Holi 2019: होली के रंग, सेहत के संग

‘लो आ गई फिर से होली,

लेकर बच्चों की टोली।

 बिखरे रंग लाल, हरा, पीला,

 सबके चेहरे पर है खुशियों का मेला।

 भीगे आँचल, भीगे चोली,

देखो सखी आज मैं फिर से उनकी हो ली।’

रंगों का यह पर्व होली अपने साथ कई प्रकार की खुशियों को लेकर आता है। पूरे भारत में यह त्यौहार बड़े हर्षों उल्लास के साथ फागुन की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के साथ प्रारंभ होकर चैत्र मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तक चलता है। उत्तर भारत के कई स्थानों पर यह पर्व पूरे हफ्ते की छुट्टियों के रुप में मनाया जाता है। होली की तैयारियां होलाष्टक (अर्थात् होली के 8 दिन पहले) से ही प्रारंभ हो जाती हैं। होलाष्टक के दिन महिलाएं अपने घर के आंगन में संध्या के समय आटे से सूर्य व चंद्रमा की अल्पना बनाती हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा करने से हमारे सूर्य व चंद्रमा ग्रह शुद्ध होते हैं। ग्रामीण परिवेश में यह परंपरा अभी भी कायम है।

होलिका दहन से होता है वातावरण शुद्ध

होलिका दहन के लिए गाय के शुद्ध गोबर से गुलारी बनाई जाती है। यह गुलारी बनाने वाले की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है। साथ ही जब होलिका दहन होता है तो यह गुलारी जलकर वातावरण को कीटाणु रहित बनाती हैं। वस्तुतः होली से पूर्व शीत मौसम के चलते वातावरण में असंख्य किटाणु उत्पन्न हो जाते हैं जो अनेकों बीमारियों को जन्म देते हैं। किंतु होलिका दहन के साथ-साथ यह किटाणु काफी हद तक समाप्त हो जाते हैं। होलिका दहन के समय अग्नि में घी, कपूर व धूप डालने का रिवाज़ है। यह मात्र रिवाज़ ही नहीं अपितु वातावरण व ग्रह शुद्धि का अचूक उपाय है। घी का प्रयोग व्यक्ति के शुक्र ग्रह को शुद्ध करता है। कपूर व धूप वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा का शमन करते हैं। होलाष्टक के साथ ही एक उचित स्थान का चयन होता है ,जहाँ लकड़ी व पतझड़ की पत्तियों को होलिका दहन के लिए इकट्ठा किया जाता है। ऐसा करने से वातावरण स्वतः ही स्वच्छ हो जाता है। बाद में इसकी राख खेतों में कीटनाशक का काम करती है। कृषि उपज बढ़ाने हेतु रसायन के रूप में इसको प्रयुक्त किया जाता है।

होलाष्टक को लेकर ये है ज्योतिषीय दृष्टिकोण

ऐसा मानना है कि होलाष्टक के लगते ही कोई भी शुभ कार्य जैसे शादी समारोह, मुंडन, गृह प्रवेश, कर्ण छेदन आदि नहीं करते हैं। मुख्य रूप से, जहां विष्णु भक्त, प्रहलाद को सजा के उद्देश्य हिरणकश्यप में कारावास में रख कर अनेकों वेदनाएँ दी थीं। जब ईश्वर भक्त कष्ट में रहे तो हम कोई उत्सव कैसे मना सकते हैं। होलिका दहन के उपरांत प्रहलाद की विजय के रूप में होली का उत्सव मनाते हैं। होलाष्टक (जब से होली की तैयारियां प्रारंभ होती है) तब कई स्थानों में रंगीन कपड़े कांटेदार पेड़ों (बबूल) पर टांगने की परंपरा है। यह मात्र परंपरा ही नहीं अपितु रंगों द्वारा नव ग्रहों की शुद्धि का उपचार है।

जैसे लाल रंग सूर्य व मंगल ग्रह को शुद्ध करता है। सफेद रंग चंद्रमा और शुक्र की शुद्धि करता है। पीला रंग गुरु ग्रह की शांति के लिए होता है। नीला व काला राहु और शनि ग्रह को प्रसन्न करता है। वहीं सलेटी रंग केतु के उपचार में प्रयुक्त होता है। यह अलग अलग रंग के कपड़े होलाष्टक के दिन (अपनी कुण्डली अनुसार) कांटेदार पेड़ पर टांगे जाते हैं और होलिका दहन के साथ अग्नि को समर्पित किए जाते हैं। यह उपाय विशेषज्ञ व ज्योतिष की देखरेख में करना अति आवश्यक है।

होली के उत्सव में दिखती है कृषि की झलक

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ हम हर नई फ़सल को अग्नि को समर्पित कर ग्रहण करते हैं। इस उद्देश्य से गेहूँ व चने को पहले होलिका दहन की अग्नि में भेंट किया जाता है। फिर इसे प्रसाद रूप में सभी को बांटा जाता है। कितनी सुंदरता छिपी है हमारे देश की परंपराओं में। ग्रामीण क्षेत्र में आज भी बच्चे जो गाय बकरी चराने जाते हैं और घर लौटते समय अपने साथ पलाश के मोहक पुष्प लाते हैं। घर में माताएं-बहनें  एक बड़े बर्तन में जल डालकर इसे भिगोकर रखती हैं।

यह रंगीन जल धुलेंडी के दिन होली खेलने में प्रयुक्त होता है। पलाश की मोहक गंध व रंग स्वास्थ्यवर्धक है जो हमें अनेकों चर्म रोगों से बचाती है तथा इसकी गंध वातावरण में आकाश तत्व को स्थापित करती है। व्यक्ति में स्वार्थ, लोभ, मोह व अवसाद का शमन करती हैं। व्यक्ति में मौजूद मनोमालिन्य दूर होकर मैत्री भाव उत्पन्न होता है। इन सभी बातों पर विचार करें तो यह गीत सार्थक हो जाता है –

       ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं,

             रंगों में रंग मिल जाते हैं।’

रंगो का यह पर्व वाक़ई में बेहद सुंदर है और इसकी सुंदरता का अनुभव हमें तभी होगा जब हम होली के महत्व को समझकर रंगों में सराबोर होंगे।

दीप्ति जैन
आधुनिक वास्तु एस्ट्रो विशेषज्ञ

दीप्ति जैन एक जानी-मानी वास्तुविद हैं, जिन्होंने पिछले 3 सालों से वास्तु विज्ञान के क्षेत्र में अपने कौशल और प्रतिभा को बखूबी दर्शाया है। उनके इस योगदान के लिए उन्हें कई सारे पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया है। दीप्ति जैन न केवल वास्तु बल्कि सामाजिक मुद्दों, हस्‍तरेखा विज्ञान, अध्यात्म, कलर थेरेपी, सामुद्रिक शास्त्र जैसे विषयों की भी विशेषज्ञ हैं।

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