ललिता पंचमी विशेष : जानिए इस दिन की पूजन विधि, महत्व और कथा

हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन माह में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन ललिता पंचमी मनाई जाती है। इस साल यह त्यौहार 21 अक्टूबर, बुधवार को मनाया जाएगा। ललिता पंचमी के दिन शक्ति स्वरूपा ललिता देवी जो कि माता पार्वती का रूप हैं, उनकी पूजा की जाती है। शारदीय नवरात्रि का पांचवां दिन माता ललिता को समर्पित है। माता ललिता को त्रिपुर सुंदरी भी कहा जाता है। इस पर्व को उपांग ललिता पंचमी व्रत और ललिता जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भक्तगण व्रत रखकर माता की विधि-विधान से पूजा-पाठ करते हैं। यह पर्व गुजरात और महाराष्ट्र के साथ-साथ लगभग पूरे भारत में मनाया जाता है। तो चलिए जानते हैं इस दिन से जुड़ी और भी खास बातें –

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ललिता पंचमी व्रत का महत्व 

माता पार्वती को शक्तिस्वरूपा कहा जाता है, इसलिए शक्ति के स्वरूप में माता पार्वती की ललिता देवी के रूप में पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि यदि कोई जातक पूरी श्रद्धा से इस दिन माँ ललिता का व्रत रखे, तो उसे ललिता देवी की कृपा प्राप्त होती है और उनका आशीर्वाद मिलता है। जातक के जीवन में हमेशा सुख-शांति और समृद्धि भी बनी रहती है।

यहाँ तक कि त्रिपुर सुंदरी माता ललिता के दर्शन मात्र से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण अपने आप ही हो जाता है। ललिता पंचमी व्रत सभी प्रकार का सुख और शक्ति   प्रदान करने वाला माना गया है। पुराणों के अनुसार यह व्रत पुत्रवती स्त्रियों को अवश्य  करना चाहिए। माता ललिता के जन्म के विषय में यह कहा गया है कि कामदेव के शरीर की राख से उत्पन्न हुए राक्षस भांडा का संहार करने के लिए ही इनका जन्म हुआ था।

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माता ललिता की महिमा के कारण ललिता पंचमी के दिन सभी मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है। इस दिन कई जगहों पर मेलों का आयोजन होता है। हिन्दू धर्म के लाखों की संख्या में लोग इस पर्व को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं।

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ललिता पंचमी व्रत के दिन ऐसे करें पूजा 

ललिता पंचमी का व्रत रखने वाले जातकों को नीचे बताए गए नियम से ही माता ललिता की पूजा करनी चाहिए-

  • ललिता पंचमी के दिन सबसे पहले स्नान कर लें।  
  • उसके बाद किसी भी बांस की टोकरी या बर्तन में नदी किनारे से बालू या रेत घर ले आए। इस बालू को देवी ललिता का रूप देकर स्थापित करें। यदि मूर्ति बनाना संभव ना हो, तो आप माता की कोई तस्वीर भी स्थापित कर सकते हैं।  
  • अब पूरे विधि-विधान से माता ललिता की पूजा करें। 
  • पूजा के बाद फूल और चावल हाथ में लेकर नीचे बताए गए मंत्र का जाप करते हुए 28 बार पुष्पांजलि अर्पित करें –

मंत्र –

ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनी।

या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः॥

  • इस दिन घर पर हवन करें और उसके बाद 15 ब्राह्मणों और 15 कन्याओं को भोजन कराएं।
  • ललिता पंचमी के दिन ललिता सहस्त्रनाम और ललिता त्रिशती का पाठ अवश्य करना चाहिए।
  • व्रत रखने वाले लोग दिन में उपवास रखें और रात में जागरण करें। 
  • अगले दिन माता की प्रतिमा या चित्र का विसर्जन कर दें।

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ज़रूर सुने मां ललिता देवी की यह कथा

ललिता पंचमी के दिन माँ ललिता की पूजा की जाती है। आज के दिन व्रती को माँ ललिता देवी की यह कथा ज़रूर सुननी चाहिए। एक बार राजा दक्ष प्रजापति के आगमन पर सभी लोग उनके स्वागत के लिए खड़े हुए, लेकिन भगवान शिव अपने स्थान से नहीं उठे। राजा दक्ष को अपनी पुत्री सती के पति शिव जी की यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने इसे अपना अपमान समझ लिया। दक्ष ने एक बार अपने निवास पर एक यज्ञ का आयोजन किया, उन्होंने सभी देवी-देवताओं को उस यज्ञ का निमंत्रण दिया, लेकिन अपने अपमान का बदला लेने के लिए राजा ने शिव जी को वहां आमंत्रित नहीं किया। 

जब यह बात माता सती को मालूम हुई, तो वह बिना किसी अनुमति के ही अपने पिता के घर आयोजन में चली गई। यज्ञ में राजा दक्ष ने शिव जी के बारे में बहुत भला-बुरा कहा। वहां मौजूद सती ने जब अपने पिता के द्वारा शिव जी को कही गयी कठोर बातें सुनी, तो वह भरे यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई और यज्ञ वेदी मे कूदकर अपने प्राण त्याग दिए।

सती के प्राण त्यागने की बात जब शिव जी को चली, तो वह फ़ौरन वहां पहुंचे। वहां पहुँचकर उन्होंने माता सती के शव को अपने कंधे पर रखा और क्रोध में विलाप करते हुए इधर से उधर जाने लगे। भगवान विष्णु ने शिव जी की जब यह दशा देखी तो उन्होंने अपना चक्र चलाकर उससे सती की देह को विभाजित कर दिया। भगवान शंकर को हृदय में धारण करने के चलते इन्हें ललिता कहा जाने लगा।

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