आखिर क्यों किया गणेश जी ने तुलसी को अपनी पूजा से बहिष्कृत

भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती के पुत्र प्रथम पूजनीय श्री गणेश जी के जीवन के कुछ ऐसे भी पहलू है जिनसे शायद आप अनभिज्ञ है। जी हाँ यह रहस्य उनके विवाह से जुड़ा हुआ है और जिसकी वजह से उन्होंने माता तुलसी का बहिष्कार कर दिया था।

आपको शायद ही यह पता होगा कि गणेश जी ने अपना सारा जीवन ब्रह्मचारी रहने का फैसला किया था फिर क्या वजह थी जो उन्होंने रिद्धि और सिद्धि से विवाह किया। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको इस रहस्य के बारे में बताएंगे।

यूँ तो गणेश जी के विवाह से जुड़ी दो कथाएं है उनमें से एक कथा कुछ इस प्रकार है:

गणेश जी ने लिया आजीवन ब्रह्मचारी रहने का निर्णय

यह कहानी तो हम सब जानते है कि भगवान शिव ने जब गणेश जी का सर काटा था तब उन्हें यह पता नहीं था की वह उनके पुत्र है। जब उन्हें इस बात का ज्ञात हुआ तब उन्होंने नंदी को फ़ौरन आदेश दिया कि जो भी उसे पहले मिले वह उसका सर काट कर ले आये। किन्तु नंदी महाराज को सबसे पहले कोई मनुष्य नहीं बल्कि एक हाथी का बच्चा मिला इसलिये वह उसका ही शीश काट कर ले आये। उस धड़ से गणेश जी को नया जीवन तो प्राप्त हो गया किन्तु उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने का निर्णय लिया।

लम्बोदर ने ऐसा फैसला इसलिए लिया क्योंकि उन्हें लगता था कि उनका ऐसा रूप देखकर कोई भी स्त्री उनसे विवाह नहीं करेगी।

जब तुलसी जी ने गजानन को दिया श्राप

एक बार गणेश जी वन में घोर तपस्या में लीन थे। जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे वैसे गणपति जी का तेज भी बढ़ता गया मानो एक दूसरे सूरज का उदय हुआ हो। भगवान के इस तेज से प्रभावित होकर माता तुलसी उनके समक्ष प्रकट हुई और विवाह का प्रस्ताव रखा। क्योंकि गणेश जी ने विवाह न करने का निर्णय लिया था इसलिए उन्होंने बड़े ही आदर पूर्वक तुलसी जी का प्रस्ताव ठुकरा दिया। लेकिन तुलसी जी को यह अपमान लगा और उन्होंने गणेशजी को यह श्राप दे दिया कि उनका विवाह एक नहीं बल्कि दो स्त्रियों से होगा।

तुलसी जी के श्राप की वजह से ही गणेश जी को रिद्धि और सिद्धि से विवाह करना पड़ा था

गणेश जी ने तुलसी का कर दिया बहिष्कार

तुलसी जी के श्राप से गणेश जी अत्यधिक क्रोधित हो गये और उन्होंने भी माता तुलसी को श्राप दे दिया की वह एक पौधे में बदल जाएं और उनके पत्तों का का प्रयोग गजानन की पूजा में कभी प्रयोग न हो। इतना ही नहीं लम्बोदर ने तुलसी जी को भयावह पीड़ा सहने का भी श्राप दिया।

यही कारण है कि जब तुलसी के पौधे में मंजर लगते हैं तब तुलसी को अत्यंत पीड़ा का अनुभव होता है ।

कैसे हुआ ऋद्धि और सिद्धि से गणेश जी का विवाह

एक कथा के अनुसार गणेश जी के विवाह में उनकी सूरत की वजह से रुकावट आ रही थी इसलिए वह दूसरों के विवाह में विघ्न डालने लगे। उनके इस कार्य में उनका वाहन मूषक भी उनका साथ देता था। सभी देवी देवता गणेश जी की इस हरकत से परेशान हो गए थे। तब ब्रह्मा जी ने अपनी मानस पुत्रियों ऋद्धि और सिद्धि से उनका विवाह करा दिया। गणेश जी को दो पुत्रों की प्राप्ति हुई जिनका नाम था शुभ और लाभ। उनकी एक पुत्री भी है जिन्हे माता संतोषी के नाम से जाना जाता है।

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