वानप्रस्थ संस्कार

वानप्रस्थ संस्कार सभी 16 संस्कारों में से एक अहम संस्कार माना जाता है। भारतीय समाज में जब इंसान अपनी सांसारिक ज़िम्मेदारियों को पूरा कर लेता है तो इसके बाद वह वानप्रस्थ आश्रम की ओर बढ़ जाता है। वानप्रस्थ संस्कार कराने के पीछे की एक वजह यह भी है कि ढलती उम्र में मनुष्य अपने अनुभवों और ज्ञान को समाज में बांट सके। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वानप्रस्थ संस्कार के बाद इंसान समाज सेवी बन जाता है और अपने अनुभवों से समाज में फैली दुष्प्रवृतियों और कुरीतियों को मिटाने की कोशिश करता है। समाज सेवा के ही जरिये इंसान को आध्यात्मिक लाभ भी मिलता है।

वानप्रस्थ संस्कार का महत्व

वानप्रस्थ संस्कार समाज के विकास के लिए अति आवश्यक है। प्राचीन काल में समाज निर्माण और समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने का ज़िम्मा वानप्रस्थ और साधू सन्यासियों पर ही था। यही वजह है कि प्राचीन काल में धर्म, कर्तव्य, सदाचार और अध्यात्म के प्रति लोगों की रूचि अधिक थी। अपने जीवन काल में इंसान जो भी सीखता था उसे वानप्रस्थ संस्कार लेने के बाद युवा पीढ़ी को भी सिखाता था। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस समाज में जितने ज्यादा वानप्रस्थ होंगे वह समाज उतना ही सदाचारी और कर्तव्य परायण होगा।

कैसे किया जाता है वानप्रस्थ संस्कार

वानप्रस्थ संस्कार एक व्यक्ति का भी करवाया जा सकता है लेकिन ज्यादातर वानप्रस्थ संस्कार ग्रहण करने वाले व्यक्तियों की संख्या एक से अधिक होती है। अतः जितने व्यक्तियों का भी वानप्रस्थ संस्कार किया जाना है उनके लिए पर्याप्त आसान तैयार होने चाहिए। इस दौरान पूजा-अर्चना भी की जाती है इसलिए संस्कार करने के लिए आवश्यक पूजन सामग्री के साथ-साथ संस्कार में प्रयुक्त होने वाली विशेष वस्तुओं को भी पहले से ही संचय कर लेना चाहिए। इस संस्कार के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है उसका विवरण नीचे दिया गया है।

  • वानप्रस्थ संस्कार शुरू करने से पहले ही जिन लोगों का संस्कार किया जाना है उन्हें पीले वस्त्र धारण करने चाहिए।
  • जितने लोगों का संस्कार किया जाना है उनके लिए उतने ही यज्ञोपवीत, पंचगव्य पान कराने के लिए छोटे पात्र जैसे- छोटी कटोरियाँ, मेखला-कोपीन (कमर बंद सहित लंगोटी), पीले दुपट्टे और धर्म-दंड (हाथ में लेने योग्य गोल दंड) होने चाहिए।
  • एक पात्र में पंचगव्य पहले ही तैयार रखा हो।
  • पीले कपड़े में लपेटकर पहले से ही वेद पुस्तक या कोई पवित्र पुस्तक रखी हो।
  • ऋषि पूजन के लिए सात कुशाओं को एक साथ बांध कर पहले से रख लेना चाहिए।
  • कलावा लपेटा हुआ नारियल यज्ञपुरुष पूजन के लिए रखें।
  • पांच से लेकर पच्चीस स्वच्छ लौटे अभिषेक के लिए पहले से ही तैयार रखें। अभिषेक के लिए कन्याओं को या सम्माननीय साधकों को पहले से ही निश्चित कर लेना चाहिए।
  • पीले वस्त्र पहनकर वानप्रस्थ संस्कार के लिए आने वाले व्यक्तियों के प्रवेश पर और आसान ग्रहण करते वक्त मंगलाचरण के साथ और पुष्प, अक्षत वृष्टि की जाए।
  • संस्कार ग्रहण करने वाले व्यक्ति जब आसान ग्रहण कर लें तो उन्हें कम शब्दों में संस्कार का महत्व और उत्तर-दायित्वों के बारे में बताया जाना चाहिए।

