कुंडली के वो पांच शुभ योग जो आपको बना सकते हैं धनवान

वैदिक ज्योतिष के अनुसार मनुष्य समेत दुनिया भर के जीव-जंतुओं का जीवन प्रत्यक्ष या फिर अप्रत्यक्ष रूप से ग्रहों की स्थिति व चाल से प्रभावित होता है। किसी जातक की कुंडली में यदि ग्रहों की स्थिति शुभ यानी कि सकारात्मक फल देने वाली हो तो उस जातक को कम मेहनत में भी अच्छी-ख़ासी सफलता हासिल होती है। वहीं यदि किसी जातक की कुंडली में ग्रहों की स्थिति नकारात्मक फल देने वाली हो तो ऐसे जातकों को थोड़ी सी भी सफलता प्राप्त करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है और यदि स्थिति बहुत ही बदतर हुई तो मेहनत का फल तक प्राप्त नहीं होता है। 

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आपको बताते चलें कि किसी भी जातक की कुंडली में कुल बारह भाव होते हैं जो उसके जीवन के अलग-अलग क्षेत्र के लिए जिम्मेदार होते हैं। प्रत्येक ग्रह जब भी गोचर करते हैं तो राशि के साथ-साथ इन भावों में भी गोचर करते हैं और अपनी स्थिति के हिसाब से जातकों को फल प्रदान करते हैं। ऐसे में विशेष परिस्थिति में ये ग्रह गोचर करते हुए दूसरे ग्रहों के साथ युति करते हैं और विभिन्न योग बनाते हैं। ग्रहों के प्रभाव की तरह ही इनके युति व योग के प्रभाव भी सकारात्मक या नकारात्मक होते हैं।

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ऐसे में आज हम आपको इस विशेष लेख में उन पांच योगों के बारे में बताने वाले हैं जो यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बने तो उसका जीवन रातों-रात बदल सकता है।

पर्वत योग

कैसे बनता है पर्वत योग? 

पर्वत योग एक बहुत ही शुभ योग है। इस योग को किसी भी जातक की कुंडली में तीन तरीकों से पहचाना जा सकता है। आइये सबसे पहले उन तरीकों को जान लेते हैं।

  • यदि किसी जातक की कुंडली में उसके प्रथम भाव का स्वामी यानी कि लग्नेश अपनी उच्च राशि में या फिर खुद की राशि में स्थित हो और साथ ही साथ केंद्र के भावों (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव केंद्र के भाव होते हैं) या त्रिकोण भावों (पंचम और नवम भाव त्रिकोण भाव माने जाते हैं) में स्थित हो तब पर्वत योग का निर्माण होता है।
  • यदि किसी जातक की कुंडली के छठे भाव और आठवें भाव में कोई भी ग्रह स्थित न हो और अगर हो भी तो केवल शुभ ग्रह ही इन दो भावों में हों। इसके साथ ही केंद्र के भावों में सारे शुभ ग्रह स्थित हों तो जातकों की कुंडली में पर्वत योग का निर्माण होता है।
  • यदि किसी जातक की कुंडली के प्रथम भाव का स्वामी यानी कि लग्नेश और द्वादश भाव का स्वामी यानी कि द्वादशेश एक-दूसरे से केंद्र में स्थित हों तो भी पर्वत योग का निर्माण होता है।

पर्वत योग का जीवन पर प्रभाव

किसी भी जातक की कुंडली में यदि पर्वत योग का निर्माण होता है तो ऐसे जातक को काफी भाग्यशाली माना जाता है। ऐसे जातकों का रुझान राजनीति की तरफ ज्यादा रहता है इसलिए ऐसे जातक कभी न कभी राजनीति को अपने करियर के तौर पर चुनते हैं और उसमें सफलता भी प्राप्त करते हैं। राजनीति में उच्च पद जैसे कि मुख्यमंत्री आदि का पद पर्वत योग की वजह से ही प्राप्त होता है। ऐसे जातक अच्छे वक्ता या लेखक भी माने जाते हैं। जिस भी जातक की कुंडली में पर्वत योग का निर्माण होता है, वे अधिकारों से परिपूर्ण, आर्थिक तौर पर सम्पन्न, समाज में यश व समान और एक खुशहाल पारिवारिक जीवन प्राप्त करते हैं। 

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पारिजात योग

कैसे बनता है पारिजात योग?

