जानें दत्तात्रेय जयंती का महत्व, इन मंत्रों का जाप करने से मिलता है वरदान

भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव के संयुक्त स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय के अंदर गुरु और ईश्वर दोनों का स्वरूप होता है। इनके तीन मुख और छह हाथ होते हैं। दत्तात्रेय भगवान के साथ कुत्ते और गाय भी दिखाई देते हैं। 

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भगवान दत्तात्रेय ने अपने 24 गुरु माने हैं, जिसमें प्रकृति पशु, पक्षी और मानव भी शामिल हैं। भगवान दत्तात्रेय के बारे में ऐसी मान्यता है कि, इनकी पूजा करने से तुरंत फल की प्राप्ति होती है और इससे कष्टों का निवारण भी होता है। हर साल भगवान दत्तात्रेय की जयंती मनाई जाने का विधान है। इस वर्ष दत्तात्रेय जयंती 29 दिसंबर को मनाई जा रही है।

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दत्तात्रेय जयंती शुभ मुहूर्त 

दत्तात्रेय जयन्ती मंगलवार, दिसम्बर 29, 2020 को

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – दिसम्बर 29, 2020 को 07:54 ए एम बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त – दिसम्बर 30, 2020 को 08:57 ए एम बजे

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कैसे करें दत्तात्रेय जयंती पर भगवान दत्तात्रेय की पूजा? जानें संपूर्ण विधि 

मान्यता के अनुसार दत्तात्रेय जयंती के दिन ही प्रदोष काल में भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ था। आइए जानते हैं इस दिन किस विधि से पूजा करने से आपको भी भगवान शिव और विष्णु का आशीर्वाद मिल सकता है। 

  • दत्तात्रेय जयंती के दिन सुबह घर की साफ सफाई करें और इसके बाद घर के मंदिर या फिर किसी भी पवित्र जगह पर भगवान दत्तात्रेय की प्रतिमा या कोई मूर्ति स्थापित करें। 
  • इसके बाद भगवान दत्तात्रेय की मूर्ति के समक्ष पीले फूल और पीले रंग की चीजें अर्पित करें। 
  • भगवान दत्तात्रेय को पीले फूल अति प्रिय है ऐसे में उन्हें इस दिन पीले फूल ज़रुर चढ़ाएं। 
  • इसके बाद इन 2 मंत्रों का जाप करें, ‘ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा’ दूसरा मंत्र ‘ॐ महानाथाय नमः’। कहा जाता है इस दिन पूजा में इन दोनों मंत्रों का जाप करने से भगवान इंसान की सभी मनोकामनाएं अवश्य पूरी करते हैं। 
  • इसके अलावा इस दिन हो सके तो एक बेला या एक पहर तक उपवास अवश्य रखें।

आगे जानें कि आखिर बाल रूप में ही क्यों की जाती है भगवान दत्तात्रेय की पूजा?

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दत्तात्रेय भगवान का स्वरुप और दत्तात्रेय जयंती का महत्व 

दत्तात्रेय जयंती हर साल मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है। दत्तात्रेय भगवान के 3 सिर और 6 भुजाएं हैं। इनके अंदर भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, और भगवान महेश तीनों का अंश मौजूद होता है। दत्तात्रेय भगवान के बाल रूप की पूजा की जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार बताया जाता है कि, एक बार पार्वती देवी, लक्ष्मी जी तथा सावित्रि जी, तीनों ही देवियों को अपने पति व्रत धर्म पर घमंड होने लगता है। तब नारदजी इन का घमंड चूर करने के लिए बारी-बारी से तीनों देवियों की परीक्षा लेते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप दत्तात्रेय जी का प्रादुर्भाव होता है। 

मान्यताओं के अनुसार जो कोई भी व्यक्ति दत्तात्रेय जयंती के दिन व्रत रखता है और भगवान की पूजा-अर्चना करता है उनकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती है, क्योंकि भगवान दत्तात्रेय, भगवान ब्रह्मा, विष्णु, और शिव तीनों का स्वरूप है इसलिए इनकी पूजा करने से त्रिदेव की प्रसन्नता हासिल की जा सकती।

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भगवान दत्तात्रेय की पूजा से क्या वरदान मिलता है? 