विशेष कर्मकाण्ड

  • शुरुआत में षट्कर्म के प्रांत संकल्प करा दिया जाए। साथ ही तिलक और रक्षा-सूत्र बंधन करवा दिया जाए।
  • वक्त को ध्यान में रखते हुए पूजन आदि को समुचित विस्तार या संक्षेप में किया जाए।

रक्षा-विधान के बाद विशेष कर्मकांड कैसे किया जाता है इसके बारे में अब हम आपको बताते हैं।

  • संकल्प

 

जिन व्यक्तियों का वानप्रस्थ संस्कार किया जाना है वो हाथ में फूल, अक्षत और जल लेकर संकल्प करते हैं। संकल्प करते हुए यह सार्वजनिक घोषणा की जाती है कि आज से मैंने वानप्रस्थ व्रत ग्रहण कर लिया है। संस्कार पाने वाला व्यक्ति यह घोषणा करता है कि अब में अपना या अपने परिवार का नहीं बल्कि सारे समाज का बन गया। मेरे जीवन को सार्वजनिक सम्पत्ति समझा जाए और अब मैं आने जीवन को परिवार और अपने लाभ के लिए नहीं बल्कि समस्त समाज के लाभ के लिए उपयोग करूँगा।

क्रिया- संकल्प करने के लिए जल, अक्षत और पुष्प संस्कार ग्रहण करने वाले के हाथ में दिए जाएं।

भावना- संस्कार ग्रहण करने वाला धारण करे कि संसार और संस्कृति के मेरुदंड वानप्रस्थ जीवन का शुभारंभ करने के लिए प्रकृति में फैली सद्शक्तियाँ उसे सहयोग करें। इसके साथ नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण किया जाए।

मंत्र-  “ॐ तत्सदद्य श्रीमद् भवगतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवत्तर्मानस्य अद्य श्री ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे भूलोर्के जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आयार्वत्तैर्क – देशान्तगर्ते ……… क्षेत्रे……… मासानां मासोत्तमेमासे……… पक्षे……… तिथौ……… वासरे……… गोत्रोत्पन्नः……… नामाऽहं स्वजीवनं व्यक्तिगतं न मत्वा सम्पूर्ण- समाजस्य एतत् इति ज्ञात्वा, संयम-स्वाध्याय-उपासनेषु विशेषतश्च लोकसेवायां निरन्तरं मनसा वाचा कमर्णा च संलग्नो भविष्यामि इति संकल्पं अहं करिष्ये।”

  1. यज्ञोपवीत परिवर्तन

वानप्रस्थ संस्कार के द्वारा व्यक्ति नए जीवन की तरफ पहला कदम उठाता है। पहला कदम पवित्रता, त्याग और तेजस्विता के प्रतीक व्रत-बंधन यज्ञोपवीत की स्वछता और नवीनता के साथ किया जाता है। यज्ञोपवीत का सिंचन और पूजन करने के बाद और पांच देव शक्तियों के आवाहन के उपरांत पुराने यज्ञोपवीत को उतार कर नए को धारण कर लिया जाता है। इस दौरान भी मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।

  1. यज्ञोपवीत सिंचन

मंत्रों को उच्चारित करते हुए यज्ञोपवीत पर जल छिड़कें और नमस्कार करें इस दौरान नीचे दिए गए मंत्र का उच्चारण करें।

मंत्र- ॐ प्रजापतेयर्त्सहजं पवित्रं, कापार्ससूत्रोद्भवब्रह्मसूत्रम्॥

ब्रह्मत्वसिद्ध्यै च यशः प्रकाशं, जपस्य सिद्धिं कुरु ब्रह्मसूत्र॥”

