केशांत संस्कार-संपूर्ण विधि और महत्व !

हिन्दू धर्म में वर्णित सभी सोलह संस्कारों में ग्यारहवां संस्कार है केशांत संस्कार। जैसा की नाम से ही स्पष्ट है ये संस्कार भी केश यानि की बालों से जुड़े हैं। केशों से जुड़े अन्य संस्कारों में सबसे पहले मुंडन संस्कार और उपनयन संस्कार का जिक्र किया जाता है। यूँ तो केशांत संस्कार इस दोनों संस्कारों से बिल्कुल ही अलग है। लेकिन कुछ हद तक इसकी समानता मुंडन संस्कार से है अंतर सिर्फ इतना है कि मुंडन संस्कार में शिशु के जन्म के बालों को हटाया जाता है और केशांत संस्कार में उनके किशोरावस्था के बालों को हटाया जाता है। ये संस्कार विशेष रूप से हिन्दू धर्म को मानने वाले बालकों के लिए होता है। अमूमन ऐसा होता है कि किशोरावस्था में आने वाली दाढ़ी-मूंछ को आजकल यूँ ही बिना किसी विधि के हटा दिया जाता है। लेकिन यदि हम हिन्दू धर्म की बात करें तो इसमें बालकों के किशोरावस्था के बालों को विशेष रूप से दाढ़ी और मूंछ को हटाने के लिए विशेष विधि की बात की गयी है जिसे केशांत संस्कार कहा जाता है। आज इस लेख के जरिये हम आपको केशांत संस्कार की संपूर्ण विधि और इसके महत्वों के बारे में बताने जा रहे हैं। आईये जानते हैं हिन्दू धर्म के प्रमुख संस्कारों में से एक केशांत संस्कार के महत्वों के बारे में।

केशांत संस्कार को संपन्न करने का उचित समय

प्राचीन काल में गुरुकुल प्रथा के दौरान इस संस्कार को संपन्न करवाया जाता था। ये संस्कार विशेष रूप से बालक के किशोरावस्था को त्याग कर गृहस्थावस्था में प्रवेश करने के लिए करवाया जाता था। जब बालक गुरुकुल की शिक्षा पूरी कर घर संसार से जुड़ी जिम्मेदारियों को उठाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाता था तो उस समय गुरुकुल से विदाई से पहले इस संस्कार को गुरुकुल में ही संपन्न करवाया जाता था। केशांत संस्कार के दौरान गुरुकुल में ही पढ़ाई पूरी करने के बाद बालक जब गृहस्थ जीवन में प्रवेश के लिए तैयार हो जाता है उस समय सभी गुरुओं की उपस्थिति में उसके किशोरावस्था के दाढ़ी और मूंछ के साथ ही सिर के बालों को भी हटाया जाता था। ये पहली बार होता है जब बालक अपने दाढ़ी और मूंछ को हटाता है। यहीं से उसका किशोरावस्था समाप्त होता है और वो गृहस्थ जीवन की ज़िम्मेदारी उठाने योग्य बन जाता है। शास्त्रों के मुताबिक सोलह वर्ष से कम आयु के किशोरों का केशांत संस्कार नहीं करवाना चाहिए। इस संस्कार के लिए न्यूनतम आयु 16 वर्ष ही बताई गयी है। इस संस्कार को करते वक़्त मुख्य-तौर पर इस मंत्र का जप करना अनिवार्य होता है। “केशानाम् अन्तः समीपस्थितः श्मश्रुभाग इति व्युत्पत्त्या केशान्तशब्देन श्मश्रुणामभिधानात् श्मश्रुसंस्कार एवं केशान्तशब्देन प्रतिपाद्यते। अत एवाश्वलायनेनापि ‘श्मश्रुणीहोन्दति’। इति श्मश्रुणां संस्कार एवात्रोपदिष्टः।”

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केशांत संस्कार का विशेष महत्व

