आश्चर्य का केंद्र बना हुआ है बिहार का ये ‘जिंदा शालिग्राम’, 200 साल से बढ़ रहा है इसका आकार

भारत में जितने भी मंदिर हैं वो हिंदुओं की भावनाओं से तो जुड़े ही हैं लेकिन साथ ही साथ ये मंदिर कई बार ऐसे चमत्कार भी दिखा जाते हैं जिसे देखने के बाद लोगों का विश्वास इन पर और भी बढ़ जाता है।  आस्था और आश्चर्य की डोर से जुड़े एक और मंदिर की कहानी हम आज आपको बताने जा रहे हैं। इस मंदिर में जो बात आश्चर्य की वजह बनी हुई है वो है इस मंदिर में रखा एक शालिग्राम। शालिग्राम यूँ तो एक पत्थर होता है लेकिन इस मंदिर में मौजूद ये पत्थर लगातार ही बढ़ रहा है जिसके चलते लोग इसे ‘ज़िंदा शालिग्राम’ भी कहने लगे हैं।

क्या होता है शालिग्राम?

सबसे पहले हम आपको ये बता दें कि शालिग्राम एक तरह के पत्थर ही होते हैं।  ये दिखने में शंख की तरह चमकीले और ख़ूबसूरत होते हैं। ये काफी छोटे आकर के होते हैं।  शालिग्राम को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है। वैष्णव इसकी पूजा करते हैं। ये शालिग्राम आकृति में शंख की तरह और रंग में भूरे, सफेद या फिर नीले होते हैं। अमूमन तौर पर शालिग्राम नेपाल के काली गंडकी नदी के तट पर पाए जाते हैं। कहते हैं कि एक पूर्ण शालिग्राम में भगवान विष्णु के चक्र की आकृति अंकित होती है।

क्यों कहा जाता है इस मंदिर में रखे शालिग्राम को ‘ज़िंदा शालिग्राम’?

यकीनन आपने आजतक किसी भी पत्थर के अंदर कोई जान नहीं देखी होगी लेकिन यहाँ हम जिस ख़ास शालिग्राम की बात कर रहे हैं उसे जाना ही ‘ज़िंदा शालिग्राम के नाम से जाना जाता है। इसकी एक वजह है. दरअसल जानकार बताते हैं कि ये शालिग्राम जब से इस मंदिर में रखा गया है तब से ही ये लगातार अपना आकार बदल रहा है।  कहा जाता है कि जब इस शालिग्राम को मंदिर में स्थापित किया गया था तब ये एक मटर के दाने के बराबर हुआ करता था लेकिन अब इसका आकार बढ़कर ये दो नारियल के बराबर तक हो गया है।  

ये ख़ास शालिग्राम पश्चिम चंपारण के बगहा पुलिस जिला स्थित पकीबावली मंदिर के गर्भगृह में है।  कहा जाता है कि 200 साल पहले नेपाल नरेश जंग-बहादुर ने इसे भेंट किया था। तब से ये शालिग्राम लगातार अपना आकार बढ़ा रहा है।  इस शालिग्राम का आकार अभी भी बढ़ रहा है। इस ख़ास और अनोखी पिंडी के दर्शन के लिए आज भी दूर-दूर से लोग आते हैं। अपनी इसी ख़ासियत के चलते ये शालिग्राम हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र बना रहता है। 

नेपाल से भारत ऐसे पहुंचा था ये शालिग्राम 

अब ये शालिग्राम भारत कैसे पहुंचा इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। बताया जाता है कि आज से तकरीबन 200 साल पहले नेपाल के तत्कालीन नरेश जंग-बहादुर अंग्रेजी सरकार के आदेश पर किसी जागीरदार को गिरफ्तार करने के लिए निकले थे. उस वक़्त उन्होंने बगहा पुलिस जिले में अपना कैंप लगाया था। उस वक़्त जैसे ही लोगों को भनक लगी कि नेपाल नरेश आये हुए हैं तो एक हलवाई तुरंत उनके स्वागत के लिए एक बड़ी सी थाल में ढेर सारी मिठाईयां, पकवान लेकर नरेश के पास जा पहुंचा। राजा को हलवाई का ये स्वागत काफी अच्छा लगा. हलवाई के स्वागत से खुश होकर नरेश ने उसे नेपाल आने का न्यौता दे दिया।  कुछ समय बाद जब हलवाई नेपाल पहुंचा तो वहां के लोगों ने उसका भव्य स्वागत किया। इसी आवभगत में नेपाल के राजपुरोहित ने हलवाई को भेंट स्वरुप एक छोटा सा शालिग्राम दिया।  

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हलवाई उस शालिग्राम को पाकर बहुत खुश हुआ. वापिस भारत आकर उसने एक भव्य मंदिर बनवाया और उसमें उस ‘शालिग्राम’ को स्थापित कर दिया।  उस समय से लेकर आजतक ये शालिग्राम उसी स्थान पर रखा है लेकिन उसका आकार लगातार ही बढ़ रहा है। 

वैज्ञानिक भी इस पिंडी पर शोध कर चुके हैं 

जब भी कोई ऐसी बात या चीज़ सामने आती है तो वो वैज्ञानिकों के शोध का कारण बन ही जाती है।  ऐसे में बिहार में मौजूद शालिग्राम के भी साथ ऐसा ही हुआ। लगातार बढ़ रहे इस पिंडी पर वैज्ञानिकों ने भी शोध किया  लेकिन वो भी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सके। ज़िंदा शालिग्राम उनके लिए भी उतने ही आश्चर्य की वजह बना हुआ है जितना हमारे आपके लिए।  हिन्दू धर्म में शालिग्राम की काफी मान्यता बताई गयी है। कहा जाता है कि जिस घर में शालिग्राम की पूजा की जाती है उस घर को माँ लक्ष्मी अपना घर बना लेती हैं और वो वहां से कहीं नहीं जाती।

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