  1. पंचदेवावाहन

यज्ञोपवीत में नीचे दिए गए मंत्रों को श्रद्धा के साथ उच्चारण करते हुए पंचदेवों का आवाहन करें।

  • ब्रह्मा– ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्, विसीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्याऽउपमाऽ अस्यविष्ठाः, सतश्चयोनिमसतश्च विवः॥ ॐ ब्रह्मणे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -१३.३
  • विष्णु – ॐ इदं विष्णुविर्चक्रमे, त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्य पा सुरे स्वाहा॥ ॐ विष्णवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -५.१५
  • शिव – ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽ, उतो तऽइषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः॥ ॐ रुद्राय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि। -१६.१
  • यज्ञपुरुष – यज्ञोपवीत को खोल दें। दोनों हाथों की कनिष्ठ और अँगूठे से फँसा कर यज्ञोपवीत को सीने की सीध में करें, इसके बाद फिर यज्ञ भगवान का आवाहन मन्त्र बोलते हुए यज्ञ पुरुष पूजा करें।
    “ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धमार्णि प्रथमान्यासन्। तेह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूवेर् साध्याः सन्ति देवाः॥ ॐ यज्ञपुरुषाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि॥” -३१.१६
  • सूर्य – दोनों हाथों को ऊपर उठाकर भगवान सूर्य का आवाहन करें और नीचे दिए गए मंत्र उच्चारित करें-
    “ॐ आकृष्णेन रजसा वत्तर्मानो, निवेशयन्नमृतं मत्यर्ं च। हिरण्ययेन सविता रथेना, देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ ॐ सूयार्य नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।” -३३.४३
  1. यज्ञोपवीतधारण

इसके बाद निम्नलिखित मंत्र के जाप के साथ यज्ञोपवीत धारण करें।

मंत्र- “ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।

  आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुंच शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥”…..पार०गृ०सू० २.२.११

  1. जीर्णोपवीत विसर्जन

नवीन यज्ञोपवीत धारण करने के बाद पुराने यज्ञोपवीत को दिये गए मंत्र के उच्चारण के साथ विसर्जित कर देना चाहिए।

मंत्र-ॐ एतावद्दिन पयर्न्तं, ब्रह्म त्वं धारितं मया।

      जीणर्त्वात्ते परित्यागो, गच्छ सूत्र यथासुखम्॥”

  1. पंचगव्यपान

पिछले जीवन में हुई भूल चूकों के प्रायश्चित के लिए पंचगव्य का पान करवाया जाता है। इस दौरान संस्कार ग्रहण करने वाला अपनी ग़लतियों को स्वीकार भी करता है और भविष्य में ऐसी ग़लतियाँ न हों इसके लिए संकल्प भी लेता है। इसके साथ ही आने वाले जीवन को सार्थक बनाने के लिए वो नियम भी बनाता है। अतः अपनी भूलों को स्वीकार करके और प्रायश्चित करके संस्कार ग्रहण करने वाला खुद को शुद्ध कर लेता है और शुद्ध चरित्र के धनि व्यक्ति पर परमात्मा भी कृपा बरसाते हैं।

क्रिया- पात्र जिसमें पंचगव्य रखा हो उसे बाएँ हाथ में रखें और दाहिने हाथ की मध्यम अंगुली से मंत्रोच्चार के साथ पंचगव्य को घोलें।

भावना- मन में यह भाव रखें कि इन गौ द्रव्यों को हम अपनी दिव्य चेतना से अभिमंत्रित कर रहे हैं।

मंत्र- ॐ यत्त्वगस्थिगतंपापं, देहे तिष्ठति मामके।

       प्राशनात्पंचगव्यस्य, दहत्वग्निरिवेन्धनम्॥”

