सभी एकादशियों में जया एकादशी का होता है विशेष महत्व, जानें पूजन विधि

जया एकादशी का पूजन-व्रत करने से इंसान भूत, प्रेत, पिशाच, जैसी बलाओं से मुक्त हो जाता है।

वैदिक पंचांग के अनुसार जया एकादशी का पर्व हर साल माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को होती है। खुद भगवान श्री कृष्ण ने माघ शुक्ल पक्ष के महीने में पड़ने वाली जया एकादशी का महत्व बताते हुए इसे बहुत ही पुण्यदायी बताया है। कहा जाता है कि जया एकादशी का पूजन-व्रत करने से इंसान भूत, प्रेत, पिशाच, जैसी बलाओं से मुक्त हो जाता है। इसके अलावा जो कोई भी व्यक्ति श्रद्धाभाव से जया एकादशी का व्रत रखता है वो ब्रह्म हत्या जैसे महापाप से भी मुक्ति पा लेता है। इस व्रत को करने वाले व्यक्ति पर भगवान विष्णु सदैव अपनी कृपा बनाये रखते हैं।

कब है जया एकादशी?

हिन्‍दू पंचांग के अनुसार जया एकादशी हर साल माघ के महीने के शुक्‍ल पक्ष को मनाई जाती है और ग्रगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह हर साल जनवरी या फरवरी महीने में पड़ती है। इस साल जया एकादशी 5 फरवरी 2020, बुधवार को पड़ रही है।

जया एकादशी का व्रत मुहूर्त?

जया एकादशी तिथि 4 फरवरी 2020 को रात 9 बजकर 49 मिनट से शुरू होगी।

और एकादशी तिथि 5 फरवरी 2020 को रात 9 बजकर 30 मिनट पर समाप्‍त होगी।

एकादशी पारण का समय, 6 फरवरी 2020 को सुबह 7 बजकर 7 मिनट से 9 बजकर 18 मिनट।

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जया एकादशी व्रत की पौराणिक कथा

पद्म पुराण में जया एकादशी कथा का जो वर्णन है उसके अनुसार, देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और बाकी सभी देवगण सुखी-सुखी स्वर्ग में रहा करते थे। एक बार की बात है जब देवता इंद्र नंदन वन में अप्सराओं के साथ गन्धर्व गान कर रहे थे। इन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत उनकी बेटी पुष्पवती, चित्रसेन और साथ में उनकी पत्नी मालिनी भी मौजूद थे। इस गंधर्व में मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी मौजूद थे। यहीं पर पुष्पवती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और उसे अपने वश में करने का जतन करने लगी। आखिरकार उसने अपने रूप से माल्यवान को अपने वश में कर ही लिया।  इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए वो गान तो कर रहे थे लेकिन एक दूसरे से मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो चुका था।

उन दोनों को आपस में खोया देख कर इंद्र ने इसे अपना अपमान समझा और दोनों को श्राप देते हुए कहा कि, “हे मूर्खों ! तुम दोनों ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए मैं तुम्हे श्राप देता हूँ। अब तुम दोनों मृत्यु लोक में जाकर पिशाच के रूप में अपने कर्म का फल भोगो.”

इंद्र के शाप के बाद वो दोनों हिमालय पर्वत पर जाकर दुःखपूर्वक अपना जीवन बिताने लग गए। वहाँ ठण्ड इतनी थी कि उनके रोंगटे खड़े हो चुके थे जिससे उन्हें वहाँ नींद भी नहीं आती थी। तब उन दोनों ने आपस में बात की कि ना जाने पूर्व जन्म के किस पाप के चलते उन्हें ये दुःख झेलना पड़ रहा है। ये सब सोचकर दुखी मन से दोनों अपना जीवन व्यतीत करने लग गए। तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया एकादशी का दिन आया। इस दिन उन दोनों ने ना ही भोजन किया और ना ही कोई गलत काम किया। पूरे दिन फल-फूल खाकर शाम के वक्त दोनों पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए। वो रात भी इतनी सर्द थी कि उन्हें नींद नहीं आयी। वो इसी तरह पूरी रात जागते रहे।