हिन्दू धर्म में केशांत संस्कार को खासतौर से महत्वपूर्ण माना गया है। अगर यूँ कहें कि इस संस्कार के बिना किसी भी पुरुष का जीवन अधूरा होता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस संस्कार की अहमियत इसलिए इतनी विशेष होती है क्योंकि इसके बाद ही कोई भी व्यक्ति किशोरावस्था को छोड़कर गृहस्थावस्था में प्रवेश करता है। किशोरावस्था में आए हुए दाढ़ी-मूंछ को इस संस्कार के द्वारा पहली बार हटाया जाता है और किशोर युवक को गृहस्थ जीवन के बारे में विशेष जानकारी दी जाती है। हालाँकि आज कल के आधुनिक युग में इस संस्कार को बहुत ही कम लोग संपन्न करवाते हैं लेकिन प्राचीन काल में गुरुकुल प्रथा के दौरान इस संस्कार को विशेष रूप से करवाया जाता था। इस संस्कार की यूँ तो कोई ख़ास समयावधि नहीं है लेकिन पहले जब बालक अपनी गुरुकुल की दीक्षा पूरी कर लेते थे तो घर जाने से पहले इस संस्कार को विधि पूर्वक संपन्न करने के बाद उन्हें ब्रह्मचर्य जीवन को त्याग कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश के लिए प्रेरित किया जाता है।

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में बालक को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने से पहले कुछ ख़ास बातों की जानकारी दी जाती थी जिनका पालन करना अनिवार्य माना जाता था। आज इस संस्कार से लोग दूर हो रहे हैं क्योंकि अब गुरुकुल की प्रथा ही ख़त्म हो चुकी है, इसलिए भी बहुत से लोगों को इस संस्कार के बारे में जानकारी भी नहीं है। यदि हम आधुनिक काल की बात करें तो आजकल बालक जब अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी कर लेता है तो उसके बाद किशोरावस्था के दौरान आए श्मश्रु(दाढ़ी) स्वयं भी बना लेता है। जबकि ये प्रक्रिया पूरे विधि विधान के साथ ही पूरी की जानी चाहिए। ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद एक बालक किशोर नहीं रहता बल्कि वो सांसारिक जीवन में प्रवेश करता है। इस संस्कार के बाद किशोर को वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने की भी धार्मिक इजाज़त मिल जाती है।

इस प्रकार से करें केशांत संस्कार की विधि

  • अन्य प्रमुख संस्कारों की तरह ही इस संस्कार के लिए भी पहले शुभ मुहूर्त की गणना की जाती है।
  • ये संस्कार मुख्य रूप से गुरुकुल में ही संपन्न की जाती थी लेकिन आजकल इसे घर पर भी संपन्न करवाया जा सकता है।
  • 16 वर्ष की आयु से कम किशोरों का केशांत संस्कार नहीं किया जाता है।
  • इस संस्कार को करने वाले बालक को इस दिन व्रत रखना चाहिए।
  • केशांत संस्कार के दौरान बालक के किसी एक गुरु की उपस्थिति अनिवार्य है।
  • इस संस्कार को सूर्य के उत्तरायण होने पर ही संपन्न करवाना चाहिए।
  • बालक को सूर्योदय से पूर्व ही इस संस्कार की क्रिया विधि शुरू करनी चाहिए।
  • संस्कार का समापन क्रिया सूर्योदय के होते ही स्नान करने के बाद संपन्न हो जानी चाहिए।
  • बालक को सर्वप्रथम अपने गुरु का आशीर्वाद लेना चाहिए और उसके बाद सभी देवी देवताओं का मनन कर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए।
  • इसके बाद अपने दाढ़ी-मूंछ के साथ ही सिर के बालों को भी कटवाना चाहिए।
  • इस संस्कार के दौरान विशेष मंत्रों का उच्चारण भी किया जाता है।
  • अब स्नान करने के बाद गुरु द्वारा उन्हें गृहस्थ जीवन में दाखिल होने की कुछ विशेष जानकारी दी जाती है।

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केशांत संस्कार के दौरान इन मंत्रों का जाप अवश्य होना चाहिए

हिन्दू धर्म के ग्यारहवें संस्कार केशांत संस्कार के समापन के दौरान कुछ ख़ास मंत्रों का उच्चारण करना भी विशेष मायने रखता है। ये ख़ास मंत्र निम्नलिखित हैं।

“केशानाम् अन्तः समीपस्थितः श्मश्रुभाग इति व्युत्पत्त्या केशान्तशब्देन

श्मश्रुणामभिधानात् श्मश्रुसंस्कार एवं केशान्तशब्देन प्रतिपाद्यते।

अत एवाश्वलायनेनापि ‘श्मश्रुणीहोन्दति’।

इति श्मश्रुणां संस्कार एवात्रोपदिष्टः।”

हम आशा करते हैं कि केशांत संस्कार पर आधारित हमारा ये लेख आपको पसंद आया होगा। इस लेख से जुड़े कोई भी सुझाव आप हमे नाचे कमेंट बॉक्स में टिप्पणी कर दें सकते हैं। हम आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।

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