इसके उपरांत पंचगव्य के पात्र को दाहिने हाथ में लेकर मंत्रों के उच्चारण के साथ उसका पान करें। साथ ही यह भावना करें कि दिव्य संस्कारों से पाप की जड़ समाप्त हो रही है और पुण्य के जन्म का क्रम शुरू हो रहा है। साथ ही मन में यह भाव भी रखें कि आप पुण्य कर्मों को श्रद्धा पूर्वक चलाते रहेंगे और साथ ही समाज का भला भी करेंगे।

मंत्र- ॐ यत्त्वगस्थिगतंपापं, देहे तिष्ठति मामके।

       प्राशनात्पंचगव्यस्य, दहत्वग्निरिवेन्धनम्॥”

  1. मेखला-कोपीन धारण

ऊपर दिए गए कर्मकाण्डों के उपरांत वानप्रस्थ लेने वालों के हाथों में मेखला-कोपीन और धर्मदण्ड का उत्तरदायित्व सौंपा जाता है। कोपीन धारण करने का अर्थ होता है कि वानप्रस्थ अब इंद्रिय संयम बरतेगा। सांसारिक मोह-माया से अब वो दूर हो जाएगा। कमर में रस्सी को बांधा जाना कोपीन धारण के लिए तो ज़रूरी है ही साथ ही इसके द्वारा यह संदेश भी दिया जाता है कि अब वानप्रस्थ धारण करने वाला व्यक्ति समाज सेवा के लिए कमर कसेगा। वानप्रस्थ धारण करने वाला आलस्य से दूर रहने, शारीरिक और मानसिक स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए भी कमर कसता है।

क्रिया- मेखला-कोपीन को हाथों के सम्पुट में लेकर मंत्रों के उच्चारण के साथ यह भावना की जानी चाहिए कि अब हम संयम, समर्पण और सक्रियता का वरन करेंगे। जब मंत्र पूरा हो जाए तो उसके बाद मेखला कोपीन को कमर पर बांध देना चाहिए।

मंत्र- “ॐ इयं दुरुक्तं परिबाधमानां, वर्णं पवित्रं पुनतीमऽआगात्।

प्राणापानाभ्यां बलमादधाना, स्वसा देवी सुभगा मेखललेयम्॥”…..पार० गृ०सू० २.२.८

  1. धर्मदण्डधारण

वानप्रस्थ संस्कार ग्रहण करने वाले को हाथ में लाठी दी जाती है जिसे दण्ड कहा जाता है। जो वानप्रस्थी वन्य  प्रदेशों में विचरण करते हैं उनके लिए यह लाठी काफी उपयोगी भी साबित होती है। इसकी सहायता से मार्ग में आने वाली परेशानियों से वानप्रस्थी निकल सकता है। इसके अलावा धर्मदण्ड का महत्व यह भी है कि जिस प्रकार राज्याभिषेक के दौरान राजा को प्रतीक स्वरूप राज-दण्ड के रूप में एक छोटा लकड़ी का डंडा हाथ में विधिवत रूप से दिया जाता है ताकि वो अपनी प्रजा को न्याय दिला सके उसी प्रकार वानप्रस्थी को भी धर्मदण्ड दिया जाता है जिससे वो संसार में धर्म की व्यवस्था को कायम कर सके और इसके साथ ही अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति भी जागरूक रहे।

क्रिया- दोनों हाथों से इस धर्मदण्ड को पकड़े। भूमि के समानांतर हृदय की सीध में इसे स्थिर रखें। साथ ही मंत्र का उच्चारण करें और जब मंत्र समाप्त हो जाए तो दण्ड को मस्तक से लगाएँ और अपनी बायीं ओर इसे रख लें।

भावना- अपने मन में यह भाव रखें कि आप धर्म स्थापना के लिए प्रतिबद्ध हो रहे हैं और अपने उत्तरदायित्व को पूरी तरह से स्वीकार कर रहे हैं और दिव्य शक्तियां आपको ऐसा करने की प्रेरणा दे रही हैं।