बताया जाता है कि जया एकादशी के उपवास और पूरी रात जगे रहने की वजह से अगले दिन की सुबह होते ही उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गयी। दोनों ने वापिस से अपना सुन्दर रूप धारण किया और स्वर्गलोक जा पहुंचे वहाँ इंद्र ने उन दोनों से पूछा कि, “तुमने अपनी पिशाच योनि से किस तरह छुटकारा पाया, ये सबको बतालाओ।” तब माल्यवान बोले, “हे देव! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है।”

तभी इस व्रत के बारे में खुद भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा था कि, “जिस किसी भी इंसान ने इस एकादशी व्रत को कर लिया उसने मानो सब यज्ञ, जप, दान आदि कर लिया।”

जया एकादशी पूजन विधि

  • जया एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्‍नान करें और फिर सच्चे मन से भगवान विष्‍णु का ध्‍यान करें और जिनसे हो सके वो व्रत का संकल्‍प भी लें।
  •  इसके बाद घर के मंदिर में एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उसपर भगवान विष्णु की प्रतिमा/तस्वीर स्थापित करें।
  • एक लोटे में गंगाजल लें और उसमें तिल, रोली और अक्षत सभी मिलाएं।
  • इसके बाद इस जल की कुछ बूंदें मंदिर में हर तरफ छिड़कें।
  • अब इसी लोटे से घट स्‍थापना करें।
  • इसके बाद भगवान विष्‍णु को धूप-दीप दिखाकर उन्‍हें सुगन्धित फूल चढ़ाएं।
  • घी के दीपक से भगवान विष्‍णु की आरती उतारें और विष्‍णु सहस्‍नाम का पाठ करें।
  • इस दिन भगवान विष्‍णु को तिल का भोग अवश्य लगाएं और उसमें तुलसी का प्रयोग अवश्‍य करें।
  • इस दिन तिल के दान का बड़ा महत्व बताया गया है। जितना हो सके अपनी इच्छानुसार तिल का दान करें।
  • इसके बाद शाम के समय भगवान विष्‍णु की पूजा करें और फिर फलाहार ग्रहण करें।  अगले दिन की सुबह किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं और उन्हें दान-दक्षिणा देकर विदा करें। इसके बाद स्‍वयं भी भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

जया एकादशी के दिन ज़रूर करें ये काम

  • एकादशी व्रत के दिन दान-पुण्य ज़रूर करना चाहिए।
  • अगर मुमकिन हो तो इस दिन गंगा स्नान अवश्य करें।
  • अगर घर में किसी का विवाह या खुद की शादी की बात चलानी हो तो एकादशी के दिन केसर, केला या हल्दी का दान ज़रूर करें।
  • एकादशी का व्रत करने से धन, मान-सम्मान, अच्छी सेहत, ज्ञान, संतान सुख, पारिवारिक सुख,और मनोवांछित फल मिलते हैं। इसके अलावा एकादशी का व्रत करने से हमारे पूर्वजों को स्वर्ग में जगह मिलती है।

जया एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम

कुछ ऐसे भी काम होते हैं जिन्हे जया एकादशी पर भूलकर भी नहीं करना चाहिए। क्या हैं वो काम इसकी पूरी सूची हम आपके लिए लेकर आये हैं।

  1. बरसों से ऐसी मान्यता चली आ रही है कि एकादशी के दिन चावल खाने वाला मनुष्य अपने अगले जन्म में रेंगने वाला जीव बनकर जन्म लेता है इसलिए इस दिन भूलकर भी चावल का सेवन न करें।
  2. एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना और उनके प्रति समर्पण के भाव को दर्शाता है। इसके साथ ही इस दिन के खान-पान से लेकर व्यवहार तक में सात्विकता और संयम का पालन करना आवश्यक माना गया है इसलिए इस दिन पति-पत्नी को ब्रह्राचार्य का पालन करना चाहिए और शारीरिक संबंध बनाने से बचना चाहिए।
  3. तिथियों में एकादशी की तिथि बेहद शुभ मानी गयी है इसलिए इस दिन किसी भी कठोर शब्द का प्रयोग करने से जितना हो सके बचना चाहिए और सभी का सम्मान करना चाहिए।
  4. एकादशी के दिन शाम को सोना भी नहीं चाहिए। इसके अलावा इस दिन जितना हो सके उतना क्रोध करने और झूठ बोलने से बचना चाहिए।