हृदय रोग के लिए कुंडली के ये योग हैं जिम्मेदार ! इन महाउपाय से करें बचाव

इंसान के जन्म से मृत्यु तक हृदय लगातार धड़कता रहता है। हृदय की यह गतिशीलता ही इंसान को सक्रिय बनाए रखती है। हृदय का पोषण रक्त और ऑक्सीजन के द्वारा होता है। हमारे शरीर को जीवंत बनाए रखने के लिए हृदय शरीर में लगातार रक्त का प्रवाह करता है। मनुष्य का हृदय एक दिन में लगभग एक लाख बार और एक मिनट में औसतन 60 से 90 बार धड़कता है। हृदय का काम शरीर में रक्त का प्रवाह करना है, इसलिए हृदय का स्वस्थ होना अति आवश्यक है। आपका हृदय जितना स्वस्थ होगा आपका जीवन उतना ही सुख पूर्वक गुजरेगा। हालांकि आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी में कई लोगों को हृदय से संबंधित रोग हो रहे हैं क्योंकि खुद के लिए भी अब लोगों के पास वक्त नहीं है। यही वजह है कि हृदय रोगों का कारण ज्यादातर अव्यवस्थित दिनचर्या या खराब खान-पान होता है, परंतु बहुत से ऐसे ज्योतिषीय कारण भी होते हैं जिनकी वजह से लोगों को हृदय से संबंधित रोग घेर लेते हैं।

हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण

आज इस लेख के माध्यम से हम आपको बताएँगे कि हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण क्या हैं। इसके साथ ही हम आपको कुछ ऐसे ज्योतिषीय उपचार भी बताएंगे जिनकी मदद से आप हृदय रोगों से खुद को बचा सकते हैं। तो आइए अब विस्तार से जानते हैं हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण और उनके उपचार:-

  • चतुर्थ, पंचम भाव और इन भावों के स्वामियों की स्थिति

जैसा कि हम सब जानते हैं कि इंसान के शरीर में हृदय बायीं ओर होता है और यह शरीर का वह अंग है जो रक्त को पूरे शरीर में पहुंचाता है। अब अगर ज्योतिष शास्त्र के नजरिये से देखा जाए तो कुंडली में स्थित बारह राशियों में से चतुर्थ राशि यानि कर्क राशि को हृदय का स्थान और पंचम राशि सिंह को इसके सूचक के रुप में देखा जाता है। हृदय से संबंधित किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए जातक की कुंडली में चतुर्थ, पंचम भाव और इन भावों के स्वामियों की स्थिति पर विचार किया जाता है। चौथे और पांचवे भावाें के स्वामियों पर यदि अशुभ ग्रहों की दृष्टि है या वो अशुभ ग्रहों के साथ हैं तो हृदय से जुड़े रोग हो सकते हैं।

  • कुंडली में सूर्य की स्थिति

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य को हृदय का कारक माना जाता है। आपकी जन्म कुंडली में सूर्य का संबंध मंगल, शनि अथवा राहु-केतु के अक्ष में होने पर जातक को हृदय संबंधी विकार होते हैं। सूर्य अगर किसी नीच राशि में स्थित हो तो भी हृदय रोग हो सकते हैं। अगर सूर्य आपकी कुंडली में षष्ठम, अष्टम और द्वादश भावों के स्वामियों से संबंध बना रहा है तो हृदय विकार होने की पूरी संभावना रहती है। इसके अलावा सूर्य के पाप कर्तरी योग में होने पर भी हृदय से जुड़े रोग होते हैं। पाप कर्तरी योग कुंडली में तब बनता है जब किसी भाव के दोनों ओर पाप ग्रह स्थित हों।

  • सिंह राशि के पीड़ित होने पर

जिस जातक की कुंडली में सिंह राशि पीड़ित होती है अथवा उस पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है तो जातक को हृदय रोग घेर सकते हैं। इसके साथ ही कुंडली के चतुर्थ और पंचम भाव के पीड़ित होने अथवा उन पर नैसर्गिक पाप ग्रहों अथवा त्रिक (6-8-12) भाव के स्वामी ग्रह का प्रभाव होने पर भी हृदय से जुड़ी परेशानियां आ सकती हैं।

  • चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामियों के दूषित होने पर

चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामी यदि अशुभ ग्रहों से युति बनाकर दूषित हो रहे हैं तो भी हृदय रोग होने की संभावनाएं रहती हैं। यदि चतुर्थ, पंचम भावों के स्वामी तीव्र गति से चलने वाले ग्रहों से दूषित हो रहे हैं तो रोग ज्यादा दिन तक नहीं चलता या रोग बहुत गंभीर नहीं होता। वहीं अगर चतुर्थ, पंचम भाव धीमे चलने वाले ग्रहों से दूषित है तो रोग लंबे समय तक चल सकता है और रोग गंभीर भी हो सकता है।

उपरोक्त ग्रह स्थिति होने पर इन ग्रहों की दशा और अंतर्दशा के दौरान हृदय रोग की संभावना बनी रहती है। इसलिए ऐसे जातकों को ग्रहों की दशा और अंतर्दशा के दौरान सावधान रहना चाहिए।

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हृदय रोग के ज्योतिषीय उपचार

ज्योतिष एक ऐसा विज्ञान है जिसके द्वारा जीवन में आने वाली परेशानियों को तो हल किया ही जाता है, साथ ही साथ ज्योतिष शास्त्र हमें स्वस्थ जीवन जीने के लिए भी कई महत्वपूर्ण सुझाव उपलब्ध करता है। ज्योतिष शास्त्र की मदद से आप आने वाली मुश्किलों का भी पहले ही आकलन कर सकते हैं और जिन समस्याओं से आप जूझ रहे हैं उनका भी हल पा सकते हैं। ऐसे में आज हम आपको बताएँगे कि कैसे हम ज्योतिषीय उपचारों का इस्तेमाल करके हृदय संबंधी विकारों या रोगों से बच सकते हैं। हृदय रोग से जुड़े ज्योतिषीय उपचार नीचे दिए गए हैं:-

  • सूर्य को जल चढ़ाएँ

हृदय को स्वस्थ रखने के लिए आपकी कुंडली में सूर्य का अनुकूल अवस्था में होना बहुत जरूरी है। यदि आपकी कुंडली में सूर्य की स्थिति अनुकूल नहीं है तो आपको प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल भरकर सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भी आपको हृदय से जुड़े विकारों को दूर करने में मदद मिलेगी।

  • चतुर्थ और पंचम भाव के अपने स्वामी ग्रहों को करें मजबूत

हृदय रोगों से बचने के लिए आपको अपनी कुंडली के चतुर्थ और पंचम भाव के स्वामी ग्रहों को जानकर उनको मजबूत करना चाहिए। इसके लिए आप उन ग्रहों के बीज मंत्र का जाप कर सकते हैं या उन ग्रहों से संबंधित रत्नों को धारण कर सकते हैं।

  • सूर्य के बीज मंत्र का करें जाप

हृदय रोगों से मुक्ति पाने के लिए सूर्य देव के बीज मंत्र का नियमित पाठ करना भी लाभकारी होता है। सूर्य का बीज मंत्र नीचे दिया गया है:

मंत्र – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः”

  • अपने इष्ट देव की करें पूजा

अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना करना भी आपके लिए शुभ फलदायी रहता है और इससे हृदय से जुड़ी परेशानियां दूर हो जाती हैं। लेकिन आपको इस बात का ख़ास ख्याल रखना है कि इष्ट देव की पूजा पूरे विधि-विधान से की जाए। इसमें किसी भी तरह की चूक न हो। इसके अतिरिक्त श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ करें अथवा भगवान विष्णु की उपासना करें।

  • श्वेतार्क वृक्ष सिंचित करें

श्वेतार्क वृक्ष लगाएँ और उसको जल से सिंचित करें इससे आपको लाभ होगा। यह वृक्ष हृदय रोगों को दूर करता है।

आशा करते हैं कि हृदय रोग से जुड़ा यह लेख आपको पसंद आया होगा। हम आपके मंगल भविष्य की कामना करते हैं।

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