारा, ब्रह्मलोकावाप्तये परिमाणं गायत्री महामन्त्रानुष्ठानपुण्यं श्रद्धापूर्वक अहं समर्पयिष्ये।”

  1. देवयज्ञ

देवयज्ञ में देव प्रवृत्तियों का पोषण और दुष्प्रवृत्तियों किया जाता है। ऐसा करने से दैविक शक्तियाँ प्रसन्न होती हैं। श्राद्ध के समय संस्कार करने वाले प्रमुख परिजन सहित उपस्थित सभी परिजनों को इस यज्ञ में यथाशक्ति भाग लेना चाहिए। अपने स्वभाव के साथ जुड़ी दुष्प्रवृत्तियों को सदैव के लिए या किसी अवधि तक के लिए छोड़ने, परमार्थ गतिविधियों को अपनाने का संकल्प कर लिया जाना चाहिए और उसका पुण्य मृतात्मा के हितार्थ अर्पित किया जाए। अंत में इस मंत्र के साथ संकल्प लें-

नामाहं नामकमृतात्मनः देवगतिप्रदानाथर् दिनानि यावत् मासपर्यन्तं- वर्षपर्यन्तम् दुष्प्रवृत्त्युन्मूलनैः सत्प्रवृत्तिसंधारणैः जायमानं पुण्यं मृतात्मनः समुत्कर्षणाय श्रद्धापूवर्कं अहं समर्पयिष्ये।”

  1. पितृयज्ञ
  • यह कृत्य पितृयज्ञ के अंतर्गत किया जाता है। जिस प्रकार तर्पण में जल के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त की जाती है, उसी प्रकार पितृयज्ञ के माध्यम से अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति की जानी चाहिए।
  • मरणोत्तर संस्कार में 12 पिण्डदान किये जाते हैं इसलिए जौ या गेहूँ के आटे में तिल, शहद, घृत, दूध मिलाकर लगभग एक-एक छटाँक आटे के 12 पिण्ड बनाकर एक पत्तल पर रख लेने चाहिए।
  • संकल्प के बाद एक-एक करके यह पिण्ड जिस पर रखे जा सकें, ऐसी एक पत्तल समीप ही रखें।
  • छः तर्पण जिनके लिए किये गये थे, उनमें से प्रत्येक वर्ग के लिए एक-एक पिण्ड है।
  • सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के लिए है।
  • अन्य पाँच पिण्ड उन मृतात्माओं के लिए हैं, जो पुत्रादि रहित हैं।
  • उन सबके निमित्त ये पाँच पिण्ड समर्पित हैं। संस्कार के बाद ये सभी बारहों पिण्ड पक्षियों के लिए अथवा गाय के लिए किसी उपयुक्त स्थान पर रख दिये जाते हैं।
  • पिण्ड रखने के निमित्त कुश बिछाते हुए निम्न मन्त्र बोलें: ॐ कुशोऽसि कुश पुत्रोऽसि, ब्रह्मणा निर्मितः पुरा। त्वय्यचिर्तेऽचिर्तः सोऽस्तु, यस्याहं नाम कीर्तये।”

पिण्ड समर्पण प्रार्थना

पिण्ड तैयार करके रखें और हाथ जोड़कर पिण्ड समर्पण के भाव सहित नीचे लिखे मन्त्र बोले-

“ॐ आब्रह्मणो ये पितृवंशजाता, मातुस्तथा वंशभवा मदीयाः। वंशद्वये ये मम दासभूता, भृत्यास्तथैवाश्रितसेवकाश्च॥ मित्राणि शिष्याः पशवश्च वृक्षाः, दृष्टाश्च स्पृष्टाश्च कृतोपकाराः। जन्मान्तरे ये मम संगताश्च, तेषां स्वधा पिण्डमहं ददामि।”

पिण्डदान

पिण्ड दाहिने हाथ में लिया जाए। मन्त्र के साथ पितृ तीर्थ मुद्रा से दक्षिणाभिमुख होकर पिण्ड किसी थाली या पत्तल में क्रमशः स्थापित करें-

