जानें किस दिन मनाई जाएगी हरियाली तीज और क्या है शुभ मुहूर्त

सुहागिन महिलाओं के लिए हरियाली तीज का यह पर्व ख़ास महत्व रखता है। तो आइये अपने इस ख़ास आर्टिकल में जानते हैं इस दिन की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, इस दिन का महत्व, इत्यादि सभी ज़रूरी बातें। साथ ही अगर आप अपने पति के जीवन से संबंधित किसी भी समस्या का हल जानना चाहती हैं तो अभी जाने-माने ज्योतिषियों से प्रश्न पूछकर उचित परामर्श प्राप्त करें। 

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आस्था और प्रेम का पर्व: हरियाली तीज 

हरियाली तीज के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं|  इस दिन महिलाएं श्रृंगार करती हैं और हाथों में मेहँदी लगाती हैं| कहते हैं ये वो समय होता है जब सावन में प्रकृति ने हरियाली की चादर ओढ़ी हुई होती है| यही वजह है कि इस त्यौहार को हरियाली तीज कहते हैं| सुहागिन महिलाओं के लिए ये व्रत बेहद महत्वपूर्ण माना गया है|

हरियाली तीज तिथि से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी 

हरियाली तीज इस वर्ष  23 जुलाई 2020, गुरुवार 
हरियाली तीज तृतीया शुरू  जुलाई 22, 2020 को 19:23:49 से लेकर… 
हरियाली तीज तृतीया अंत  जुलाई 23, 2020 को 17:04:45 तक 

(अपने शहर के अनुसार हरियाली तीज का मुहूर्त जानने के लिए यहाँ क्लिक करें)

हरियाली तीज का ये खूबसूरत त्यौहार श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है| ये पर्व मुख्यतः उत्तर भारत में मनाये जाने का चलन है। उत्तर प्रदेश में इस दिन को कजली तीज के रूप में मनाया जाता है। प्रेम और आस्था के इस त्यौहार का सीधा सम्बन्ध भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन से जोड़ा जाता है। 

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हरियाली तीज पूजा विधि 

  • हर शुभ दिन की ही तरह इस दिन भी सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ़ कपड़े पहनकर मन में निष्ठा से पूजा का संकल्प लें
  • इस दिन पूजा के दौरान ‘हे गौरी शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया। तथा मां कुरु कल्याणी कांत कांता सुदुर्लभाम्’, इस मन्त्र का जाप अवश्य करें। 
  • इस दिन बहुत सी महिलाएं काली मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति बनाती हैं। 
  • इसके बाद थाल में सुहाग की चीज़ें रखें और माता पार्वती को समर्पित कर दें। 
  • इसके बाद भगवान शिव को वस्त्र चढ़ाएं।  
  • हरियाली तीज के दिन तीज कथा सुनी जाती है। 

हरियाली तीज परंपरा 

हरियाली तीज के इस त्यौहार से जुड़ी कई खूबसूरत परंपरा भी होती है। मान्यता के अनुसार शादी के बाद पड़ने वाली हरियाली तीज का बहुत महत्व बताया गया है। इस दौरान नवविवाहित लड़कियों को ससुराल से मायके बुला लिया जाता है। 

  • हरियाली तीज से एक दिन पहले नवविवाहित लड़की के ससुराल की तरफ से कपड़े, गहने, साज-श्रृंगार का सामान, मेहँदी, और फल मिठाई लड़की के मायके भेजी जाती है। 
  • कहा जाता है कि इस दिन हाथों में मेहँदी लगाने का बहुत महत्व होता है। 
  • हरियाली तीज के दिन महिलाएं दुल्हन की तरह सजती हैं। हाथों में मेहँदी और पैरों में आलता इनकी खूबसूरती को कई गुना बढ़ा देता है। बता दें मेहँदी और आलता सुहागिन महिलाओं की निशानी होती है। 
  • पूजा इत्यादि के बाद इस दिन सुहागिनें अपनी सास के पैर छूकर उन्हें सुहागी देती हैं। अगर किसी भी सूरत में सास नहीं होती हैं तो सुहागी घर की किसी भी अन्य सम्मानित महिला को दी जाती है। 
  • महिलाएं इस दिन साज-श्रृंगार कर के माँ पार्वती की पूजा करती हैं। 
  • इस दिन एक और खूबसूरत परंपरा का पालन किया जाता है जिसमें बागों में झूले लगाए जाते हैं और महिलाएं इस पर झूलती और लोक गीत पर नाचती-गाती हैं।   

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हरियाली तीज पर इन बातों को छोड़ने का लिया जाता है संकल्प 

हरियाली तीज का व्रत महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र की कामना के लिए रखती हैं। साथ ही इस दिन से जुड़ी एक अनोखी प्रथा के चलते हरियाली तीज के दिन महिलाएं तीन बातों को छोड़ने का संकल्प लेती हैं। जानिए क्या हैं वो तीन बातें :

  • पहली बात, पति से किसी भी बात पर छल-कपट नहीं करना है।
  • दूसरी बात, अपने पति से झूठ नहीं बोलना है और ना ही उनके साथ कोई दुर्व्यवहार करना है। 
  • तीसरी बात, किसी भी बात पर दूसरों की बुराई करने से बचना है। 

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हरियाली तीज पौराणिक कथा 

इस त्यौहार से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार बताया जाता है कि, एक दिन खुद भगवान शिव, माता पार्वती को इस व्रत का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि, ‘पार्वती, आपने मुझे पति के रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया लेकिन, किसी भी जन्म में आप मुझे पति के रूप में नहीं पा सकीं। इसके बाद 108वीं बार जब आपने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया तब आपने मुझे पाने के लिए घोर तप करना शुरू किया। 

इस दौरान आपने अन्न-जल सबकुछ त्याग दिया और सूखे पत्ते चबाकर अपने दिन व्यतीत किये। उस समय ना ही आपको मौसम की सुध थी ना समय की। आपकी ऐसी हालत देखकर आपके पिताजी को भी काफी क्रोध आया था। आपने तप करने के लिए एक गुफा चुनी थी जहाँ आप मेरी भक्ति में पूरी तरह से लीन हो चुकी थीं। 

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 भाद्रपद तृतीय शुक्ल को आपने रेत से मेरी शिवलिंग बनायी और अपनी भक्ति शुरू रखी। तब आपकी भक्ति से प्रसन्न होकर मैंने आपकी मनोकामना पूरी की थी। तब आपने अपने पिताजी से हमारी बात करते हुए कहा था कि, ‘हे पिताजी, मैंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा भगवान शिव की भक्ति में समर्पित किया है, और अब तो उन्होंने भी मेरी भक्ति से प्रसन्न होकर मुझे अपना लिया है। अब अगर आप मेरी और भगवान शिव की शादी कराने का फैसला कर लें तो मैं आपके साथ चल लूंगी।’

माता पार्वती की ऐसी बातें सुनकर पर्वतराज हिमालय ने उनकी शर्त मान ली और पूरे विधि-विधान से उन दोनों का विवाह करवा दिया। आगे भगवान शिव ने कहा कि, ‘हे पार्वती! भाद्रपद शुक्ल तृतीया को आपने मुझे पति के रूप में पाने के लिए मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह मुमकिन हुआ| इस अनोखे व्रत का महत्त्व यह है कि इस व्रत को जो कोई भी स्त्री पूरी निष्ठा के साथ करेगी उसे मैं मनवांछित फल दूंगा| इसलिए ही मान्यता है कि इस व्रत को जो कोई भी स्त्री पूरी श्रद्धा से करती है वो माँ पार्वती की ही तरह अचल सुहागिन होती है|

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