  • अगर कोई इंसान गलत संगति या गलत रास्ते पर चल रहा है तो भगवान दत्तात्रेय की पूजा करने से ऐसा करने से उसे बचाया जा सकता है। 
  • इसके अलावा संतान प्राप्ति और ज्ञान प्राप्ति के लिए भी दत्तात्रेय भगवान की पूजा को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 
  • दत्तात्रेय भगवान की पूजा से इंसान के ऊपर किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का असर नहीं होता है। 
  • इसके अलावा इंसान को उसके जीवन में एक मार्गदर्शक मिलता है। 
  • भगवान दत्तात्रेय की पूजा से इंसान के समस्त पाप खत्म हो जाते हैं।

भगवान दत्तात्रेय की जन्म कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार बताया जाता है कि एक बार तीनों देवियों को अपने पतिव्रता धर्म पर अभिमान हो गया था। इस बात की भनक जब नारद जी को लगी तो उन्होंने तीनों के भ्रम को तोड़ने की एक लीला रची। नारद जी ने तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए देवी सरस्वती, मां लक्ष्मी, और पार्वती जी के समक्ष अनुसूया के पतिव्रता धर्म की प्रशंसा कर दी। 

इस पर तीनों देवियों ने अपने पतियों से अनुसूया के पति धर्म की परीक्षा लेने का लेने की ज़िद शुरू कर दी। ऐसा करने के लिए अब त्रिदेव ब्राह्मण के वेष में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे। उस वक्त महर्षि अत्रि घर पर नहीं थे। तीनों ब्राह्मणों को देखकर अनुसूया उनके पास पहुंची। 

अनुसूया ने तीनों ब्राह्मणों का आदर सत्कार किया लेकिन तभी उन ब्राह्मणों ने अनुसूया से कहा कि जब तक वह उनको अपनी गोद में बैठकर भोजन नहीं कराएगी तब तक वो उनके आतिथ्य को स्वीकार नहीं करेंगे। ब्राह्मणों की ऐसी शर्त से अनुसूया चिंतित हो गयीं लेकिन अपने तपोबल से उन्होंने ब्राह्मणों की सत्यता जान ली थी। 

भगवान विष्णु और अपने पति को ध्यान करने के बाद उन्होंने मन में ही कहा कि अगर उनका पतिव्रता धर्म सही है तो यह तीनों ब्राह्मण 6 माह के शिशु बन जायें। इसके बाद त्रिदेव को अनुसूया के तपोबल ने छह माह का शिशु बना दिया। शिशु बनते ही तीनों रोने लगे तब अनुसूया ने उन्हें अपनी गोद में लेकर दुग्धपान कराया और उन तीनों को पालने में रख दिया। उधर तीनों देवियां अपने पतियों के वापस ना आने से चिंतित हो उठी। तब नारद जी ने जाकर उन्हें सारा घटनाक्रम विस्तार पूर्वक बताया। इसके बाद तीनों देवियों को अपने किए पर बेहद ही पश्चाताप हुआ और उन्होंने देवी अनुसूया से माफी मांगी और अपने पतियों को मूल स्वरूप में लाने का निवेदन किया। 

इसके पश्चात् त्रिदेव ने उनसे वर मांगने को कहा, तब अनसूया ने उन तीन देवों को पुत्र स्वरूप में पाने का वर मांगा। त्रिदेव उनको वरदान देकर अपने धाम चले गए। बाद में माता अनसूया के गर्भ से भगवान विष्णु दत्तात्रेय, भगवान शिव दुर्वासा और ब्रह्मा चंद्रमा के रूप में जन्म लिए। माना जाता है इसी वजह से भगवान दत्तात्रेय को उनके बाल रूप में पूजा पूजा जाने का विधान शुरू हुआ है।

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