-प्रथम पिण्ड देवताओं के निमित्त-

“ॐ उदीरतामवर उत्परास, ऽउन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः। असुं यऽईयुरवृका ऋतज्ञाः, ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु।”

-दूसरा पिण्ड ऋषियों के निमित्त-

“ॐ अंगिरसो नः पितरो नवग्वा, अथर्वणो भृगवः सोम्यासः। तेषां वय सुमतौ यज्ञियानाम्, अपि भद्रे सौमनसे स्याम॥”

-तीसरा पिण्ड दिव्य मानवों के निमित्त-

“ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासः, अग्निष्वात्ताः पथिभिदेर्वयानैः। अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तः, अधिब्रवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥”

-चौथा पिण्ड दिव्य पितरों के निमित्त-

“ऊजर वहन्तीरमृतं घृतं, पयः कीलालं परिस्रुत्। स्वधास्थ तर्पयत् मे पितृन्॥”

-पाँचवाँ पिण्ड यम के निमित्त-

“ॐ पितृव्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः, पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः, प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अक्षन्पितरोऽमीमदन्त, पितरोऽतीतृपन्त पितरः, पितरः शुन्धध्वम्॥”

-छठा पिण्ड मनुष्य-पितरों के निमित्त-

“ॐ ये चेह पितरों ये च नेह, याँश्च विद्म याँ२ उ च न प्रविद्म। त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः, स्वधाभियञ सुकृतं जुषस्व॥”

-सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के निमित्त-

“ॐ नमो वः पितरो रसाय, नमो वः पितरः शोषाय, नमो वः पितरों जीवाय, नमो वः पितरः स्वधायै, नमो वः पितरों घोराय, नमो वः पितरों मन्यवे, नमो वः पितरः पितरों, नमो वो गृहान्नः पितरों, दत्त सतो वः पितरों देष्मैतद्वः, पितरों वासऽआधत्त।”

-आठवाँ पिण्ड पुत्रदार रहितों के निमित्त-

“ॐ पितृवंशे मृता ये च, मातृवंशे तथैव च। गुरुश्वसुरबन्धूनां, ये चान्ये बान्धवाः स्मृताः ॥ ये मे कुले लुप्त पिण्डाः, पुत्रदारविवर्जिता:। तेषां पिण्डों मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥”

-नौवाँ पिण्ड अविच्छिन्न कुलवंश वालों के निमित्त-

“ॐ उच्छिन्नकुल वंशानां, येषां दाता कुले नहि। धर्मपिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु ॥”

-दसवाँ पिण्ड गर्भपात से मर जाने वालों के निमित्त-

“ॐ विरूपा आमगभार्श्च, ज्ञाताज्ञाताः कुले मम ॥ तेषां पिण्डों मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु ॥”

=ग्यारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित्त-

“ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा, ये प्रदग्धाः कुले मम्। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु, धर्मपिण्डं ददाम्यहम्॥”

-बारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित्त-

“ॐ ये बान्धवाऽबान्धवा वा, ये न्यजन्मनि बान्धवाः। तेषां पिण्डों मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु ॥’’

यदि तीर्थ श्राद्ध में, पितृपक्ष में से एक से अधिक पितरों की शान्ति के लिए पिण्ड अर्पित करने हों, तो नीचे लिखे वाक्य में पितरों के नाम- गोत्र आदि जोड़ते हुए वाञ्छित संख्या में पिण्डदान किये जा सकते हैं।

“………..गोत्रस्य अस्मद् …….नाम्नो, अक्षयतृप्त्यथरम् इदं पिण्डं तस्मै स्वधा॥”

पिण्ड समर्पण के बाद पिण्डों पर क्रमशः दूध, दही और मधु चढ़ाकर पितरों से तृप्ति की प्रार्थना की जाती है। इस मंत्र का उच्चारण करते हुए पिण्ड पर दूध दोहराएँ-

