जानिए झूलेलाल जयंती का शुभ मुहूर्त और पूजन महत्व

झूलेलाल जयंती या जिसे चेटीचंड भी कहते हैं वो सिंधियों का एक प्रमुख त्यौहार है। झूलेलाल भगवान वरुण देव के एक रूप हैं। झूलेलाल जयंती को सिंधी समाज में काफी बड़े स्तर पर मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार झूलेलाल जयंती चैत्र मास की द्वितीया तिथि को मनाई जाती है। इस साल झूलेलाल जयंती 26 मार्च 2020, गुरुवार को मनाई जाएगी। सिंधी समाज में झूलेलाल जयंती को चेटीचण्ड के नाम से भी जानते हैं।

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जानें झूलेलाल जयंती का दिन और शुभ मुहूर्त 

2020 में झूलेलाल जयंती/चेटी चंड 26 मार्च, 2020 (गुरुवार) को मनाई जाएगी।

  • मार्च 25, 2020 को 17:28:39 से द्वितीया आरम्भ
  • मार्च 26, 2020 को 19:55:17 पर द्वितीया समाप्त

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झूलेलाल जयंती का महत्व 

झूलेलाल जयंती या चेटीचंड महोत्सव के बारे में मान्यता है कि, ‘बहुत समय पहले सिंध प्रदेश के ठट्ठा नाम के नगर में एक मिरखशाह नाम का राजा हुआ करता था। राजा मिरखशाह  हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार करता था। अत्याचार के साथ-साथ वो हिन्दुओं पर धर्म परिवर्तन के लिए भी दबाव डालने लग गया था। एक बार उसने धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालते हुए हिन्दुओं को सात दिन का समय दे डाला।

तब राजा के अत्याचार से परेशान होकर बहुत से लोग सिंधु नदी के किनारे पहुंचे और भूखे-प्यासे रहकर उन्होंने वरुण देवता की उपासना शुरू कर दी। अपने भक्तों की ऐसी हालत देखकर भगवान वरुण का दिल पसीज गया और वो मछली पर दिव्य पुरुष के रूप में अवतरित हुए और अपने भक्तों को आश्वासन देते हुए कहा कि, “तुम लोग आश्वस्त होकर वापिस जाओ, मैं तुम लोगों की सहायता के लिए 40 दिन में ही नसरपुर में अपने एक भक्त रतनराय के घर माता देवकी के गर्भ से जन्म लूंगा।”

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भक्तों को दिए अपने वादे के मुताबिक चैत्र माह की द्वितीया तिथि को एक बालक ने जन्म लिया जिसका नाम उडेरोलाल रखा गया और उसी बालक ने मिरखशाह के अत्याचार से सभी को बचाया।

सिंधी लोगों के बीच इस त्यौहार को लेकर है ऐसी मान्यता

इस त्यौहार से जुड़ी यूँ तो कई कथाएं और मान्यताएं मशहूर हैं लेकिन इनमें से सबसे प्रमुख मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि, जब सिंधी व्यापारी जल के रास्ते से होते हुए गुज़रते थे तो उन्हें अलग-अलग तरह की कई समस्याओं का सामना करना पड़ता था जैसे तूफ़ान, समुद्री जीव,चट्टानें, समुद्री लुटेरे, इत्यादि। ऐसे में आदमियों की रक्षा के लिए महिलाएं जल के देवता भगवान झूलेलाल उपासना करती थीं और जब पुरुष सकुशल लौट आते थे तब चेटीचंड को उत्सव के रूप में मनाया जाता था। इसके बाद मन्नतें पूरी की जाती थीं और भंडारा किया जाता था। इस दिन सिंधी लोग भगवान झूलेलाल की महिमा के गीत गाते हैं और मीठे चावल, उबले नमकीन चने और शरबत का प्रसाद बांटते हैं।

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जानें झूलेलाल जयंती/चेटी चंड पूजन विधि

इस दिन सिंधी लोग भगवान झूलेलाल की शोभा यात्रा निकालने से दिन की शुरुआत करते हैं। कई जगहों पर इस दिन धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।

  • इस दिन सुबह उठकर स्नानादि कर के मंदिर जाने और घर के सभी बूढ़े-बुज़ुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है।
  • इस दिन सिंधी समाज के लोग किसी भी पवित्र नदी या झील के किनारे पर बहिराणा साहिब की परंपरा को पूरा करते हैं। क्या होती है बहिराणा साहिब? दरअसल इसमें आटे की लोई पर दीपक, मिश्री, सिंदूर, लौंग, इलायची, फल रखकर पूजा की जाती है और फिर इसे बहते पानी  में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसको करने के पीछे ऐसी मान्यता है कि जब भी भगवान कोई इच्छा पूरी करते हैं तो लोग इस तरह से उनका आभार प्रकट करते हैं।
  • इस दिन झूलेलाल की पूजा की जाती है और फिर सब लोग एक स्वर में ‘चेटी चंड जूं लख-लख वाधायूं’ का घोष करते हैं।
  • इस दिन जल देवता वरुण की भी पूजा की जाती है।
  • चेटी चंड के मौके पर नवजात शिशुओं का मुंडन भी कराया जाता है।

झूलेलाल जयंती से जुड़ी पौराणिक कथा

चेटी चंड का ये त्यौहार सिंधी नववर्ष का शुभारंभ दिवस है। इसी दिन भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था। भगवान झूलेलाल के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए कई बड़े और साहसिक काम किये थे। इसके अलावा उन्होंने हिंदू-मुस्लिम की एकता के बारे में भी अपने विचार रखे थे और एक ईश्वर के सिद्धांत पर जोर दिया।

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