मंत्र- ॐ यो मे दण्डः परापतद्, वैहायसोऽधिभूम्याम्।

तमहं पुनराददऽआयुषे, ब्रह्मणे ब्रह्मवचर्साय॥”…..पार०गृ०सू० २.२.१२

  1. पीतवस्त्रधारण

पीत यानि पीले वस्त्र प्रतीक माने जाते हैं वीरता का और त्याग का। साथ ही पीत वस्त्रों को परमार्थ परायण लोगों का बाना भी माना जाता है। समाज से अज्ञान को मिटाने के लिए वानप्रस्थों को एक संत, वीर और सुधारक की तरह काम करना पड़ता है इसलिए संस्कृति और समाज के गौरव की रक्षा के लिए यही रंग प्रेरणा स्रोत माना जाता है।

क्रिया- पीले रंग के दुपट्टे को पूरी श्रद्धा और दायित्व के साथ अपने दोनों हाथों में लें।

भावना- मंत्र उच्चारण के साथ यह भाव मन में लाएं की पवित्रता, शौर्य और त्याग के गुण आपके अंदर समाहित हों। जब मंत्र पूरा हो जाए तो दुप्पटे को अपने कन्धों पर धारण कर लें।

मंत्र- ॐ सूर्यो मे चक्षुवार्तः, प्राणो३न्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम्।

अस्तृतो नामाहमयमस्मि स, आत्मानं नि दधे द्यावापृथिवीभ्यां गोपीथाय॥”…. अथवर्० ५.९.७

  1. ऋषिपूजन

वानप्रस्थ संस्कार के दौरान ऋषिपूजन भी किया जाता है। ऋषिपूजन के द्वारा वानप्रस्थी उन तेजस्वी महात्माओं को याद करते हैं जिन्होंने समाज को सुधारने के लिए और मानवीय मूल्यों को बचाए रखने के लिए प्रयास किये। वानप्रस्थी भी उनके पद चिन्हों का अनुगमन कर सकें इसलिए वानप्रस्थ की शुरुआत से पहले उन ओजस्वी ऋषियों और महामानवों का पूजन किया जाता है।

क्रिया- अपने हाथों में पुष्प, अक्षत लेकर ऋषियों का ध्यान मंत्रोच्चारण के साथ करें।

भावना- मन में यह भाव रखें कि ऋषियों के जैसा बनने के लिए हम भी अपने पुरुषार्थ का पूर्ण इस्तेमाल करेंगे और तदोपरांत समाज कल्याण करेंगे।

मंत्र-  ॐ इमावेव गोतमभरद्वाजा, वयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजऽ,

       इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी, अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निः,

       इमावेव वसिष्ठकश्यपौ, अयमेव वस्ष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिवार्चाह्यन्नमद्यतेऽत्तिहर् वै,

       नामैतद्यत्रिरिति सवर्स्यात्ता भवति, सवर्मस्यान्नं भवति य एवं वेद॥ -बृह० उ० २.२.४

       ॐ सप्तऋषीनभ्यावतेर्।

       ते मे द्रविणं यच्छन्तु, ते मे ब्राह्मणवचर्सम्।

       ॐ ऋषिभ्यो नमः।

       आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। -अथवर्० १०.५.३९

  1. वेद पूजन

भारतीय संस्कृति में वेदों को बहुत अहमियत दी गई है क्योंकि वेद ज्ञान का भंडार हैं। वेद पूजन करने से मनुष्य में समाज सुधार की भावना का उदय होता है। जहाँ अज्ञान दुखों का कारण है वहीं वेदों के ज्ञान से जब इंसान के अंदर का अज्ञान हट जाता है तो उसमें ज्ञान का उदय होता है और ज्ञान समाज को सही दिशा दिखाता है। वानप्रस्थों का यह दायित्व होता है कि वो स्वयं वेदों में वर्णित ज्ञान को समझें और इस ज्ञान को संसार में भी फैलाएं।