ॐ पयः पृथिव्यां पयऽओषधीषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्।

पिण्डदाता निम्नांकित मन्त्रांश को दोहराएँ-

ॐ दुग्धं। दुग्धं। दुग्धं। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्॥”

निम्नांकित मन्त्र से पिण्ड पर दही चढ़ाएँ-

ॐ दधिक्राव्णऽअकारिषं, जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखाकरत्प्रण, आयुषि तारिषत्।”

पिण्डदाता निम्नांकित मन्त्रांश दोहराएँ-

“ॐ दधि। दधि। दधि। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्।”

नीचे लिखे मन्त्रों साथ पिण्डों पर शहद चढ़ाएँ-

“ॐ मधुवाताऽऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीनर्: सन्त्वोषधीः।

ॐ मधु नक्तमुतोषसो, मधुमत्पाथिव रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता।

ॐ मधुमान्नो वनस्पति, मधुमाँ२ऽ अस्तु सूर्य:। माध्वीगार्वो भवन्तु नः।

पिण्ड दानकर्त्ता निम्नांकित मन्त्राक्षरों को दोहराएँ-

“ॐ मधु। मधु। मधु। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्।”

  1. भूतयज्ञ- पंचबलि

भूतयज्ञ के निमित्त पंचबलि प्रक्रिया की जाती है। विभिन्न योनियों में संव्याप्त जीव चेतना की तुष्टि हेतु भूतयज्ञ किया जाता है।

इसके लिए अलग-अलग पत्तों या एक ही बड़ी पत्तल पर, पाँच स्थानों पर भोज्य पदार्थ रखें।

इसके साथ ही उर्द दाल की टिकिया तथा दही भी रखें।

क्रमशः मन्त्र बोलते हुए एक-एक भाग पर अक्षत छोड़कर पंच बलि समर्पित करें।

  • गोबलि- पवित्रता की प्रतीक गऊ के निमित्त-

ॐ सौरभेयः सर्वहिताः, पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्णन्तु में ग्रासं, गावस्त्रैलोक्यमातरः॥ इदं गोभ्यः इदं न मम्।”

  • कुक्कुरबलि- कत्तर्व्यष्ठा के प्रतीक श्वान के निमित्त-

“ॐ द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ, वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रदास्यामि, स्यातामेतावहिंसकौ ॥ इदं श्वभ्यां इदं न मम ॥”

  • काकबलि- मलीनता निवारक काक के निमित्त-

“ॐ ऐन्द्रवारुणवायव्या, याम्या वै नैऋर्तास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्णन्तु, भुमौ पिण्डं मयोज्झतम्। इदं वायसेभ्यः इदं न मम ॥”

  • देवबलि- देवत्व संवधर्क शक्तियों के निमित्त-

“ॐ देवाः मनुष्याः पशवो वयांसि, सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता, ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्॥ इदं अन्नं देवादिभ्यः इदं न मम्।।”

  • पिपीलिकादिबलि- श्रमनिष्ठा एवं सामूहिकता की प्रतीक चींटियों के निमित्त-

“ॐ पिपीलिकाः कीटपतंगकाद्याः, बुभुक्षिताः कमर्निबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यथर्मिदं मयान्नं, तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु॥ इदं अन्नं पिपीलिकादिभ्यः इदं न मम।।”

बाद में गोबलि गऊ को, कुक्कुरबलि श्वान को, काकबलि पक्षियों को, देवबलि कन्या को तथा पिपीलिकादिबलि चींटी आदि को खिला दिया जाए।