किसी जातक के प्रथम भाव का स्वामी यानी कि लग्नेश जिस भी भाव में स्थित हो उस भाव का स्वामी ग्रह या फिर उस राशि के नवम भाव का स्वामी यदि केंद्र के भाव (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव) या फिर त्रिकोण भाव (पंचम और नवम भाव) में स्थित हो तो पारिजात योग का निर्माण होता है।

पारिजात योग का जीवन पर प्रभाव

वैदिक ज्योतिष में पारिजात योग को एक बेहद ही शुभ योग माना जाता है। जिस भी जातक की कुंडली में पारिजात योग का निर्माण होता है, ऐसे जातक जीवन में नित नई ऊंचाइयों को छूते हैं। हालांकि ऐसे जातकों को जीवन में सफलता देर से मिलती है यानी कि ऐसे जातक अपना आधा जीवन व्यतीत करने के बाद यश, सम्मान व धन अर्जित करते हैं और सुखद जीवन व्यतीत करते हैं। पारिजात योग के साथ जन्म लेने वाले जातक स्वभाव से दयालु होते हैं और उनका झुकाव धर्म-कर्म की तरफ ज्यादा रहता है। साथ ही वे राजसी पशु जैसे कि हाथी, घोड़े, ऊँट आदि पालने के शौकीन होते हैं। इन्हें समाज में विशेष सम्मान प्राप्त होता है और इन जातकों से उच्च अधिकारी भी सम्मान पूर्वक पेश आते हैं। 

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धन योग

कैसे बनता है धन योग?

किसी भी जातक की कुंडली में ग्रहों की विभिन्न स्थितियाँ धन योग का निर्माण करती हैं।

  • यदि किसी जातक की कुंडली में प्रथम भाव का स्वामी यानी कि लग्नेश का द्वितीय भाव यानी कि धन भाव के स्वामी के साथ किसी भी तरह का संबंध स्थापित हो रहा है तो यह स्थिति धन योग का निर्माण करती है।
  • यदि किसी जातक की कुंडली के द्वितीय भाव यानी कि धन भाव का स्वामी अष्टम भाव यानी कि आयु व मृत्यु के भाव में स्थित हो तब इस स्थिति में भी धन योग का निर्माण होता है। हालांकि ऐसी स्थिति में जातक को कठिन परिश्रम से धन प्राप्त होता है।
  • यदि किसी जातक की कुंडली के प्रथम भाव का स्वामी यानी कि लग्नेश उसके दशम भाव यानी कि करियर व कर्म भाव में स्थित हो तब धन योग का निर्माण होता है। ऐसी स्थिति में धन योग का निर्माण होने पर जातक अपने जीवन में अपने माता-पिता से अधिक संपत्ति अर्जित करने में सफल होते हैं।
  • बुध ग्रह वाणिज्य व व्यवसाय का भी कारक ग्रह माना जाता है। ऐसे में यदि बुध किसी भी जातक की कुंडली में कर्क या फिर मेष राशि में स्थित हो तो धन योग का निर्माण होता है। ऐसे जातक अपने जीवन में काफी धनवान होते हैं।
  • यदि किसी जातक की कुंडली के केंद्र भाव यानी कि प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव में ग्रह स्थित हों तब धन योग का निर्माण होता है। ऐसे जातक अपने जीवन में काफी धन अर्जित करने में सफल रहते हैं और एक सुखी जीवन जीते हैं।
  • किसी जातक की कुंडली में यदि व्यवसाय के कारक ग्रह बुध, आध्यात्मिक झुकाव के कारक ग्रह बृहस्पति और भोग-विलास के कारक ग्रह शुक्र किसी भी भाव में युति करते हैं तो ऐसे जातकों को धार्मिक क्रियाकलापों से धन प्राप्त होता है।
  • कुंडली के पंचम भाव यानी कि संतान व शिक्षा के भाव का स्वामी यदि किसी जातक के दशम भाव यानी कि करियर व कर्म भाव में स्थित हो तो ऐसे जातक को अपनी संतान से धन प्राप्त होता है।
  • यदि किसी जातक की कुंडली के सप्तम भाव यानी कि कलत्र भाव में शनि, मंगल और राहु युति करते हैं तब भी धन योग का निर्माण होता है। ऐसे जातकों को कमीशन के माध्यम से धन प्राप्त होता है।
  • यदि किसी जातक की कुंडली में प्रथम भाव के स्वामी व पंचम भाव के स्वामी युति करें या फिर उनके बीच किसी प्रकार का संबंध स्थापित हो तब भी धन योग का निर्माण होता है। इसके अलावा द्वितीय व पंचम भाव के स्वामी और प्रथम व नवम भाव के स्वामी के बीच भी यदि युति हो या फिर कोई संबंध स्थापित हो तो धन योग का निर्माण होता है। ऐसे जातक भी अपने जीवन में काफी धनवान होते हैं।
  • यदि किसी जातक की कुंडली में द्वितीय, नवम, दशम या एकादश भाव में चंद्रमा और मंगल युति करते हैं तो भी धन योग का निर्माण होता है। हालांकि इस युति के दौरान इन भावों पर किसी भी पाप ग्रह की दृष्टि नहीं पड़नी चाहिए।