क्रिया और भावना- अपने हाथों में पूजन सामग्री लेकर मंत्र उच्चारण के साथ भावना करें कि ज्ञान की सनातन धारा को वर्तमान युग में भी हम प्रवाहित करेंगे और इससे समाज में फैली कुरीतियों को मिटाएंगे। इस प्रक्रिया में हम अपनी भावना को भी भली-भांति निभाएंगे क्योंकि अज्ञान के निवारण के लिए यह आवश्यक है।

मंत्र-  “ॐ वेदोऽसि येन त्वं देव वेद, देवेभ्यो वेदोऽभवस्तेन मह्यं वेदो भूयाः।

       देवा गातुविदो गातुं, वित्त्वा गातुमित।

       मनसस्पतऽ इमं देव, यज्ञ स्वाहा वाते धाः।

      ॐ वेदपुरुषाय नमः।

      आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि। -२.२१

  1. यज्ञपुरुष पूजन

यज्ञ को देवत्व का आधार माना गया है। यज्ञ के द्वारा इंसान में शांति की भावना का उदय होता है और साथ ही यज्ञ से दैवीय और कल्याणकारी शक्तियां भी पुष्ट होती हैं। यज्ञ करके इंसान के मन में जो भाव जाग्रत होते हैं उनसे ही समाज अभावों से मुक्त होता है। समाज में यज्ञीय भावना, यज्ञीय दर्शन को फैलाना ही यज्ञपुरुष पूजन का वास्तविक अर्थ है।

क्रिया और भावना- पूजन सामग्री को हाथ में लेने के पश्चात मंत्र का उच्चारण करें और मन में यह भाव रखें कि देवत्व और धर्म के मुख्य कारक को अंगीकार करते हुए उसे पुष्ट किया जा रहा है और साथ ही उसे प्रभावशाली बनाया जा रहा है।

मंत्र- ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः, तानि धमार्णि प्रथमान्यासन्।

      ते ह नाकं महिमानः सचन्त, यत्र पूवेर् साध्याः सन्ति देवाः।

      ॐ यज्ञपुरुषाय नमः।

      आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि, ध्यायामि।

  1. व्रत धारण

मानवीय मूल्यों को अपने चरम पर पहुंचाने के लिए समय-समय पर हमको छोटे-छोटे व्रत रखने पड़ते हैं। इन व्रतों को धारण करने से ही इंसान में श्रेष्ठ प्रवृतियों का विकास होता है। वानप्रस्थ संस्कार ग्रहण करने वाले भी देव शक्तियों को साक्षी मानकर व्रतशील बनने की घोषणा करते हैं। नीचे हम देव शक्तियों और उनसे मिलने वाली प्रेरणा के बारे बता रहे हैं।

  • अग्निदेव- अग्निदेव को ऊर्जा का प्रतीक हैं। अग्निदेव ऊर्जा, ताप, प्रकाश से ओत-प्रोत रहते हैं और अपनी ऊर्जा से दूसरों को भी स्फूर्ति प्रदान करते हैं। इसके साथ ही अग्निदेव यज्ञीय चेतना के वाहन बनने के प्रेरणा स्रोत भी हैं।
  • वायुदेव- वायुदेव प्राणरूप हैं और बिना अहंकार के सबके पास पहुँचते हैं। वायुदेव हर स्थान को अपनी उपस्थिति से भर देते हैं और निरंतर गतिशील रहते हैं। वायुदेव परोपकारी तत्वों को फैलाते हैं।
  • सूर्यदेव- सूर्य देव जीवन रक्ष और जागृति का प्रतीक हैं। सूर्यदेव की ही कृपा से धरती पर जीवन संभव हुआ है। अतः पृथ्वी को संतुलित करने वाले और प्राण- अनुदानक के रूप में सूर्य देव को पूजा जाता है।
  • चंद्रदेव- चंद्रदेव स्वप्रकाशमान नहीं हैं लेकिन सूर्य के ताप को स्वयं सहकर संसार में ये निर्मलता फैलाते हैं। इनसे प्रेरणा मिलती है कि खुद तप करके हमें उपलब्धियाँ औरों के हिस्से में देनी चाहिए।
  • इंद्रदेव- हजार आँखों से सतर्क रहने की प्रेरणा हमें इंद्रदेव से मिलती है। इंद्रदेव देव प्रवर्तियों और संगठित और सशक्त बनाए रखने वाले हैं।  

