चंपा षष्ठी: इस दिन भोलेनाथ की पूजा कर क्यों चढ़ाया जाता है बैंगन व बाजरा?

मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को चंपा षष्ठी का त्यौहार मनाया जाता है। यह त्यौहार मुख्य रूप से भगवान शिव के अवतार खंडोबा या खंडेराव को समर्पित किया गया है। जानकारी के लिए बता दें खंडोबा को किसानों, चरवाहों, और शिकारियों इत्यादि का मुख्य देवता माना जाता है। 

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चंपा षष्ठी का पर्व कर्नाटक और महाराष्ट्र में प्रमुख तौर पर मनाया जाता है। इस व्रत के बारे में ऐसी मान्यता है कि जो कोई भी इंसान इस व्रत को करता है उसके जीवन में हमेशा ख़ुशियाँ बनी रहती है साथ ही उस इंसान के पिछले जन्म के भी सारे पाप धुल जाते हैं और आगे का जीवन सुखमय हो जाता है।

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जानें चंपा षष्ठी 2020 कि तिथि और शुभ मुहूर्त 

चंपा षष्ठी पूजा रविवार 20 दिसंबर 2020,

चंपा षष्ठी पूजा समय 

षष्ठी तिथि शुरू : 14:15  – 19 दिसंबर 2020

षष्ठी तिथि ख़त्म : 14:50  – 20 दिसंबर 2020

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चंपा षष्ठी पूजन विधि 

  • चंपा षष्ठी या बैंगन छठ के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और फिर शिव मंदिर में जाए। 
  • इस दिन मंदिर में शिवलिंग पर दूध, फूल, बेल पत्र, इत्यादि चढ़ाने के बाद भगवान भोलेनाथ का ध्यान करें और शिव चालीसा का पाठ करें। 
  • शाम के समय शिव मंदिर में जाकर तिल के तेल के नौ दीपक जलाएं। 
  • इस दिन भगवान भोलेनाथ को बैंगन और बाजरा अर्पित करें और भोग लगाकर इन्हें ग़रीबों में बांट दें। 
  • इसके अलावा इस दिन ‘ॐ श्रीं अर्धनारीश्वराय प्रेमतत्त्वमूर्तये नमः शिवाय नमः’  मंत्र का 108 बार जाप करें।

चंपा षष्ठी पूजन महत्व 

चंपा षष्ठी के दिन भगवान शिव की पूजा किये जाने का विधान बताया गया है। साथ ही इस दिन की पूजा करते समय शिवलिंग पर बैंगन और बाजरा चढ़ाया जाता है। हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बताया गया है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा और व्रत करने से भक्तों के सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और इंसान को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन जो कोई भी इंसान सच्चे मन से भगवान भोलेनाथ का ध्यान और पूजा करता है उनके सभी बिगड़े काम बन जाते हैं और उनकी जीवन में ख़ुशियाँ आती है। 

चंपा षष्ठी से जुड़ी मान्यता 

चंपा षष्ठी का यह त्यौहार भगवान शिव के अवतार खंडोबा या खंडेराव को समर्पित किया गया है। इस त्यौहार के बारे में सबसे प्रमुख मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि चंपा छठ का व्रत जो कोई भी इंसान करता है उसके जीवन में हमेशा ख़ुशियाँ बनी रहती हैं साथ ही उस इंसान के इस जन्म के और पिछले सभी जन्म के पाप धुल जाते हैं और उनके आगे का जीवन सुखमय हो जाता है।

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चंपा षष्ठी व्रत कथा 

चंपा छठ व्रत के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से एक कथा के अनुसार बताया जाता है कि एक समय की बात है जब दो राक्षस भाई हुआ करते थे, मल्ला और मानी। दोनों राक्षस भाइयों ने धरती वासियों, संत, देवताओं, इत्यादि को परेशान कर दिया था। राक्षसों के आतंक से परेशान होकर सभी देवता भगवान विष्णु से मदद मांगने पहुंचे, लेकिन भगवान विष्णु ने उनकी मदद करने से इंकार कर दिया। तब सभी देवता ब्रह्मा जी के पास मदद मांगने पहुंचे, लेकिन ब्रह्मा जी ने भी उन सभी की मदद करने से मना कर दिया। 

अंत में सभी देवता भगवान शिव से मदद मांगने पहुंचे और उन दोनों राक्षसों की पूरी कहानी भगवान शिव से कह सुनाई। मानी और मल्ला को मारने के लिए भगवान शिव ने एक बदबूदार भयानक योद्धा खंडोबा का रूप धारण किया। यह योद्धा सोने और सूरज की तरह चमकदार प्रतीत हो रहा था। इसके अलावा इस योद्धा ने अपना पूरा चेहरा हल्दी से ढका हुआ था। इसके बाद भगवान शिव दोनों राक्षसों से युद्ध करने पहुंचे। जब मानी मरने वाला था तब उसने अपना सफेद घोड़ा खंडोबा को दे दिया और उस से माफी मांगी, और खंडोबा से वर भी मांगा कि जहां भी भगवान शिव की पूजा होती है वहां उसकी भी मूर्ति होगी। 

भगवान शिव ने मानी के इस वर को मान लिया। ऐसे में अब मानी एक देवता के रूप में भगवान शिव के साथ हर मंदिर में पूजा जाता है। इसके बाद दूसरा राक्षस मल्ला भी माफी मांगते हुए वर मांगने लगा। मल्ला ने कहा कि उसे दुनिया का पूरी तरह से विनाश का वरदान चाहिए। यह सुनकर भगवान शिव ने उसे श्राप दिया और उसकी गर्दन काटकर कहा कि अब से जो भी खंडोबा के मंदिर में आएगा उन भक्तों के पैरों से मल्ला का सिर कुचला जाएगा।

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चंपा षष्ठी के दिन अवश्य करें ये उपाय 

महाराष्ट्र में चंपा षष्ठी के दिन मणि मल्ह के स्वरूप को बैंगन के भरते और बाजरे की रोटी का भोग लगाया जाता है। इस दिन अगर कोई भी इंसान इन दोनों चीज को बनाकर पहले शिव भगवान को इसका भोग लगाता है और फिर उसे ग़रीबों में बांट देता है उसे शुभ फल की प्राप्ति होती है। 

इसके अलावा अगर आपके बच्चों को किसी भी काम में बाधा आ रही है तो आज के दिन का व्रत का नाम बेहद ही शुभकारी बताया गया है। चंपा षष्ठी का व्रत करने से आपके बच्चों के जीवन में आ रही किसी भी प्रकार की समस्या अवश्य दूर हो जाती है। 

इसके अलावा इस दिन पारद शिवलिंग पर अभिषेक करने से इसका तुरंत लाभ मिलता है। ऐसी मान्यता है कि रुद्राभिषेक का फल वैसे भी बेहद ही जल्दी प्राप्त होता है। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, चतुर्थी, पंचमी, अष्टमी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि, पंचमी, षष्ठी, नवमी, द्वादशी, त्रयोदशी तिथि में अभिषेक करने से इंसान के जीवन में सुख समृद्धि, संतान प्राप्ति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। 

इसके अलावा कुंडली में मौजूद कालसर्प योग, ग्रह कलेश, व्यापार में नुकसान, शिक्षा के क्षेत्र में आ रही रुकावटें इत्यादि बाधाओं को दूर करने के लिए भी इस दिन रुद्राभिषेक करने का बेहद महत्व बताया गया है।

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