धन योग का जीवन पर प्रभाव

धन योग का सीधा संबंध जातकों के आर्थिक जीवन से है। ऐसे में यदि किसी जातक की कुंडली में धन योग का निर्माण होता है तो उस जातक को आर्थिक लाभ होने की प्रबल संभावना रहती है। साथ ही ऐसे जातकों का सामाजिक जीवन भी सुखद रहता है और समाज के सभी वर्ग के लोग उनका सम्मान करते हैं। पारिवारिक जीवन में भी समस्याएं न के बराबर रहती है। इसके अलावा ऐसे जातकों कर्ज़ व उधार लेने जैसी आर्थिक समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है।

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महालक्ष्मी योग

कैसे बनता है महालक्ष्मी योग?

यदि किसी जातक की कुंडली में चंद्रमा और मंगल एक ही भाव में विराजमान होकर युति करते हैं तब महालक्ष्मी योग का निर्माण होता है। साथ ही द्वितीय भाव यानी कि धन भाव का स्वामी एकादश भाव यानी कि लाभ भाव में विराजमान हो और इसके साथ-साथ किसी शुभ ग्रह की दृष्टि जातक के द्वितीय भाव यानी कि धन भाव पर पड़ रही हो तब भी महालक्ष्मी योग का निर्माण होता है।

महालक्ष्मी योग का जीवन पर प्रभाव

महालक्ष्मी योग को वैदिक ज्योतिष में एक बेहद ही शुभ योग माना गया है। महालक्ष्मी योग के निर्माण से जातकों के जीवन में चमत्कारिक बदलाव आते हैं। ऐसे जातक आर्थिक तौर पर सम्पन्न होते हैं। नौकरीपेशा जातकों के लिए यह योग करियर को प्रगति देने का कार्य करता है। वहीं व्यापारी जातकों की कुंडली में इस योग का निर्माण होने से उन्हें व्यापार में दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की मिलती है। यह योग जातकों के जीवन को सम्पन्न, समृद्ध और भोग-विलास से युक्त बनाता है।

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अमला योग

कैसे बनता है अमला योग?

यदि किसी जातक की कुंडली में चंद्रमा के स्थान से दसवें स्थान पर कोई शुभ ग्रह जैसे कि शुक्र, बुध या बृहस्पति विराजमान हो और साथ ही साथ उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि भी पड़े तब अमला योग का निर्माण होता है।

अमला योग का जीवन पर प्रभाव

जिन जातकों की कुंडली में अमला योग का निर्माण होता है, ऐसे जातकों को जीवन में धन की कमी नहीं होती है। ये जातक प्रखर वक्ता और काफी परोपकारी होते हैं। धर्म-कर्म में उनका विश्वास रहता है और ये अपने किए गए कार्यों की वजह से समाज में सम्मान अर्जित करने में सफल रहते हैं। ऐसे जातकों का जीवन हर प्रकार की सुख-सुविधा से परिपूर्ण होता है और ये अपने जीवन में नित नई ऊंचाइयों को छूने में सफल रहते हैं। ऐसे जातकों को अपने भाइयों का सहयोग प्राप्त होता है और उनसे रिश्ते भी काफी मधुर रहते हैं।

नोट : ऊपर बताए गए पांच योगों का पूर्ण फल किसी भी जातक को तब प्राप्त होता है जब आपके जीवन से इन ग्रहों से संबंधित बने योग व युतियाँ की ग्रह दशा-अंतर्दशा गुजरती हैं।

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