क्रिया और भावना- वानप्रस्थ संस्कार धारण करने वाले मंत्रोच्चारण के दौरान अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाए रखे। साथ ही मन में यह भाव होना चाहिए कि हम व्रतशीलता की साहस पूर्ण घोषणा करते हैं। हमें सत्प्रवृतियों को पाने में चाहे जितनी भी कठिनाई हो लेकिन हम सत्प्रवृतियों को अपना हाथ थमा रहे हैं। वे हमें एक शिक्षक और मार्गदर्शक की तरह पथ प्रदर्शित करती रहेंगी। बारी-बारी से हर देवता का मंत्र बोले और मंत्र समाप्ति के बाद पुनः प्रारंभिक मुद्रा में आ जाएं।

देव मंत्र
अग्निदेव ॐ अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्।

तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ अग्नये नमः॥१॥

वायुदेव ॐ वायो व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्।

तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ वायवे नमः॥२॥

सूर्यदेव ॐ सूयर् व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्।

तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ सूयार्य नमः॥३॥

चंद्रदेव ॐ चन्द्र व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्।

तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ चन्द्राय नमः॥४॥

इंद्रदेव ॐ व्रतानां व्रतपते व्रतं चरिष्यामि, तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्।

तेनध्यार्समिदमहम्, अनृतात्सत्यमुपैमि। ॐ इन्द्राय नमः॥५॥

                                                                                                                                        -मं०ब्रा०१.६.९.१३

  1. अभिषेक

एक वानप्रस्थ का अभिषेक भी ठीक उसी तरह किया जाता है जैसे एक राजा का राज्याभिषेक होता है। राजा अपने राज्याभिषेक के दौरान अपनी प्रजा और दरबारियों की संरक्षण की ज़िम्मेदारी होती है। ठीक वैसे ही वानप्रस्थ का धर्माभिषेक भी होता है। वानप्रस्थ समाज में ज्ञान, सुव्यवस्था और सुख-शांति लाने का प्रण करता है। वानप्रस्थ की यह ज़िम्मेदारी भी होती है कि वो समाज में सबके साथ सद्भाव से व्यवहार करे। भौतिकता की तुलना में आत्मिक प्रगति का मूल्य अधिक है इसलिए राजा से भी ज्यादा सम्मान एक वानप्रस्थ का होता है। इसलिए अभिषेक के दौरान वानप्रस्थ को उनकी ज़िम्मेदारियों का आभास करवाया जाता है। जल के द्वारा वानप्रस्थ धारण करने वालों का अभिषिंचन किया जाता है और इसके बाद वे लोग समाज की ओर से नयी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं।

क्रिया- अभिषेक के लिए निर्धारित मात्रा में कन्याएं या संस्कारवान व्यक्तियों की उपस्थिति वानप्रस्थ संस्कार के दौरान होनी चाहिए। मंत्रोच्चारण के साथ कन्याओं या संस्कारवान व्यक्तियों द्वारा वानप्रस्थ ग्रहण करने वाले व्यक्तियों का अभिषेक किया जाना चाहिए।

भावना- वानप्रस्थ ग्रहण करने वालों को यह भाव अपने मन में रखना चाहिए कि ईश्वरीय ऋषिकल्प जीवन को ध्यान में रखते हुए आवश्यक प्रवृतियों को सिंचित किया जा रहा है और समय के बढ़ने के साथ-साथ इनका विकास होगा।

