क्रिसमस 2019 : जानें इस त्योहार को मनाने के रीति-रिवाज!

इस क्रिसमस को और भी मधुर बनाने के लिये जानें कैसे प्राप्त होगा आपको प्रभु का आशीर्वाद।

क्रिसमस का पर्व ईसाई धर्म के अनुयायियों के लिये सबसे पवित्र दिन है, इसमें कोई संदेह नहीं है। यही वजह है कि, पूरी दुनिया में लोग इस पर्व को हर्ष और उल्लास के साथ मनाते हैं। प्रभु यीशु के बारे में दुनिया का हर शख्स जानता है। यीशु को ईसा मसीह के नाम से भी जाना जाता है। उन्हें अक्सर मानव जाति के उद्धारकर्ता के रुप में भी देखा जाता है, और उनकी शिक्षाओं को पढ़कर लगता है कि यह उपाधि उन्हें ठीक ही दी गई है। क्रिसमस के त्योहार को पूरी दुनिया में ईसा मसीह की जयंती के रुप में मनाया जाता है। आधुनिक दौर में धर्म और संस्कृतियों की गतिशीलता बदल रही है और आज हम देख सकते हैं कि, अन्य धर्म और समुदायों के लोग भी क्रिसमस के पर्व में शामिल होने लगे हैं। इस दिन को कई लोग खुशी का दिन मानते हैं क्योंकि इसी दिन से त्योहारों के सीजन की शुरुआत होती है, क्रिसमस के 6 दिन बाद ही नये साल का आरंभ होता है। इस दिन लोग अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मुलाकात करके बधाईयां देते हैं और साथ में भोजन का आनंद उठाते हैं। इस दिन क्रिसमस के पेड़ को लोगों द्वारा सजाया जाता है और कैरल (ईसाई धार्मिक गीत) गाए जाते हैं। इस रोज बच्चे बहुत बेसब्री से संता और उनके द्वारा दिये जाने वाले उपहारों का इंतजार करते हैं, जो इस त्योहार के दिन को और भी खास बना देता है। आइए अब हम इस त्यौहार से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर एक नज़र डालते हैं, जो आनंद के इस मौसम के आगमन की पहचान हैं!

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इतिहास के पन्नों में क्रिसमस का त्योहार

ईसाई धर्म के अनुयायियों द्वारा ईसा मसीह की जयंती को क्रिसमस दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रभु यीशु ईसाई धर्म के सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक नेताओं में से एक थे, जिनके उपदेशों ने तत्कालीन लोगों पर बहुत प्रभाव छोड़ा है। यहां तक कि वर्तमान समय में भी, उनके उपदेशों का धार्मिक रूप से ईसाई धर्म और संस्कृति के लोगों द्वारा पालन किया जाता है। यह माना जाता है कि 2000 साल से भी अधिक समय पहले, माता मरियम एक पवित्र आत्मा के माध्यम से यीशु मसीह को इस संसार में लायी थीं। प्रसव के दौरान मैरी अपने पति के साथ यात्रा पर जा रही थी और इसलिये वह किसी सराय को खोजने में असमर्थ थे। इसके कारण उन्हें एक अस्तबल में बच्चे को जन्म देना पड़ा, जिसे बाद में ईसा मसीह के रुप में जाना गया। यीशु के जन्म की खबर सबसे पहले चरवाहे समुदाय तक पहुँची, जो उस समय समाज का निचला तबका था। इससे यह संकेत मिलता है कि भगवान यीशु गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करने के लिए मानव जाति के उद्धारकर्ता के रूप में पैदा हुए थे।

हालाँकि, उनके जन्म की तारीख के विषय में तब तक बहुत मतभेद थे जब तक रोम के बिशप पोप लियो प्रथम नें रोमन त्योहार सैटॅनेल्यॅ (जिस दिन रोमन लोगों द्वारा सूर्य की पूजा शुरु की गई थी) के साथ यीशु के जन्म दिन का विलय नहीं कर दिया। इसके पीछे विचार यह था कि रोम के लोगों को सूर्य देव की पूजा करने से रोका जाए, इसीलिये पोप लियो I ने यीशु मसीह को ‘प्रकाश की नई किरण’ के रूप में वर्णित किया। इसलिए, उनकी जयंती को पूरी दुनिया में क्रिसमस के रूप में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। क्रिसमस के जश्न से पहले, दिसंबर महीने में इस समय के दौरान शीतकालीन संक्रांति हुई थी। अधिकांश यूरोपीय देशों में, यह ऐसा समय था जब कड़कड़ाती सर्दियों के दिन समाप्त होते थे। इस समय लोग एक दूसरे से मिलते थे और ठंड की रातों में एक साथ समय बिताते थे। इससे त्योहार का माहौल और भी खूबसूरत हो गया।

