जानिए कैसे हुए थे भगवान गणेश ‘एकदंत’, एक नहीं बल्कि कई कथाएं हैं प्रचलित

भगवान गणेश के कई नामों में से उनका एक नाम ‘एकदंत’ भी है। भगवान गणेश के धड़ पर हाथी का शीश स्थापित है लेकिन भगवान गणेश के पास आम हाथियों के मुख की तरह दो दांत नहीं हैं बल्कि इसकी जगह उनके सुंदर मुख-मंडल पर महज एक दांत मौजूद है। 

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मगर हमेशा से ऐसा ही नहीं था। भगवान गणेश के द्वारा एक दांत को खोने से जुड़ी एक नहीं बल्कि कई कथाएं सुनने को मिलती हैं जिसमें से एक कथा भगवान परशुराम से जुड़ी है जो कि काफी प्रचलित भी है। मगर इसके अलावा भी कई और कथाएं हैं। ऐसे में आज हम आपको इस लेख में भगवान गणेश के ‘एकदंत’ होने के पीछे मौजूद तीन बेहद प्रचलित कथाओं के बारे में बताने वाले हैं।

पहली कथा

भगवान गणेश के एकदंत होने से जुड़ी सबसे ज्यादा प्रचलित कथा भगवान परशुराम से जुड़ी है। भगवान परशुराम भगवान विष्णु के ऐसे अवतार माने जाते जो स्वभाव से बेहद उग्र थे। परशुराम के गुरु भगवान शिव थे। उन्हें हासिल फरसा जिसकी वजह से उनका नाम परशुराम पड़ा, भगवान शिव द्वारा ही आशीर्वाद स्वरूप उन्हें दिया गया था।

इस कथा के अनुसार मान्यता है कि एक बार भगवान परशुराम भगवान शिव से मिलने पहुंचे तो उन्हें द्वार पर भगवान गणेश मिले। भगवान गणेश ने परशुराम को द्वार पर ही रोक दिया। भगवान परशुराम द्वारा बार-बार आग्रह करने के बावजूद भी जब भगवान गणेश ने उन्हें भगवान शिव से नहीं मिलने दिया तो परशुराम क्रोधित हो उठे और उन्होंने गणेश जी को युद्ध की चुनौती दे दी। 

भगवान गणेश ने परशुराम जी की इस चुनौती को स्वीकार किया और परशुराम जी से युद्ध करने लगे। इसी युद्ध में भगवान परशुराम ने भगवान गणेश पर फरसा चला दिया जिससे गणेश जी का एक दांत टूट गया और वे एकदंत बन गए।

दूसरी कथा

भगवान गणेश के एकदंत होने की एक कथा महाभारत से जुड़ी हुई है। इस कथा के अनुसार जब वेदव्यास ने महाभारत लिखने के लिए गणेश जी की मदद मांगी थी तब गणेश जी ने उनके सामने एक शर्त रखी थी कि जैसे ही वेदव्यास बोलना बंद करेंगे, भगवान गणेश उसी समय महाभारत लिखना बंद कर देंगे और चले जाएंगे। कहते हैं कि महाभारत लिखने के लिए गणेश जी ने तब अपना एक दांत तोड़ कर उसकी कलम बनाई थी और उसी से पूरा महाभारत लिखा गया था।

तीसरी कथा

भगवान गणेश के एकदंत होने की एक कथा असुर से जुड़ी है। कहते हैं कि गजमुखासुर नामक एक असुर ने यह आशीर्वाद प्राप्त कर लिया था कि वह किसी भी अस्त्र या शस्त्र से मारा नहीं जा सकता है। इसकी वजह से गजमुखासुर लगभग अमर हो गया और उसने देवताओं और मनुष्यों को परेशान करना शुरू कर दिया। तब मनुष्यों और देवताओं को बचाने के लिए भगवान गणेश ने अपने ही दांत से गजमुखासुर का वध किया था जिसकी वजह से उन्हें अपना एक दांत गंवाना पड़ गया।

ये भी पढ़ें : वो प्राचीन गुफा जहाँ भगवान गणेश ने सुनी थी महाभारत।

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