मंत्र-  ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः ता न ऽऊजेर् दधातन।

       महे रणाय चक्षसे।

       ॐ यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः।

       उशतीरिव मातरः।

       ॐ तस्मा अरंगमाम वो, यस्य क्षयाय जिन्वथ।

       आपो जनयथा च नः। -३६.१४-१६   

  1. विशेष आहुति

अभिषेक किये जाने के बाद अग्नि स्थापना की जाए और उसके उपरांत विधि पूर्वक यज्ञ किया जाए। स्विष्टकृत के पहले सात विशेष आहुतियां ज़रूर दी जानी चाहिए। इसके साथ ही वानप्रस्थ मन में यह भाव रखें कि देवगण एक विशाल यज्ञ चला रहे हैं और उस यज्ञ में समिधा, दिव्य बनकर हम भी उपस्थित हैं। देवगणों के संपर्क में हमारा जीवन भी धन्य होगा और जीवन को सही लक्ष्य प्राप्त होगा।

मंत्र- ॐ ब्रह्म होता ब्रह्म यज्ञा, ब्रह्मणा स्वरवो मिताः।

अध्वयुर्ब्रर्ह्मणो जातो, ब्रह्मणोऽन्तहिर्तं हविः स्वाहा।

इदं अग्नये इदं न मम।”….अथवर्० १९.४२.१

 

  1. प्रव्रज्या

वानप्रस्थ ग्रहण करने वाले को चलते रहना चाहिए। वानप्रस्थ संस्कार के बाद व्यक्ति परिव्राजक बन जाता है और परिव्राजक का काम होता है हमेशा चलते रहना, किसी सीमा में बंधकर न रहना और अपने पुरषार्थ को समाज में फैलाना। जो परिव्राजक समाज की भलाई के लिए संकीर्ण विचारों को त्याग देते हैं उन्हीं को ईश्वरीय प्रेम मिलता है।

क्रिया और भावना- वानप्रस्थ संस्कार ग्रहण करने वाले व्यक्तियों को यज्ञ वेदी की चार परिक्रमाएं चरैवेति मंत्रों के साथ करनी चाहिए। परिव्राजक मन में यह भाव रखें कि हम सच्चे परिव्राजक बन रहे हैं और इससे जुड़े जो भी अनुदान हमें मिलेंगे उनके लिए हम सत्पात्र बनेंगे।

मंत्र- ॐ नाना श्रान्ताय श्रीरस्ति, इति रोहित शुश्रुम।

पापो नृषद्वरो जन, इन्द्र इच्चरतः सखा। चरैवेति चरैवेति॥

पुष्पिण्यौ चरतो जंघे, भूष्णुरात्मा फलग्रहिः।

शेरेऽस्य सवेर् पाप्मानः श्रमेण प्रपथे हताः। चरैवेति चरैवेति॥

आस्ते भग आसीनस्य, ऊध्वर्स्तिष्ठति तिष्ठतः।

शेते निपद्यमानस्य, चराति चरतो भगः। चरैवेति चरैवेति॥

कलिः शयानो भवति, संजिहानस्तु द्वापरः।

उत्तिष्ठँस्त्रेताभवति, कृतं संपद्यते चरन्। चरैवेति चरैवेति॥

चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदुम्बरम्।

सूयर्स्य पश्य श्रेमाणं, यो न तन्द्रयते चरन्। चरैवेति चरैवेति॥

अंत में यज्ञ समापन पूर्णाहुति आदि कार्य किये जाएं। और मंत्रों के साथ पुष्प और अक्षत की वर्षा की जाए, शुभ-कामनाएं और आशीर्वाद दिए जाएं। वानप्रस्थ संस्कार समापन के बाद संबंधित व्यक्ति समाज में सदगुणों को फैलाने के लिए प्रतिबद्ध हों।

हम आशा करते हैं कि हमारा ये लेख आपको पसंद आया होगा। हम आपके मंगल भविहस्य की कामना करते हैं।   

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