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क्रिसमस ट्री और सेंटा क्लास क्लॉस

क्रिसमस की भावना को जीवित रखने के लिए, लोग कई गतिविधियों में भाग लेते हैं, जिनके बारे में हम इस ब्लॉग के अगले भाग में बात करेंगे।आइए अब हम उन दो प्राथमिक रिवाजों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जिन्हें ईसाई धर्म में मानने वाले लोग कभी नहीं भूल सकते चाहे वो दुनिया के किसी भी हिस्से में क्यों न हों।

  • क्रिसमस ट्री

यह माना जाता है कि क्रिसमस ट्री को घर में लाने और क्रिसमस के दौरान इसे सजाने की परंपरा जर्मनी से शुरु हुई थी। उस वक्त लोग बुरी ऊर्जाओं और ताकतों को दूर करने के लिए अपने घरों के बाहर पेड़ की शाखाओं और टहनियों को सजाते थे। उसके बाद उन्होंने सोचा कि इन सजे धजे पेड़ों को घर के अंदर रखा जाये जिससे घर की साज-सज्जा भी बढ़े और घर में नकारात्मक ऊर्जा भी न आए। कुछ लोगों का मानना है कि वर्ष 1419 में पहली बार क्रिसमस ट्री अस्तित्व में आया था। तब से लोग अपने घरों में क्रिसमस ट्री ला रहे हैं इन्हें संपन्नता का प्रतीक माना जाता है।

  • सेंटा क्लॉस का आगमन

संत निकोलस से जुड़े मिथक ने सेंटा क्लॉज की कथा को जन्म दिया। मन्यताओं के अनुसार संत निकोलस एक छोटे से शहर जिसका नाम मायरा था में एक बिशप थे, जो वर्तमान टर्की देश में स्थित है। संत निकोलस की मदद से अविवाहित औरतें अपने जीवनसाथी से मिलने में कामयाब होती थीं। लोग संत निकोलस के इस परोपकार को नहीं भूले हैं, यही वजह है कि उनकी जयंती के दिन लोग उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है कि, सैंटा क्लॉज़ भी संत निकोलस का एक संशोधित रुप थे, जो क्रिसमस के दिन बच्चों को उपहार प्रदान करते थे।

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ऊपर वर्णित परंपराओं के अलावा, कुछ अन्य परंपराएं भी हैं जिन्हें लोग नहीं भूल सकते।

  • क्रिसमस के त्योहार में खिड़कियों में मोजा लटकाने की परंपरा का पालन किया आज भी किया जाता है ताकि सैंटा क्लॉज़ आ सकें और उनमें अपने उपहार डाल सकें।
  • इस दिन लोग चर्च जाते हैं और क्रिसमस कैरोल (धार्मिक गीत) गाते हैं।
  • ज्यादातर लोग इस मौके पर ऐसे पेड़ खरीदते हैं जो सदाबहार हों और ऐसे पेड़ों को ही क्रिसमस ट्री में बदला जाता है।
  • इस दिन लाल और हरे रंग का अत्यधिक उपयोग होता है क्योंकि लाल रंग जामुन का होता है और यह ईसा मसीह के खून का प्रतीक भी है। इसमें हरा रंग भी प्रयोग भी किया जाता है जिसे सदाबहार परंपरा का प्रतीक माना जा सकता है।
  • कुछ लोग दूध और कुकीज के रुप में सैंटा के लिये भोजन रखते हैं।
  • एक और परंपरा है जो ज्यादा परिचित नहीं है, वह है यूल लॉग (एक लकड़ी का गुटका) को आग में फेंकना।
  • कुछ लोग कच्चे अंडे से बने पेय का सेवन करते हैं जिसे एग्नॉग कहा जाता है।
  • लोग इस दिन अपने करीबियों को क्रिसमस कार्ड भेजते हैं और उऩके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।

हम आशा करते हैं कि क्रिसमस 2019 का हमारा यह ब्लॉग आपको पसंद आया होगा। हमारी ओर से आपको क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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