  1. मनुष्य यज्ञ – श्राद्ध संकल्प
  • मनुष्य यज्ञ के अन्तर्गत दान का विधान है। मृतक ने इस संसार से जाते वक़्त अपने उत्तराधिकार में जो छोड़ा है, उसमें से संतान या जीवनसाथी के निर्वाह के लिए जितना ज़रुरी हो उतना अंश ही स्वीकार करना चाहिए।
  • हालाँकि जो कमाऊ सन्तान है उसे यह दान स्वीकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि माना जाता है कि दिवंगत आत्मा के अन्य अहसान ही इतने हैं कि उन्हें अनेक जन्मों तक चुकाना पड़ेगा, फिर नया ऋण भारी ब्याज सहित चुकाने के लिए क्यों सिर पर लादा जाए।
  • कन्या भोजन, दीन-अपाहिज, अनाथों को जरूरत की चीजें दान दें।
  • इस दौरान लोक हितकारी और कल्याणकारी कार्यों के लिए दिये जाने वाले दान की घोषणा श्राद्ध संकल्प के साथ करें।

संकल्प हेतु मंत्र

“नामाहं नामकमृतात्मनः शान्ति- सद्गति लोकोपयोगिकायार्थर् परिमाणे धनदानस्य कन्याभोजनस्य वा श्रद्धापूर्वक संकल्पम् अहं करिष्ये॥”

संकल्प के बाद नीचे दिए गए मन्त्र का उच्चारण करते हुए अक्षत व फूल देव पर चढ़ाएँ।

“ॐ उशन्तस्त्वा निधीमहि, उशन्तः समिधीमहि।। उशन्नुशतऽआ वह, पितृन्हविषेऽअत्तवे॥ ॐ दक्षिणामारोह त्रिष्टुप् त्वाऽवतु बृहत्साम, पञ्चदशस्तोमो ग्रीष्मऽऋतुः क्षत्रं द्रविणम्॥”

पंच यज्ञ पूरे करने के बाद अग्नि स्थापना करके गायत्री-यज्ञ सम्पन्न करें, फिर नीचे लिखे मन्त्र के साथ 3 विशेष आहुतियाँ दें।

“ॐ सूयर्पुत्राय विद्महे, महाकालाय धीमहि ।। तन्नो यमः प्रचोदयात् स्वाहा ।। इदं यमाय इदं न मम्॥

इसके बाद स्विष्टकृत पूर्णाहुति आदि करते हुए समापन करें। इसके बाद विसर्जन के पूर्व पितरों तथा देवशक्तियों के लिए भोज्य पदार्थ थाली में सजाकर नैवेद्य अर्पित करें और क्षमा-प्रार्थना, पिण्ड विसजर्न, पितृ विसर्जन तथा देव विसर्जन करें।

विसर्जन

  • पिण्ड विसर्जन के लिए नीचे लिखे मन्त्र के साथ पिण्डों पर जल अर्पित करें।

ॐ देवा गातुविदोगातुं, वित्त्वा गातुमित ।।

मनसस्पत ऽ इमं देव, यज्ञ स्वाहा वाते धाः॥”

  • अब पितरों का विसर्जन तिलाक्षत छोड़ते हुए करें और इस मंत्र का जाप करें –

“ॐ यान्तु पितृगणाः सवेर्, यतः स्थानादुपागताः।। सवेर् ते हृष्टमनसः, सवार्न् कामान् ददन्तु मे॥ ये लोकाः दानशीलानां, ये लोकाः पुण्यकर्मणां।। सम्पूर्णान् सवर्भोगैस्तु, तान् व्रजध्वं सुपुष्कलान॥ इहास्माकं शिवं शान्तिः, आयुरारोगयसम्पदः।। वृद्धिः सन्तानवगर्स्य, जायतामुत्तरोत्तरा॥”

  • देव विसजर्न हेतु अन्त में पुष्प और अक्षत को छोड़ते हुए देव विसर्जन करें तथा “ॐ यान्तु देवगणाः सवेर, पूजामादाय मामकीम्।। इष्ट कामसमृद्ध्यर्थ, पुनरागमनाय च॥” मंत्र का जाप करें। इस प्रकार मरणोत्तर संस्कार का कर्मकांड पूर्ण होता है।

हम आशा करते हैं कि मरणोत्तर संस्कार से जुड़े हमारे इस लेख में दी गई जानकारी आपके लिए उपयोगी साबित होगी। हमारी वेबसाइट से जुड़े रहने के लिए आपका साधुवाद !

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