भीमाष्टमी व्रत: जानें इसका महत्व और इस दिन से जुड़ी पौराणिक कथा

भीमाष्टमी माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ती है। वर्ष 2021 में भीमाष्टमी 19 फरवरी-शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी। शास्त्रों के अनुसार यह वही दिन है जिस दिन महाभारत के प्रमुख पात्र भीष्म पितामह जी ने अपनी इच्छा से अपने शरीर का त्याग किया था। ऐसे में इस दिन को लेकर ऐसी मान्यता है कि, भीष्म अष्टमी के दिन जो कोई भी व्यक्ति भीष्म के निमित्त सच्ची श्रद्धा और आस्था से व्रत-पूजा और तर्पण इत्यादि करता है उसे वीर और सत्यवादी पुत्र की प्राप्ति होती है। 

आइए अब जानते हैं कि, आखिर भीष्म कौन थे? उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान कैसे मिला? और इस दिन के बारे में बहुत कुछ। 

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कौन थे भीष्म पितामह?

महाभारत के मुख्य पात्र कहे जाने वाले भीष्म पितामह बाल ब्रह्मचारी और कौरवों के पूर्वज हुआ करते थे। भीष्म पितामह के पिता का नाम राजा शांतनु और माता का नाम भगवती गंगा था। भीष्म पितामह के जन्म के समय इनका नाम देवव्रत था। अपने पितृ भक्ति के कारण ही भीष्म पितामह ने आजीवन विवाह न करने और ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लिया था और उससे अपने अंतिम क्षण तक निभाया भी था। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। यही वजह है कि, महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह को अर्जुन के कई तीर लगने के बावजूद भी वह 18 दिनों तक बाणों की शैय्या पर लेटे रहे, लेकिन उन्होंने अपने प्राण नहीं त्यागे। बताया जाता है कि, क्योंकि भीष्म पितामह को इस बात का आभास था कि, अगर वह माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को अपना शरीर त्यागेंगे तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी और उन्होंने ऐसा किया भी। 

सूर्य के उत्तरायण होने पर भीष्म पितामह ने अपने शरीर का त्याग किया। यह दिन था माघ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का दिन। तब से ही इस दिन को भी भीमाष्टमी के रूप में मनाए जाने का विधान शुरू हुआ। कई जगहों पर इस दिन को भीष्म निवारण तिथि के नाम से भी जाना जाता है। 

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भीमाष्टमी दिन क्या करें? 

भीमाष्टमी का दिन बेहद ही खास महत्व रखता है। ऐसे में जो कोई भी इंसान भी भीमाष्टमी के दिन कुश, तिल और जल से भीष्म पितामह का सच्चे मन से तर्पण करता है और व्रत करता है उस इंसान को पितृ दोष और अपने अतीत में किए गए सभी पापों से मुक्ति मिलती है। साथ ही ऐसे लोगों को वीर संतान की प्राप्ति होती है। 

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भीमाष्टमी का धार्मिक महत्व 

महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों के साथ खड़े थे और कौरवों को ही उन्होंने अपना भरपूर समर्थन दिया। भीष्म पितामह शिखंडी के साथ युद्ध नहीं करने और उनके विरुद्ध किसी भी प्रकार का हथियार ना चलाने का संकल्प ले चुके थे। तब अर्जुन ने शिखंडी के पीछे खड़े होकर भीष्म पितामह पर हमला कर दिया और जिस से घायल होने के बाद भीष्म पितामह बाणों की शैया पर जा गिरे। हिंदू मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि, जो कोई भी व्यक्ति उत्तरायण के दिन अपना शरीर त्यागता है उसे निश्चित तौर पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे में भीष्म पितामह ने भी कई दिनों तक बाणों की शैया पर लेट कर उत्तरायण की प्रतीक्षा की और अंत में उत्तरायण के दिन ही उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया। जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। उत्तरायण अब भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। 

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भीष्म पितामह से जुड़ी कहानी 

भीष्म पितामह कोई सामान्य इंसान नहीं थे। उन्हें मनुष्य के रूप में एक देवता माना जाता है। अपने जीवन भर उन्होंने ब्रह्मचर्य का कड़ा पालन किया और अपने योग विद्या से अपने शरीर को पुण्य बना लिया था। जन्म लेने के साथ भीष्म पितामह का नाम देवव्रत हुआ करता था। हस्तिनापुर में जन्मे देवव्रत के पिता का नाम महाराज शांतनु था और माता का नाम देवी गंगा था। देवी गंगा अपने पति राजा शांतनु को दिए वचनों के अनुसार अपने पुत्र को अपने साथ लेकर गई। ऐसे में देवव्रत की प्रारंभिक शिक्षा और लालन-पालन अपनी माता के द्वारा ही पूरा हुआ था। जब उनकी प्रारंभिक शिक्षा पूरी हुई तो उनकी माता ने अपने पुत्र को अपने पति महाराज शांतनु को सौंप दिया, क्योंकि पिता पुत्र का यह मिलन कई वर्षों के बाद हुआ था ऐसे में राजा शांतनु ने अपने पुत्र देवव्रत को युवराज घोषित कर दिया। 

बताया जाता है कि, देवव्रत के पिता महाराज शांतनु को शिकार का बहुत शौक था। एक दिन वह शिकार खेलते-खेलते गंगा तट के पार चले गए। जब महाराज शांतनु वहां से लौट रहे थे तब रास्ते में उनकी मुलाकात हरिदास केवट की पुत्री मत्स्यगंधा (सत्यवती) से हुई। राजा शांतनु मत्स्यगंधा के स्वरूप को देख कर उस पर मोहित हो गए। जिसके चलते वे उसके पिता हरिदास केवट के समक्ष विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुंच गए। 

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मत्स्यगंधा के पिता ने शादी के लिए एक शर्त पूरा करने की बात करते हैं। उन्होंने शांतनु से कहा कि, हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी आपके ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत की जगह मत्स्यगंधा की होने वाली संतान बनेगा। अगर आपको यह शर्त स्वीकार है तो मैं इस विवाह के लिए राजी हो जाऊंगा। राजा शांतनु हरिदास केवट के इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं और वापस लौट आते हैं। 

हालांकि वह कुछ भी करके मत्स्यगंधा को भूल नहीं पाते हैं और दिन-रात उसकी याद में व्याकुल रहने लगे। एक दिन देवव्रत ने अपने पिता को व्याकुल देखकर उनसे उसकी वजह पूछी तो राजा शांतनु ने अपने बेटे को सारी बात कह सुनाई। इसके बाद देवव्रत खुद केवट हरिदास के पास पहुंचे और गंगाजल हाथ में लेकर उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा उन्हें दे दी। कहा जाता है कि, देवव्रत कि इसी कड़ी प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम भीष्म पड़ा। जब इस बात की भनक राजा शांतनु को मिली तो वे बेहद प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने पुत्र को इच्छा मृत्यु का वरदान दे दिया। इसके बाद महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर जब सूर्य देव दक्षिणायन से उत्तरायण हुए तब शैया पर लेटे हुए 18 दिनों के बाद अपने शरीर का त्याग किया। और यही वजह है कि माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को उनका निर्वाण दिवस मनाया जाता है।

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